आम जन का मीडिया
It is important to have administrative skills in the digital era.

डिजीटल युग में प्रशासनिक दक्षता का होना जरूरी

-रक्षित परमार , उदयपुर

देश में नेटबंदी का एक अजीब -सा खेल साम्प्रदायिक दंगे भडकने और हिंसा की संभावना होने पर चलन में आ गया है । आजकल जगह -जगह पर स्थानीय प्रशासन के द्वारा यह मनमाना कदम अक्सर उठा लिया जाता है । जिससे आमजन के सारे काम काज जो इन्टरनेट पर आधारित होते है बिल्कुल ठप्प पड जाते है । स्वयं प्रशासन लाचारी पूर्वक इस बात को स्वीकार करता है कि उनके न चाहते हुए भी उन्हें मज़बूरन ऐसा करना पडता है । प्रशासन के मन में यह भयानक डर देश की सबसे बडी बीमारी जिसे राष्ट्रीय बीमारी की संज्ञा दी जानी चाहिए वह है साम्प्रदायिक कट्टरता । इसकी बदौलत उपजने वाले उपद्रवों से निपटने में अच्छे – अच्छे अधिकारियों के पसीने छूट जाते हैं । साम्प्रदायिक कट्टरता से निजात पाने का कोई कारगर इलाज नहीं है मगर हम लोगों में सचमुच में अगर देश प्रेम और भाईचारे का भाव हो तो ऐसी सैंकडों संकीर्णताओं को तिलांजलि दी जा सकती है । इसके अलावा हाल ही के गत कुछ वर्षों में प्रशासन के लिए परेशानियों का सबब बनकर उभरा है विचारधाराओं के नाम पर सोशल मीडिया पर फैलने वाला हिंसाएं भडकाने वाला वाकयुद्ध । ऐसे में सरकारों द्वारा प्रशासन के माध्यम से इन्टरनेट सुविधाएं कुछ घंटों और दिनों तक पूर्णत: स्थगित कर दी जाती है । अब ये जायज है या नहीं यह तो आने वाला समय बतायेगा ! अभी व्रतमान में तो हम जनता और सरकार दोनों अपनी – अपनी समझ के मुताबिक इससे समझौता किये जा रहे है । लेकिन इन्टरनेट प्रोवाइडर कंपनियों के विशेषज्ञों का कहना है कि नेटबंदी से इस पर आधारित कार्यों की गति पर नकारात्मक असर पडता है । सोशल साइट्स यूजर्स का भी मानना है कि प्रशासन को कोई ओर तरीका ईजाद करना चाहिए जिससे आम जनता की परेशानी थोड़ी कम हो ।

इन्टरनेट को बंद करके हिंसा संभावित क्षेत्र को शांतिपूर्ण बनाने की भरपूर कोशिशें की भी जाती है । लेकिन प्रशासन तो आज भी कई मामलों में दक्ष नहीं हो पाया है इसकी मुख्य वजह है हमारा प्रशासनिक ढांचा जो आज भी लालफिताशाही से ग्रसित है । आधूनिक तकनीकें आज भी कहीं जगहों पर उपलब्ध नहीं है और सबसे अहम बात तो है राज्य के आयोगों द्वारा प्रशासन में दक्ष लोगों की अनदेखी करना है । हमारे द्वारा शिक्षित लोग होने का मतलब यह भी तो समझा नहीं जाना चाहिए कि हम निश्चित रूप से दक्ष ही होंगे । प्रशासन में दक्षता की अनदेखी करना और प्रशासनिक दक्षताएं विकसित करने पर सरकार की तरफ से कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाना भी है । मानो न मानो हमारी प्रशासनिक विफलता की मुख्य जडें विशेषकर यही अटकी पडी है जिस पर सरकार को सतर्कता के साथ सुधार करने की आवश्यकता है । प्रशासन द्वारा एक ऐसा जनहितैषी खुफिया तंत्र विकसित किये जाने की आवश्यकता है जो लोगों की समस्याओं को समझने का प्रयास करें और तदूपरांत सरकार उन समस्याओं को योजनाबद्ध तरीके से निराकरण करें । अगर ऐसा कोई सी भी सरकार कर पाती है तो ये एक अग्रिम कदम माना जायेगा ।

लोगों की दीर्घकालीन समस्याओं के समाधान करने में सरकार की सकारात्मक और अनिवार्य भूमिका हो जाती है मगर आपातकालीन समस्याओं से निपटने में प्रशासन को ही स्वयं को प्रखर बनना होगा । यहां प्रखर से मेरा तात्पर्य है कानून की धाराएं लगाकर आमजन के खिलाफ पुलिस कारवाई करने और लाठीचार्ज से नहीं है बल्कि आमजन के हित में जनसहयोगी कार्यशैली विकसित करने से है । हाल फिलहाल प्रशासनिक तबका अपने आपको जनता से श्रेष्ठ समझता रहा है जबकि उन्हें मालूम होना चाहिए कि जनता में से ही देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनते है । प्रशासन में मौजूद लोगों को हठधर्मिता से कतई पेश न आकर लोगों से सहजता से व्यवहार करना भी भारतीय संविधान की अंतरात्मा से रूबरू होने जैसा है । मैं स्वयं ग्रामीण पृष्ठभूमि से हूं तो इस बात का तजूर्बा है कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले किसानों , मजदूरों और विशेषकर छात्रों से प्रशासन के पब्लिक रिलेशन सराहनीय नहीं कहे जा सकते है । देश के संविधान को सर्वोपरी माने तो जनता ही संविधान के पश्चात सबसे बडी अधिकारी है जो लोकसेवकों से अच्छे रवैये की उम्मीद करती है । एक इमानदार सरकारी अधिकारी या कर्मचारी अपने आपको जनता का सेवक मानकर कार्य करता है क्योंकि उसके मन में किसी भी तरह का पदाभिमान भी नहीं होता है ।

समाज में कर्तव्यपरायण लोगों का आदर – सत्कार एवं विशेष प्रतिष्ठा होती है । प्रशासन में मौजूद लोकसेवकों को जनता के साथ तानाशाही और पक्षपाती रवैया न अपना कर निष्पक्ष और सहानुभूति का भाव रखना चाहिए । इससे जनमानस की भावना न केवल प्रशासन के प्रति सकारात्मक होगी बल्कि उन लोगों में समाज और देश के लिए कुछ बेहतर करने की प्रेरणा भी पैदा होगी । अच्छी प्रेरणाएं समाज के भीतर नागरिकों के व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होती है जिसका प्रभाव देश के तमाम नागरिकों पर पडता है । बदलाव की शुरूआत बस यही से शुरू होती है ।

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