मेडिकल कॉलेजों के भीतर पसरी यह एक अघोषित वर्ण व्यवस्था है !

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(स्कंद शुक्ला)  

जिस लड़के से आपकी अभी-अभी अस्पताल के वॉर्ड में झड़प हुई है , उसने कल से खाना नहीं खाया है और तीन घण्टे नींद ली है।

मेडिकल-कॉलेजों में आये दिन डॉक्टरों और रोगियों के रिश्तेदारों के बीच कहासुनी और मारपीट के क़िस्से सुनने को मिलते हैं। रिश्तेदार तर्क देते हैं कि उनके मरीज़ के प्रति उचित संवेदना का प्रदर्शन नहीं किया गया। सामान-इत्यादि बाहर से मँगाया गया। उचित उपचार देने में देर लगायी गयी।

डॉक्टर कहते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनके पास काम का अतिशय दबाव है। मरीज़ बहुत से है और फ़ाइलें भी। सामान अन्दर उपलब्ध नहीं है। इलाज रोका नहीं जा सकता। दोनों अपने-अपने दबावों को लेकर फट पड़ते हैं। दोनों अपने-अपने तनावों को लिये भिड़ जाते हैं। नतीजन गाली-गलौज व मारपीट। अस्पताल अपनी शुचिता और कर्मनिष्ठा की छवि से गिरकर सड़क के ओछेपन को प्रदर्शित करती द्वन्द्वभूमि बन जाता है।

रोगियों और उनके परिचरों की बात पहले करूँगा। बात उनकी पहले होनी भी चाहिए। वे पीड़ा का पहाड़ लेकर मेडिकल कॉलेज पहुँचते हैं। उनसे किसी भी सन्तुलित अवधारणा और व्यवहार की अपेक्षा सर्वथा दुष्कर है। उनका सारा ध्यान शीघ्रातिशीघ्र अपने रुग्ण परिजन को सही उपचार मिल जाने और पुनः स्वस्थ हो जाने में होता है। ऐसे में जब डॉक्टरों द्वारा बरती निष्ठुरता और अकर्मण्यता से उनका आमना-सामना होता है , तो वे किसी ज्वालामुखी-से फूट पड़ते हैं।

दूसरा पक्ष जिसके बारे में रोगी-परिवार नहीं जानता , वह डॉक्टरों का है। कौन हैं वे डॉक्टर जिनसे उनकी भिड़न्त होती है ? क्या योग्यता है उनकी ? किस ओहदे पर हैं वे ? कब से काम कर रहे हैं इस मेडिकल कॉलेज में ? इन सवालों के जवाब उस समय हर रोगी और उसके परिजन को देना न सम्भव है और न उचित , लेकिन सार्वजनिक फ़ोरमों और मंचों द्वारा यह बताना नितान्त आवश्यक है।

मेडिकल कॉलेजों में मरीज़ों और उनके रिश्तेदारों का सामना जिन तथाकथित डॉक्टरों से सबसे पहले होता है , वे जूनियर रेज़िडेंट ( प्रथम वर्ष ) होते हैं। वे लड़के जो अभी-अभी एम.बी.बी.एस ख़त्म करके नये-नये पोस्टग्रैजुएट कोर्स में दाख़िल हुए हैं और काम सीख रहे हैं।

वे ही आपसे आपके मरीज़ों का परिचय , उसके लक्षण , पूर्व-उपचार सम्बन्धी जानकारी जुटाते हैं और आगे की गतिविधि तय करते हैं। उनका काम जानकारी एकत्र करके ऊपर पहुँचाना होता है , रोगी के स्वास्थ्य से सम्बन्धी कोई बड़ा निर्णय उनके हाथ में नहीं होता। वे फ़ाइलें पूरी करते हैं , क्योंकि ऊपर से आदेश है , वे ख़ून का इंतज़ाम करते हैं , क्योंकि ऊपर से आदेश है , वे पट्टियाँ करते हैं , क्योंकि ऊपर से आदेश है।

और यह ऊपर क्या है ? क्रम में बढ़ते जाइए — जूनियर रेज़िडेंट ( द्वितीय वर्ष ) , फिर तृतीय वर्ष , तदुपरान्त सीनियर रेज़िडेंट ( अथवा चीफ़ रेज़िडेंट ) और अन्त में प्रोफ़ेसर साहब। किन्तु क्या सबका काम एक ही ढंग का होता है ? क्या सभी एक ही तरह से रोगियों के प्रति कर्मनिष्ठा का निर्वहन करते हैं ? क्या सब एक ही समय पर रोगियों के सामने काम के लिए प्रस्तुत होते हैं ?

नहीं। मेडिकल कॉलेजों के भीतर पसरी यह एक अघोषित वर्णव्यवस्था है जिसमें दो-तिहाई से अधिक मजदूरी केवल और केवल जे.आर वन के जिम्मे है। क्यों है ? नहीं करोगे यह सब तो सीखोगे कैसे ? खूब फाइलें भरो। खूब मरीज़ देखो। ख़ून के लिए दौड़ लगाओ। पट्टियाँ करो। तभी अच्छे डॉक्टर बनोगे। तभी काम आएगा। तभी सीख कर निकलोगे यहाँ से।

यह सत्य है कि मेडिकल कॉलेज शैक्षणिक संस्थान हैं और उनका काम मात्र रोगियों को स्वास्थ्य-सेवाएँ उपलब्ध कराना-भर नहीं है। लेकिन जब जनसंख्या का दबाव बढ़ता जा रहा हो , तो हर शिक्षा पर सेवा चढ़ बैठती है। सीखना-सिखाना काम निबटाने के सामने गौण हो जाता है। संख्या के सामने गुणवत्ता दम तोड़ देती है।

आप कितने मरीज़ देखते हैं , यह महत्त्वपूर्ण है , लेकिन उससे अधिक महत्त्वपूर्ण है कि आप उन्हें कैसे देखते हैं। किस तरह से उन्हें और उनकी बीमारी समझते हैं। निदान और उपचार के लिए केवल पाठ्य-पुस्तकें नहीं , कितने शोधपत्र खँगालते हैं। और यह सब तब ही सम्भव है , जब काम का सम्यक् बँटवारा हो और उसे ठीक से पूरा करते हुए शिक्षा को भी समुचित समय दिया जाए।

मैं उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में पसरे सामन्तवाद का धुर-विरोधी हूँ , जहाँ जूनियर रेज़िडेंट ( प्रथम वर्ष ) के ऊपर अधिकाधिक काम डालकर बाक़ी लोग पढ़ाई व सर्जरी की मलाई पर टूटे रहते हैं। पट्टियाँ तुम करो , मरीज़ काटेंगे हम। बहस करोगे , नहीं सिखाएँगे आगे। यहाँ रहकर काम सीखना है कि नहीं ?

नतीजन वह नया लड़का ऊपर के दबाव और सीखने के लोभ में खपता रहता है। वह कुछ कह नहीं सकता , उसे अच्छा डॉक्टर बनना है। जनता उसे डॉक्टर मानकर उसके पास आती है , ऊपर वाले उसे डॉक्टर मानते नहीं। पता नहीं वह स्वयं को क्या मानता है। किससे क्या कहे वह ?

जूनियर रेज़िडेंट ( प्रथम वर्ष ) के सूजे पैरों , भूख से कुलबुलाती अँतड़ियों और बोझिल आँखों के लिए कोई मानवाधिकार-संगठन आगे नहीं आएगा। जनता उन्हें महामानव मानकर मिलती है और उनके सीनियर उन्हें अर्धमानव मानते हैं। उनके लिए काहे का अधिकार !

वे पिटें भी , बुरे भी बनें और फ़ेल होने का जोख़िम भी झेलें। जनता-मीडिया-कॉलेज की तिहरी मार खाएँ ! उन्होंने मेडिकल-शिक्षा का चुनाव आख़िर स्वेच्छा से जो किया है !

मेडिकल कॉलेजों की तुलना में संस्थानगत-चिकित्सा-प्रणाली इस सामन्तवाद से लगभग मुक्त है। वहाँ बड़ा-छोटा नहीं होता , वहाँ हर काम हर ओहदे का चिकित्सक करने और कर सकने की योग्यता रखता है। वहाँ सभी लड़के ( चाहे वरिष्ठ हों अथवा कनिष्ठ ) फ़ाइलें भरते हैं और रोगियों को ढंग से देखते हैं। उपचार भी बेहतर होता है और शिक्षा भी। नोकझोंक व मारपीट की घटनाएँ भी नगण्य देखने को मिलती हैं।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि मेडिकल कॉलेजों में दबाव बेतहाशा है। लेकिन इस समस्या का समाधान क्या यह सामन्तवाद ख़त्म किये बिना हो सकेगा ? क्या सभी जूनियर रेज़िडेंटों और सीनियर रेज़िडेंट के भी ‘लगभग’ बराबर काम किये बिना , यह काम का बोझ ठीक से पूरा हो पाएगा ? ( ‘लगभग’ शब्द पर ग़ौर कीजिएगा ! ) क्या प्रोफ़ेसर समय पर अपने-अपने विभाग आते हैं ? क्या वे पूरे समय कॉलेज में रहते हैं ? क्या वे शिक्षा और रोगी-सेवा में ठीक से समय देते हैं ? उनसे जवाब कौन लेगा ? प्रशासन ? मीडिया ? जनता ?

उत्तर प्रदेश में सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक लगी हुई है , कई चिकित्सक-मित्र इसके विरोधी हैं। हमने अस्पताल को अपना समय दिया , अब हम जो चाहे करें। सरकार और समाज को इससे क्या ?

बुराई की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ऊपर से चलती हुई नीचे आती है। बाबू इसलिए भ्रष्ट है , क्योंकि वह जानता है कि साहब भ्रष्ट हैं। साहब इसलिए बिगड़े हुए हैं , क्योंकि ऊपर से नेता विकारयुक्त हैं। बिगाड़ अगर ऊपर से चलता है , तो सुधार भी ऊपर से ही होगा। नहीं तो आपके चलाये डण्डे की आपके ही मातहत , पीछे खिल्ली उड़ाते हुए अवमानना करेंगे। आप निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं , शौक से सरकारी क़ायदे को धता बताकर कीजिए। बात तो यहाँ तक जा पहुँची है कि  आपकी देखा-देखी रेज़िडेंटों ने भी प्रैक्टिस शुरू कर दी है। किस अधिकार से अब रोक पाएँगे उन्हें आप ?

सरकारी नौकरी पार्टटाइम काम नहीं है। शिक्षा पार्टटाइम काम नहीं है। पट्टियाँ-फ़ाइलें-मरीज़ सभी के हैं : इनके प्रति कर्तव्य-निर्वहन की यह सामन्ती व्यवस्था बदल डालिए। अन्यथा बढ़ती जनसंख्या के साथ बढ़ते रोगी होंगे और बढ़ते रोगियों के परिजनों के संग बढ़ती मारपीट। करते रहिएगा जार्जियन बनकर लीपापोती। बनाते रहिएगा के.जी.एम.यू. को एम्स। मगर मूल में मामला ढाक के तीन पात ही रहेगा।

मीडिया अस्पताल में रोगी का पक्षधर होकर घुसता है : वह मामले की निष्पक्ष व्याख्या नहीं करता। उसका अखबार पढ़ने वाले रोगी और उसके परिजन हैं , डॉक्टर तो मुट्ठी-भर ही हैं। मगर यह ढंग की पत्रकारिता नहीं है , यह पूर्वाग्रह से ग्रस्त खोखलापन है। सबको न्यायी बनना है , सब अपने गिरेबानों में झाँकना भूल जाते हैं।

लगातार तीन दिनों से वॉर्ड में खपे पड़े जूनियर रेज़िडेंट ( प्रथम वर्ष ) से अगली बार बहस हो , तो पूछिएगा कि आपके सीनियर लोग कहाँ हैं। और काम करते समय केवल आप ही लोग क्यों नज़र आते हैं। बाक़ी के दो तिहाई से अधिक चिकित्सक क्यों नहीं मुख्य मोर्चे पर पूरी कर्मशीलता के साथ निरत जान पड़ते।

के.जी.एम.यू. ( और कोई भी राज्य मेडिकल कॉलेज ) एम्स और पी.जी.आई न हो पाएगा , जब तक यह काम का बँटवारा इसी तरह बना रहेगा …

 

स्कंद शुक्ला 

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