‘यह कहीं प्रतिक्रांति की मुखालफत तो नही हैं’

-प्रमोदपाल सिंह

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भीमा-कोरेगांव में महारों के शौर्य और पराक्रम की दूसरी सदी पूरी होने पर मनाए जा रहे जश्न पर पेशवाओं की हार से जले-भुने लोगों द्वारा हमले की घटना ने पूरे महाराष्ट्र को अपनी चपेट में ले लिया हैं और अब इसकी आंच से पड़ौसी प्रदेश भी तपने शुरू हो गए हैं। यह वह आग हैं,जो अब तक मुख्य धारा के मीडिया के लिए ‘दीया तले अंधेरा’ हुआ करती थी। आग की लपटें इतनी ऊंची थी कि पहली बार इसे ‘ब्रेकिंग’ किया गया। इसके चलते आधुनिकता एवं प्रगतिशीलता के लबादे से ढ़के भारत को सदियों से खोखला कर रही जातीय विद्रुपता उभर कर सामने आयी।

लेकिन इसे प्रतिक्रांति की मुखालफत के रूप में देखा जाना चाहिए। जिसके लिए समूचे भारत का दलित,बहुजन एवं वंचित वर्ग तैयार हो चुका हैं और स्थितियों में सुधार न होने पर ‘गृहयुद्ध’ की सुदूर ध्वनि हैं। साल भर के घटनाक्रम तो यह ही साबित करते ही हैं। महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव में हुई पथराव व आगजनी में दो दर्जन से अधिक वाहनों को जला देने और पचासों गाड़ीयों में तोड़फोड की घटनाएं हुई। इसी के साथ प्रकाश अम्बेडकर द्वारा महाराष्ट्र बंद की अपील का व्यापक असर हुआ। जो बरसों से दबे-कुचले वर्ग की तीव्र प्रतिक्रिया के रूप में हैं और अब समय आ गया हैं। जब इस प्रतिरोध को, सच्चाई से स्वीकार करने की जरूरत भी हैं।

क्योंकि अब जो महाराष्ट्र में हो रहा वो कोई आरक्षण के समर्थन या विरोध आंदोलन की चेतना नही हैं। यह वो ही चेतना हैं जो दो सौ साल पहले पेशवाओं के जातीय अत्याचार का मुकाबला करने के लिए अंग्रेजों की तरफ से लड़ने को मजबूर हुए थे। भीमा नदी की कोर पर बसे गांव ’भीमा-कोरेगांव’ में एक जनवरी 1818 को पेशवा बाजीराव की मराठा,गोसाई व अरबों से मिलकर बनाई 28000 सैनिकों से की सेना का मुकाबला महज 800 सैनिकों ने कर उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया था। इसमें अकेले महार जाति के 500 सैनिक थे। इस इतिहास पर नजर ड़ालकर यह देखे जाने की जरूरत हैं कि आखिर महार इतनी बड़ी ताकत और अंग्रेजों से मुक्ति की बजाय उनके हरावल दस्ते कैसे बन गए। वो कौनसी ताकत थी जो अंग्रेज सेनानायक फ्रांसिस स्टोणटन द्वारा बड़ी पेशवा फौज को देखकर पीछे हट जाने का आदेश भी महारों नेे मानने से इंकार कर दिया था। दरअसल रोज-रोज के अत्याचारों ने महारों को मरने और मारने पर उतारू किया।
तब इस शौर्य की 200वीं सालगिरह का जश्न आधुनिक पेशवाओं और समर्थकों को कैसे पचता? जश्न मनाने जा रहे दलितों पर हमला इसी ’पूर्वाग्रह’ की पीड़ा हैं। जो हर अत्याचारी जाति की पीड़ा हैं,छोटी जात को ऊंची बात सोचने की आजादी पर उंची जात का आज भी खून उबलने लगता हैं। लेकिन प्रतिरोध करने को दलित वर्ग अब लगभग तैयार भी हैं। महाराष्ट्र आंदोलन तो इस बात की पुष्टि भी कर रहा हैं। भारिप बहुजन महासंघ नामक एक छोटी सी राजनीतिक पार्टी के आह्वान पर महाराष्ट्र के अधिकांश जिले में बंद के चलते जन-जीवन अस्त व्यस्त हो गया। वरना,अब तक यह ताकत शिव सेना ही दिखा पाती थी। भारिप बहुजन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश अम्बेडकर पिछले साल 3 जनवरी को राजस्थान दौरें पर थे। उनकी उस दिन कही बात को दोहराए तो वे इसे क्रांति की मुखालफत के रूप में ही देखते हैं। जो आज नही तो कल होनी ही हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि जब क्रांति होगी तो उसकी प्रतिक्रांति होगी और इसकी मुखालफत से ही सामाजिक व्यवस्था बदलेगी। ताजा मामले में प्रकाश अंबेडकर लगातार चर्चा में बने हुए हैं। प्रकाश अंबेडकर देश के संविधान निर्माता डॉ.भीम राव अंबेडकर के पौत्र हैं।

ऐसा लगता हैं कि ’इतिहास’ पर एक वर्ग-विशेष का ही कब्जा रखना चाहता हैं।दबे-कुचले लोग अपने इतिहास को नमन करेगें तो आततायियों को बर्दाश्त नही होगा और ब्रिगेडें इसके लिए अपने लठ्ठ लिए उनके पीछे पड़ी रहेगी। इतिहास से छेड़छाड के नाम पर राजस्थान झूलस चुका हैं। लेकिन महाराष्ट्र में तो ’इतिहास’ को ही दबाने का दबाव हैं। इसके इतर स्प्रींग को जितना दबाया जा रहा हैं,उतनी ही तेज गति से उछल रही हैं। इतिहास में पेशवा की हार को अंग्रेजों की जीत देखा जा रहा हैं,लेकिन इतिहास यह भी बताता हैं कि बाजीराव हार के बाद पेंशन और घर के लिए अंग्रेजों के आगे सरेण्डर हुआ। तब किसने बाजी जीती और किसने हारी। यह तो अंग्रेजों द्वारा कोरेगांव में निर्मित ’जय स्मारक’ के शीलालेख ही जाहिर कर देते हैं। जिन पर 49 वीर सैनिकों के नाम अंकित हैं। इनमें 22 महार हैं। कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस स्मारक पर पहुंचे थे, जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं।

अगर अब भी सच्चाई के साथ इस युद्ध को महारों की जीत के रूप में देखे और ’जातीय युद्ध’ थाम ले तो आने वाले दिनों में मुखालफत को मौका नही मिलेगा। सबकी मुठ्ठी बंद रखने में ही भलाई हैं। तभी हम आधुनिक भारत का सपना देख सकेगें।

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