आम जन का मीडिया
Is not this terrorism?

क्या ये आतंकवाद नहीं है ?

– मुकेश निर्वासित
  राजसमन्द में जिस प्रकार से एक संप्रदाय विशेष के व्यक्ति को मारा गया और उसका विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल किया गया और उस व्यक्ति की नृशंस हत्या के बाद उसने भगवा झंडे के सामने खड़े होकर और एक मंदिर में जाकर जिस प्रकार के बयान दिए हैं उन्हें देखकर मुझे इस देश के नागरिक होने पर क्षोभ है.
मेरा देश तो गाँधी का देश है, मौलाना आज़ाद का देश, जहाँ पर कई सम्प्रदायों के लोग मिलकर रहते थे। लेकिन उस समय में भी दलितों और पिछड़ों के साथ बहुत बुरा व्यवहार और नृशंसता होती रही है।  जिस प्रकार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद ने नफरत और अलगाव को बढ़ावा दिया है और उसको भारतीय जन मानस में इस प्रकार भर दिया है जिसकी वजह से प्रकार की क्रूरतम घटनाएँ हो रही हैं।
यह पूरे तरीके से नाजीवाद है जिसकी आहट तो बहुत पहले ही सुनाई दे रही थी, लेकिन अब वह अपने वास्तविक रूप में आ गया है। किसी मुसलमान द्वारा किसी की हत्या किये जाने पर पूरी कौम को आतंकवादी घोषित करने वाला मीडिया अब कहाँ चला गया है क्यों नहीं हिन्दू आतंकवाद की बात करता है। क्या ये हिन्दू आतंकवाद नहीं है ?
मुझे तो लगता है कि हम सामाजिक बहुत कम राजनीतिक काम ज्यादा करते हैं और कहते हैं कि हम सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं। सामाजिक मुद्दे जो कि पूरे लोकतंत्र को प्रभावित करते हैं ,उन पर हमारी बात कभी-कभार ही होती है .नहीं तो हम लोगों के राशन, पेंशन और नरेगा के फॉर्म भराने में ही लगे रहते हैं ,वह भी बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन जब तक लोगों को उनकी अस्मिता, बराबरी और लोकतंत्र की हम बात नहीं करेंगे तब तक चीजें बहुत अधिक नहीं बदलने वाली हैं।
जबसे इस घटना के बारे में सुना है, तबसे धर्म अफीम की तरह होता है वही मस्तिष्क (दिमाग )में आ रहा है और इस अफीम के बारे में ना तो कोई बात कर रहा है और उसके परिणामस्वरूप जो हालात पैदा होते हैं ना उन पर बात की जाती है। शायद धर्म पर खुलकर बात करने का समय निकल गया है। हम अपने रोजमर्रा के काम के साथ कितना इन मुद्दों पर आपस में भी बात कर पाते हैं चाहे वह धर्मवाद, जातिवाद, वर्गवाद या पित्रसत्ता हो।
मुझे लगता है हम जब घटना होती है, तब प्रतिक्रिया में कुछ करते हैं और फिर भूल जाते हैं। खैर अभी बहुत कुछ लिखने का मन कर रहा है लेकिन हमें कुछ कड़े कदम उठाने होंगे. वे लोगों के साथ बातचीत के साथ-साथ सरकार पर दबाव बनाना ही होगा। शांतिपूर्ण तरीके से लम्बे आन्दोलन चलाने की अब सख्त आवश्यकता नजर आ रही है।
गोरे अंग्रेजों ने कितने बार जेल भेजा या सलाखों में डालते रहे लेकिन हमारे स्वतंत्रता संग्राम के साथी कभी थके नहीं, उसी प्रकार अब इन भारतीय नाजियों को कहना पड़ेगा कि बाकी जिन्दगी जेल में ही बिताएंगे। एक व्यक्ति जेल जायेगा तो उससे प्रेरित होकर 10 और जेल जाने को तैयार होंगे। भारतीय लोकतंत्र को बचाना है तो अब ये कदम लेने होंगे।

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