क्या आज के दौर में ऐसा साझा मंच भी संभव है !

वर्तमान नेताओं को देखते हुए क्या ये भी संभव है ?

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(डॉ. अनन्त भटनागर)  

डॉ अनन्त भटनागर

1996 के लोकसभा चुनाव में हम कुछ मित्रों  ने अपनी संस्था”प्रबुद्ध मंच” की ओर से “साझा मंच” कार्यक्रम की संकल्पना की। “साझा मंच” यानी  चुनाव के सभी प्रत्याशी एक ही मंच से जनता को संबोधित करें और जनता के सवालो के जवाब दें।

अपने अपने मंचो से बोलने  वालो को एक मंच पर लाना एक नयी पहल तो थी ही ,मगर  उतना ही चुनौतीपूर्ण भी था। निर्दलीय और छोटे दलो के प्रत्याशी   तो राज़ी होने ही थे  ,खास बात थी कि प्रमुख दलो भाजपा और कांग्रेस  के प्रत्याशियों की सहमति प्राप्त करना। यहां  हमने भी नेताओ जैसी ही चतुराई दिखलायी ,एक को कहा कि दूसरे तो तैयार हैं ,आप नही जायेंगे तो  जनता व मीडिया में गलत सन्देश जायेगा। दूसरे को भी वही कहा।

युक्ति काम कर गयी और अजमेर ही नही देश के इतिहास में भी संभवतः यह पहला ही अवसर रहा होगा ,जब समस्त प्रत्याशीयो ने घनघोर प्रचार के दौर में व्यस्त होते हुए भी एक ही समय पर एक मंच साझा किया। निर्धारित 10-10 मिनट में सभी ने अपनी बात कही।  र्रेडक्रोस भवन प्रबुद्ध नागरिको से खचाखच भरा हुआ था।  पार्टियो के समर्थक भी थे,लेकिन बेहद अनुशासित।

प्रतिष्ठित नागरिको के एक पैनल ने जनता के सवालो का चयन किया और प्रत्याशियों ने उनके उत्तर दिए।

इसके बाद के  विधानसभा और लोकसभाओं चुनावो में हमने 5 -6 ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये। फिर टीवी चैनल्स का दौर आ गया जहाँ इस तरह की पहल धीरे  धीरे आम बात बन गयी।

इन दिनों हर चैनल  पार्टीयो के प्रत्याशी या प्रतिनिधियों को लेकर ऐसे कार्यक्रम कर रहा है।न्यूज़ 18 चॅनेल के बड़ी चौपड़ कार्यक्रम में मुझे भी   इस बार एक पैनलिस्ट के रूप में बुलाया गया था। मगर अनुभव यह रहा कि अब वह सौहार्द नहीं रहा है। प्रायोजित कार्यक्रम की तरह ही पार्टियो की प्रायोजित भीड़ वहां रहती है,जो नारेबाजी कर कोई सार्थक बहस नही होने देती।

1998 में जब हम यह कार्यक्रम कर रहे थे तो रासासिंह रावत और प्रभा ठाकुर उम्मीदवार थे। सञ्चालन करते  हुए  अंत में मैंने  दोनों से कहा कि आप दोनों एक दूसरे से एक एक सवाल कर सकते हैं ।कृपया कठिन से कठिन सवाल पूछें। प्रभा जी ने  अप्रत्याशित रूप से कहा -” रासासिंह जी आप कविता के प्रेमी हैं ,कोई अच्छी से कविता सुनाइए।”  चुनावी गर्मागर्मी में कोई यह कहेगा कल्पना से परे था। हॉल उनके इस आग्रह पर तालियों से गूँज उठा। रासासिंहजी  ने हास्य पूर्ण रचना सुनाई। स्वाभाविक ही था  रासासिंह जी  ने प्रभा जी  से भी  वही आग्रह किया। जिसे प्रभा जी ने अपनी सुमधुर आवाज़ में अपने गीत  से पूर्ण किया। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अत्यंत सौहार्द के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

आज के दौर में नेताओं के बयान देख ले तो लगता है इन्हें एक मंच पर बिठाना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं।

(डॉ. अनन्त भटनागर)

 

 

(फोटो क्रेडिट- sarthaksamay.com से साभार)

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