एक दलित बालिका की खेल जगत में अंतरराष्ट्रीय उड़ान

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मैं अभी-अभी सन्ध्या गौतम का इंटरव्यू करके लौटा हूँ। सन्ध्या बेहद अभावों के बीच से रास्ता बनाती हुई दो बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में सॉफ्ट बाल खेल चुकी है और अब दिसम्बर में फिर ऑस्ट्रेलिया जा रही है। सिंगापुर में तो सन्ध्या ने भारतीय टीम की अगुवाई भी की थी।  मात्र 17 साल की सन्ध्या देश-विदेश से ढेर सारे मैडल  औऱ सर्टिफिकेट बटोर चुकी है।
संध्या के पिता चंदरभान लखीमपुर खीरी से रोज़ी की तलाश में दिल्ली आए थे। एक गरीब दलित  के घर में 8 भाई बहनों के बीच पलने वाली सन्ध्या को खेलने की प्रेरणा अपनी बड़ी बहन नेहा गौतम से मिली लेकिन नेहा राष्ट्रीय स्तर तक ही खेल पाई । गरीबी के अभिशाप, दलित होने के अभिशाप औऱ लड़की होने के अभिशाप को चीरती हुई सन्ध्या रोज़ 3 बजे से लेकर 6:30 बजे तक ग्राउंड में अपने कोच की देखरेख में पसीना बहाती है ताकि स्कूली खेलों के बाद भारतीय टीम में शामिल होकर देश के लिये कुछ कर पाए।
आज सन्ध्या का इंटरव्यू करके बहुत ऊर्जा मिली। सन्ध्या गौतम को दिल से नीला सलाम।
तू ज़िंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर
है कहीं स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर… !
 – सतनाम सिंह
( सुप्रसिद्ध लेखक एवं सक्रिय समाज शास्त्री )

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