करेडा में दलित पिछड़ों पर जारी है अमानवीय अत्याचार !

( जमीनें छीनी , मकान तोड़े , आस्था स्थल ध्वस्त किये और फर्जी मुकदमों में फंसा दिया , आज तक कहीं कोई सुनवाई नहीं,कार्यवाही नहीं ,किसी की कोई जवाबदेही नहीं ,यह कैसा प्रजातंत्र है ? )

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राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का करेड़ा कस्बा विगत दो वर्षों से दलित व पिछड़े समुदाय के लिये अन्याय उत्पीड़न का जीवंत उदाहरण बन गया है ,दलित पिछड़ों से उनके स्वामित्व वाली 25 बीघा जमीन जबरन छीन ली गई है , विरोध करने पर उन्हें ही फर्जी मामलों में फंसा कर जेल भेज दिया गया,जबकि दलित समुदाय द्वारा दर्ज मामले विगत दो वर्ष से या तो जैर तफ़्तीश रखे गये है ,या उन्हें अदम वकु झूठा ही बता कर अंतिम रिपोर्ट दे दी गई है .

इन दलित पिछड़ों के आबादी भूमि में बने लाखों रुपये की कीमत वाले मकानों को रात के अंधेरे में बुलडोजर लगा कर नेस्तनाबूद कर दिया गया ,आज भी ध्वंस के अवशेष के रूप में मलबा मौके पर मौजूद है ,इतना ही नहीं बल्कि एक संत ने इन अपने ही स्वधर्मी दलित पिछड़ों के कुलदेवताओं की दर्जनों मूर्तियां तोड़ डाली ,आस्था स्थल को ध्वस्त कर दिया.

इस सब अन्याय और तांडव को शासन और प्रशासन खामोशी के साथ देखता रहा ,कमजोर वर्ग के पीड़ितों के बचाव के लिए उसने कुछ नहीं किया ,उल्टे उन्हीं को धमकाया , पीड़ितों को ही फंसाया और कानून एवम व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी , हम जैसे कथित बुद्धिजीवी ,मीडियाकर और दलित रहनुमा भी इस अन्याय में सहयोगी रहे .

…अन्यायकर्ताओं के साथ मैं भी था !

मैंने भी प्रारम्भ में गलत तथ्यों की वजह से इन अन्यायकारी लोगों का साथ देने का ‘ अपराध’ किया और इस अन्याय को सिर्फ ‘प्रोपर्टी का विवाद’ कहने की ऐतिहासिक भूल की , इसके लिए मैं सार्वजनिक रूप से सब पीड़ितों और न्याय समानता का संग्राम करने वाले साथियों से माफी मांगता हूं ।

मेरी तरह हजारों और लोगों ने भी जनभावनाओं और गलत जानकारियों से भ्रमित हो कर गलत का साथ दिया ,अन्याय का पक्ष लिया ,उत्पीड़नकारी शक्तियों का सहयोग किया ,जो कि स्वयं में ही सबसे बड़ा अपराध है , पिछले दिनों मैंने इस भूल को सुधारने के लिए पीड़ितों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर माफी मांगी और उनको न्याय के लिये किये जा रहे उनके संघर्ष में सम्पूर्ण सहयोग देने की प्रतिबद्धता प्रकट की ।

यह इंसाफ की जंग के साथ खड़े होने की दिशा में हमारी प्रथम पहलकदमी है ,इसी के तहत करेड़ा की अन्याय गाथा को आपके समक्ष रख रहा हूँ ,कृपया पढ़ें ,विचारें और इंसाफ के लिए होने जा रहे इस आंदोलन के सहभागी बनें –

एक झटके में ‘भू-अधिकार’ से वंचित कर दिए गये दलित पिछड़े !

मसला यह है कि करेड़ा कस्बे में भीम रोड़ पर 25 बीघा जमीन स्थित है ,यह जमीन देश की आज़ादी से पहले 17 फरवरी 1945 के दिन खटीक समुदाय तथा टांक समुदाय के लोगों ने तत्कालीन राजा से खरीदी ,यह जमीन राजाओं की ओर से मन्दिर के पुजारियों को पूजा अर्चना हेतु दी गई थी ,लेकिन बाद में भूस्वामियों द्वारा खटीक व टांक समाज के काश्तकारों को बेच दी गई ,नए खरीददारों को कब्ज़ा भी सुपुर्द कर दिया गया ,तब से ये दलित एवं पिछड़े वर्ग के किसान इस 25 बीघा जमीन आराजी संख्या 2307 से 2318 तक के मालिक रहे.

1947 में देश आजाद हुआ , 1950 में संविधान लागु हुआ , 1955 में राजस्थानी काश्तकारी अधिनियम बना ,इन काश्तकारों के नाम रिकॉर्ड में दर्ज हुए ,कब्जा था ही ,खातेदारी भी मिल गई ,मगर बाद में कई वर्षों पश्चात सेटलमेंट में गड़बड़ी करते हुए इसे मंदिर माफी की जमीन के तौर पर क उल्लेखित कर दिया गया,और बाद में 1991 में राजस्थान सरकार द्वारा जारी एक सर्कुलर की आड़ में इस जमीन को मन्दिर मूर्ति के नाम कर दिया गया ,हालांकि शीघ्र ही राज्य सरकार को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने इसे लिपकीय भूल मानते हुए सुधारने का रिवाइज्ड सर्कुलर जारी किया, लेकिन इन दलित पिछड़े काश्तकारों में जागरूकता का अभाव होने की वजह से कागजों में जमीन मन्दिर की चलती रही और मौके पर काबिज दलित पिछड़े किसान ही रहे ।

इस बीच चंपा बाग चारभुजानाथ मन्दिर के महंत परशुराम दास ने कानूनी लड़ाई जारी रखी ,कोर्ट में मामले चलते रहे ,लेकिन मौके पर दलित पिछड़े ही मालिक बने रहे ,उनके हक अधिकार से उन्हें कभी बेदख़ल नहीं किया गया । बाद में परशुराम दास की मौत होने पर सरजुदास महाराज को महंतई की चादर दी गयी ।

महंतई मिलते ही सरजुदास महाराज ने मंदिर माफी की न्यायालय में विचाराधीन विवादित भूमियों पर कब्जा करने का अभियान शुरू कर दिया ,आम जनता में सुनियोजित तरीके से यह समाचार फैलाया गया कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मन्दिर के पक्ष में होने के बावजूद खटीक तथा टांक समुदाय के लोग जबरन गैरकानूनी रूप से प्राइम लोकेशन की 25 बीघा जमीन पर काबिज है ,इस पूरे जमीन के मामले को धर्म और आस्था का रंग दिया गया ,आम लोगों को भावनात्मक रूप से अपने साथ लेते हुए तथा राजनीतिक लोगों से प्रशासन पर दबाव बनवाते हुए इस जमीन से सभी दलित और पिछड़े समुदाय के काश्तकारों को बेदखल कर दिया गया ,उनकी खड़ी फसलें नष्ट कर दी गई ,खेत कुंएं जबरन कब्जा लिये गये और अकारण ही इन कमजोर तबकों के किसानों का भुअधिकार छीन लिए गए ।

इस पर हंगामा हुआ ,जो कि स्वाभाविक ही था ,मुकदमें भी दर्ज हुए ,14 जुलाई 2015 को इस बेदखली के विरुद्ध दलित खटीक समाज की महिलाएं विवादित भूमि पर जाकर बैठ गई और उन्होंने अपना विरोध दर्ज करवाया ,लेकिन इन दलित स्त्रियों की संख्या बहुत कम थी ,सामने आस्थावान लोगों की अनगिनत संख्या थी ,अंततः प्रशासनिक दखल से इन्हें हटा दिया गया ,मगर इस बीच इन प्रदर्शनकारी दलित औरतों से भीड़ ने बदसलूकी की ,उनके साथ मारपीट और छीनाझपटी के आरोप भी उनकी तरफ से दर्ज मुकदमे में लगाये गये है ।

जमीन छीनने के खिलाफ दलित समुदाय की तरफ से थाना करेड़ा में मुकदमा 127/15 दर्ज करवाया गया ,जिसमें पुलिस ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं की ,ढाई साल बाद भी दलित उत्पीड़न के इस गंभीर मामले में सिर्फ अनुसंधान जारी है ,ऐसा पुलिस अधीक्षक भीलवाड़ा का कहना है ,जबकि दलितों और पिछड़ों के खिलाफ दर्ज प्रकरण संख्या 125/15 में महज 2 माह बाद ही चार्जशीट पेश कर दी गई ।

हद तो यह है कि दलित महिलाओं द्वारा दर्ज करवाई गई एफआरआई 126/15 को 7 माह के कथित अनुसंधान के बाद अदम वकु झूठा मानते हुए फाईनल रिपोर्ट पेश कर दी गई ।
यह है राजनीति से दुष्प्रेरित एकतरफा पुलिसिया कार्यवाही,जिसमें दलितों द्वारा दर्ज दो मुकदमों में से एक को फर्जी बता दिया गया और दूसरे में आज तक जांच जारी है ,जबकि दलित व पिछड़े समुदाय के लोगों पर दर्ज मुकदमे में सिर्फ 2 महीने में ही अनुसंधान पूरा करके चालान ही पेश कर दिया गया ।

अन्याय ,उत्पीड़न और हकतराशी की यह तो छोटी शुरुआती कहानी है ,असल मे दलित पिछड़े वर्ग से शर्मनाक उत्पीड़न और लोकतंत्र को शर्मिंदा करने वाले अन्याय की पूरी गाथा सुनकर तो कोई भी यह कहे बिना नहीं रहेगा कि एक आज़ाद मुल्क में ऐसा कैसे संभव है ? प्रजातन्त्र में प्रजा के खिलाफ इतनी बड़ी साजिश किसने की और किनके सहयोग से सफल हुई ?

बने बनाये आशियाने उजाड़ दिये !

” लोग टूट जाते हैं , एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते, बस्तियां गिराने में ? ”

महंत सरजू दास की अगुवाई में 26 फरवरी 2017 की रात के नीम अंधेरे में दलित बस्ती पर बुलडोजरों से हमला हुआ ,उस वक़्त करेड़ा सो रहा था , लोग गहरी नींद में थे ,तब बस्ती उजाड़ने की इस साज़िश को अंजाम दिया गया ,यह भी चिंता नहीं की गई कि इन घर दुकानों में सोये लोगों की जान जा सकती है ।

संपत्ति की ऐसी भी क्या लालसा कि इंसान की इंसानियत ही खो जाये ,लेकिन उस रात करेड़ा में यही हुआ ! घनी रात में लगभग 2 बजे हमला हुआ ,लोगों को इसकी कल्पना भी नहीं थी कि कभी इस तरह दुश्मन देश की तरह आक्रमण होगा ,जिन्हें सदैव श्रद्धा से देखा हो उनके हाथों में तलवार ,सरिये ,लाठियां ! यह संतत्व का कैसा रूप था ? जो जमीन के लिये मरने मारने पर उतारू था ।

रात की नीरवता दलित पिछड़े बच्चों , बुड्ढ़ों और स्त्रियों की चीखों से भंग हो गई थी ,राम का प्रतिनिधि अन्यायकारी फ़ौज का सेनापति बना फुंकार रहा था और राज के प्रतिनिधि अपनी शाश्वत नपुंसकता के चलते थर थर कांप रहे थे, जिनके प्रति संवैधानिक जवाबदेही थी ,उनके संरक्षण की जिम्मेदारी को निभाने की बजाय मंहतई के चरणों मे शासन और प्रशासन भूलुंठित था ।

उस रात निरीह पीड़ितों का आर्तनाद जिन्होंने भी सुना ,उनका हृदय फट गया ,कईं लोगों ने उस तांडव को अपनी आंखों से देखा ,धर्म और सत्ता की आम जनता के विरुद्ध रात के अंधेरे में जुगलबंदी जारी थी ,जन साधारण ने कुछ नहीं बोला ,मगर सुबह जिन्होंने भी बने बनाये घरों को घरौंदों में तब्दील देखा ,आशियानों को मलबे में परिवर्तित देखा तो ,सबकी जुबान पर एक ही आवाज थी – यह तो अन्याय है ! लोगों के घर तोड़ने की क्या जरूरत थी ? ये कैसे सन्त है ? ये कैसे महंत है ? ऐसा जुल्म क्यों किया ? यह तो ठीक नहीं हुआ !

उस रात 7 लोगों के घर और कुछ लोगों की दुकानें तोड़ दी गई ,बमुश्किल एक आध घर बच पाया ,बाकी सब घर जुल्म के ढेर में बदल गए थे,यह देखकर सबकी जुबान से धिक्कार का अल्फ़ाज़ निकला , अर्धरात्रि का यह अन्याय पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में हुआ ,मानवता को शर्मसार करने वाला यह कृत्य जब किया गया तब थानेदार और तहसीलदार मौके पर सशरीर मौजूद थे , इस तांडव को जब वे ही नहीं रोकना चाहते थे तो फिर कौन रोकता ?

लोगों की ज़िंदगी भर की उम्मीदें ज़मीदोज़ की जा चुकी थी ,घर,दुकान,मकान सब अब मिट्टी का ढेर थे ,कोई सुननेवाला नहीं था, राज खामोश था ,कानून के प्रहरी जालिमों के चरणों मे नतमस्तक थे और पीड़ित चीखने के अलावा कुछ भी करने की स्थिति में नहीं थे ,जुल्म की ऐसी कहानी सिर्फ फिल्मी हो सकती है ,पर करेड़ा में हकीकत में घट रही थी ।

मगर उस रात के घटनाक्रम ने करेड़ा के अमन पसंद और न्यायप्रिय लोगों के जमीर को जगा दिया ,ज्यादातर लोगों ने दलित पिछड़े व अन्य लोगों के घर उजाड़ने वाले धर्म पुरुष से किनारा कर लिया , कहा कुछ नहीं ,मगर अपनी आस्था और आदर के भावों को तिरोहित हो जाने दिया ,उन्हें धर्म ,आस्था और आध्यात्मिकता के नाम पर किये जा रहे भावनात्मक भयादोहन से मुक्त होने का अवसर मिल गया ,वे समझ पाये कि इस सारे प्रकरण का मकसद धर्म का उन्नयन नहीं था ,बल्कि असली मकसद तो जमीन हड़पना था ,लोगों के घर उजाड़ना था और जुल्म ढाना था । फ़िज़ा बदलने लगी ,बदलनी ही थी ,जुल्म जब हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो वह स्वयं ही मिट जाता है अथवा इंसाफ का औजार बन जाता है ।

घटना की एफआईआर के मुताबिक 26 फरवरी 2017 की रात करेड़ा कस्बे के ऐतिहासिक हनुमान दरवाजे के पास स्थित ग्राम पंचायत की आबादी भूमि पर स्थित एक बस्ती को हथियारों से लैश साधु संतों ने बुलडोज़र की मदद से उजाड़ दिया ,बचाने आये लोगों को मारा पीटा और सब कुछ ध्वस्त कर दिया ।

एक साल पहले दर्ज मुकदमा संख्या 39/2017 में आज तक चुस्त पुलिस महकमा तफ्तीश कर रहा है ,नामजद एफआईआर है ,जेसीबी के नम्बर है ,वीडियो है ,घटना के फोटो है ,गवाह है ,पूरी घटना एकदम साफ है ,मगर पुलिस अनुसंधान में लगी हुई है , दलित अत्याचार और भारतीय दंड विधान की विभिन्न गंभीर धाराओं में दर्ज मुकदमें में आज तक चार्जशीट पेश नहीं हुई है , न चालान … न एफ आर …जैर तफ्तीश है मामला ,आला अफसर यही जवाब देते है ।

दूसरी तरफ गिराए गए मकानों का मलबा इस लोकतंत्र ,संविधान ,कानून और व्यवस्था के मुंह को रोज चिढ़ाता है ,जिनके घर उजाड़े गये ,उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई ,विस्थापितों का न पुनर्वास हुआ ,न मुआवजा मिला और न ही कार्यवाही हुई ।
मानवाधिकार हनन की सबसे जीवन्त मिसाल और अन्याय का स्मारक बने उजड़े घर और उनका मलबा खुद में ही सवाल बन चुके है ,यहां के जागरूक नागरिक ,जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी जब इधर से गुजरते हैं तो इन सवालों के प्रति आंखें मूंद लेते है ,ताकि जवाबदेही से बचा जा सके …लेकिन अब मानव अधिकार का यह सवाल अपनी पूरी ताकत से उठ खड़ा होने वाला है ,तब जिम्मेदार लोग क्या जवाब देंगे ? इसका इंतज़ार है ……!

क्या करेड़ा के दलित पिछड़े लोग हिन्दू नहीं है ?

बात बात में धार्मिक भावनाएं आहत हो जाने की दुहाई देने वाले धार्मिक संगठन और धर्मरक्षकों से करेड़ा के पीड़ित दलित और पिछड़ों का यह सवाल है कि क्या वे उन्हें हिन्दू नहीं मानते ? अगर मानते है तो जब उनके आस्था स्थल को क्षति पंहुचाई गयी, उनके पुरखों की मूर्तियां तोड़ी गई और उनके अवशेष तक चुरा कर ले जाये गये ,तब कोई क्यों नहीं बोला ? क्या दलित पिछड़ों की धार्मिक भावनाएं अधार्मिक होती है या इतनी कठोर होती है कि वे आहत होने से बची रहती है ?

30 नवम्बर 2017 को करेड़ा थाने में दलित खटीक समुदाय के लोगों द्वारा दर्ज करवाई गई एफआईआर क्रमांक 185/17 का मज़मून इस प्रकार है -” पटवार हल्का करेड़ा के क्षेत्राधिकार में स्थित आराजी संख्या 2319, 2321 तथा 2572 एवं 2581 पर करीब 100 बरस से खातेदार के रूप में हमारा कब्ज़ा चला आ रहा है पर अभी वर्तमान में राजस्व विभाग की गलती से चारभुजा जी स्थान देह चंपा बाग के नाम से रिकॉर्ड में दर्ज है ,उक्त भूमि पर हमने उच्च न्यायालय में एक वाद दायर कर रखा है जो कि विचाराधीन है, इस भूमि पर हमारे पूर्वजों की मूर्तियां 100 सालों से स्थापित है ,जिस पर हम समय समय पर ,त्यौहार एवं उत्सव के मौके पर पूजा अर्चना करते चले आ रहे है. उक्त भूमि पर कल दिनांक 29 नवम्बर 2017 की मध्य रात्रि में भूमाफियाओं एवं सरजुदास महाराज ,उत्तम दास महाराज एवं रात्रि में जो व्यक्ति सत्संग कार्यक्रम में थे ,वो हमसलाह हो कर आये और हमारी आस्था का केंद्र बनी मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया तथा उक्त सभी मूर्तियों को साथ मे लेकर चले गये, जिससे हमारी आस्था को काफी ठेस पँहुची है ,इस घटना के समय मौके पर पुलिस जाप्ता लगा हुआ था ,फिर भी अभियुक्तगणों ने मिलीभगत कर उक्त मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया ।”

एफआईआर आगे कहती है कि -” पूर्व में भी सरजुदास महाराज एवं अन्य संतों द्वारा हमारे मकान एवं दुकानों को तोड़ा था ,उस समय भी काफी विवाद चला, जिसकी रिपोर्ट भी हमने थानाधिकारी करेड़ा ,एसपी ,कलेक्टर, तहसीलदार करेड़ा और उपखण्ड अधिकारी माण्डल एवं अन्य अधिकारियों को दी,जिस पर भी प्रशासन के द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई तथा न ही महाराज को पाबंद किया गया ,जिससे अभियुक्तगणों के हौंसले बुलंद हो गये एवम कल उन्होंने यह घटना कारित कर दी ”

एकदम साफ मामला है ,नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाई गई है ,सख्त कार्यवाही की मांग की गई ,5 दिन का अल्टीमेटम भी दिया गया ,मगर आज तीन माह गुजर जाने के बाद भी मूर्ति भंजकों और प्रतिमा चोरों तथा धर्म स्थल तोड़ने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई ,पुलिस का वही रटा रटाया सा जवाब है – “ अनुसंधान जारी है ,मतलब मुआमला जैर तफ़्तीश है । “

इस प्रकरण में मूर्ति भंजक महाराज और दलित पिछड़ा विरोधी पुलिस से ज्यादा उम्मीद नही है ,मगर उन लोगों से जरूर सवाल है जो हिंदुत्व का झंडा उठाये घूमते है ,जो सामाजिक समरसता की बातें करते है ,जो हिंदवा सोदरा सर्वे कहते थकते नहीं है ,जिन्होंने हिन्दू खटीक जाति का इतिहास लिखवा कर छपवाया है और जो एक मंदिर ,एक कुआं और एक शमशान का उदघोष लगाते हैं ,जो धार्मिक भावनाओं के भड़कने ,नहीं भड़कने की घोषणा करते है और जिनके कांधों पर समग्र हिन्दू समाज की रक्षा का दायित्व है ,वे एकदम खामोश है ,उनकी चुप्पी काफी भयानक हो चली है ।

हर छोटी बड़ी बात पर आहत भावनाएं लिए घूमने वाले इन धर्मरक्षकों की भावनाएं 50 से अधिक मूर्तियों के तोड़ दिए जाने के बावजूद आहत नहीं हुई , ना भगवे झंडे सड़कों पर उतरे ,न रास्ते जाम हुए, न बाजार बंद किये गये ,न नारे लगे ,न गिरफ्तारी की मांग उठी ,न धर्म खतरे में पड़ा ,दरअसल कुछ भी वैसा नहीं हुआ ,जैसा एक मूर्ति के तोड़े जाने पर होता है ,मूर्ति भजन का सब कुछ शांति से संपादित हो गया ।

शायद यह आज़ादी के बाद देश में पहला मौका होगा ,जब किसी हिन्दू संत ने ही अन्य हिंदुओं की मूर्तियां तोड़ डाली ,मगर इस कृत्य की कहीं निंदा तक नहीं की गई ,कोई हिन्दू संगठन दलित पिछड़े समुदाय के हिंदुओं के पक्ष में नहीं बोला , चूं तक की आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी और आज तक भी कोई स्पंदन नहीं ,आखिर यह क्या दोगलापन है ,एक तरफ छोटी छोटी सी बात पर आसमान सिर पर उठा लेने वाले समूह क्यों उफ्फ तक नहीं किये ? उन्हें कौन रोक रहा था ?

सवाल उठना तो स्वाभाविक ही है कि कोई प्रचारक ,कोई विचारक ,कोई धर्मध्वजा धारी ,कोई धर्माचारी क्यों इन दलित पिछड़े हिंदुओं की आहत भावनाओं के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ ? क्या करेड़ा के दलित पिछड़े ,जिनसे उनकी ख़रीदशुदा जमीन छीन ली गई, जिनके पट्टेशुदा मकान ,दुकानें तोड़ दी गई ,जिनके पूर्वजों की मूर्तियां तोड़ दी गई और इस जुल्मों सितम का विरोध करने पर जिन्हें मारा पीटा गया ,जिनको फर्जी मुकदमों में फांस कर जेल भेजा गया ,ये पीड़ित दलित पिछड़े क्या हिन्दू समुदाय का अंग नहीं है ?

इसका जबाव स्थानीय शाखा प्रमुख देंगे या संघ प्रमुख ? विहिप वाले भाईसाहब बोलेंगे या कोई परम् पूज्य प्रचारक जी ? कौन बोलेगा और कब बोलेगा ? बोलेगा भी कि नहीं बोलेगा ? बोलिये तोगड़िया जी और भागवत जी ,क्या कहते है आप ? करेड़ा के पीड़ित दलित पिछड़े हिंदुओं को न्याय दिए बगैर आप समग्र हिन्दू समाज के नाम पर कुछ भी कहने का क्या नैतिक अधिकार रखते है ? हिप्पोक्रेसी अब नहीं चलेगी ,करेड़ा ने आपके हिंदुत्व के अंदर के छिद्र सार्वजनिक कर दिए है ,अब दलित पिछड़े पूंछ रहे है कि आपकी हिंदूवादी व्यवस्था में हमारी औकात और स्थान क्या है ?

आर्थिक रूप से कमर तोड़ी और मुकदमों में फंसा कर अपराधी बनाने की घृणित साज़िश की !

करेड़ा के दलित को न केवल उनकी खुदकाश्त जमीन से जबरिया बेदखल किया गया ,बल्कि उनके मकान व दुकानें तोड़ कर उनकी आर्थिक रूप से भी कमर तोड़ने का पूरा प्रयास किया गया ।चूंकि प्राइम लोकेशन पर दलितों के घर और दुकानें थी ,जिनसे किराया आता था ,स्वयं के भी बिजनेस चलते थे ,कुछ लोगों ने बैंक से लोन ले कर यह मकान दुकान निर्मित किये थे ,उनसे होनेवाली आय से उनकी बैंक किश्तें चुकती थी ,एक विधवा जिसके परिवार में सिर्फ किशोर वय का पौत्र ही एकमात्र कमाऊ सदस्य है ,उसे अपनी दुकान के किराए से मिलने वाली राशि से उसका चूल्हा जलता था ,उसकी भी दुकान तोड़ दी गई ,अब उसकी रोजी रोटी का कोई ज़रिया बाकी नहीं रह गया है ,उसे भुखमरी के कगार पर पंहुचा दिया गया है ,कई लोग बैंक की किश्तें नहीं चुका पा रहे है तो कईंयों को रोजगार के लिए पलायन करके अन्यत्र जाना पड़ा है ।

जिनके घर तोड़े गये है ,उन्हें किराए के मकानों में रहना पड़ रहा है ,बहुत सारे लोगों के स्थानीय रोजगार छिन गये है ,जिन लोगों के पास उचित मूल्य की राशन की दुकानें थी ,उनको भी जमकर परेशान किया गया ,जांचें ,शिकायतें ,औचक निरीक्षण से मन नहीं भरा तो लाइसेंस तक निरस्त किये गए ,कुलमिलाकर यह प्रयास किया गया कि आर्थिक रूप से दलित खटीक समाज के लोग पूरी तरह से पंगु हो जाये और वे कभी सिर उठा कर भी जी नहीं पाये ।

भूमिहीन किया ,आवासविहीन किया ,आजीविका छीनी ,इससे भी मन नहीं भरा तो झूठे मुकदमों की झड़ी लगा दी गई, करेड़ा में इस विवाद के बाद से दोनों पक्षों के मध्य 11 मुक़दमे दर्ज हुये , 4 मुकदमें दलित समुदाय की ओर से दर्ज करवाये गये ,जबकि शेष मुकदमें दलित समुदाय के खिलाफ रजिस्टर्ड किये गए। दलितों द्वारा दर्ज करवाये गये एक भी मुकदमें में आज तक चालान पेश नहीं किया गया ,अलबत्ता दलित महिलाओं के साथ हुए यौन उत्पीड़न और अत्याचार के अत्यंत गंभीर मामले को अदम वकु झूठा बता कर अंतिम रिपोर्ट पेश कर दी गई, जिसकी भनक तक दलित समुदाय को नहीं लगने दी गई ,दूसरी तरफ दलितों और पिछड़ों के ऊपर लगे सभी मुकदमों में चालान पेश हुए ,चार्जशीट दाखिल की जा कर बाकायदा गिरफ्तारियां की गई ,यहां तक कि दलित स्त्रियां भी हवालात में रखी गई ,दलित पुरुषों को जेल भेजा गया ,पाबंद करने का तो रोजमर्रा का ही काम बन गया ।

पूरी कोशिश की गई कि जो भी लोग इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाये, उसपर कोई भी मुकदमा ठोक दिया जाये, ताकि अगली बार वह बोलने लायक नहीं रहे ,आज हालात यह है कि दर्जनों दलित स्त्री पुरुष विभिन्न थानों और कोर्ट कचहरियों के चक्कर काट रहे है ,उनका धन ,श्रम और संसाधन इसी में खर्च हो रहा है ।

साज़िश यह की गई कि दलितों पर इतने मुकदमें लाद दिए जाएं कि उनकी हिस्ट्रीशीट खुल जाए और वे हिस्ट्रीशीटर घोषित हो जाएं ! इस आपराधिक साजिश में लोकसेवक भी बराबर के गुनाहगार हैं ,उनकी भी मिलीभगत साफ दृष्टिगोचर होती है ,जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी कम संदिग्ध नहीं कहीं जा सकती है ,वे भी शरीके गुनाह ही है ,पुलिस ,सामान्य प्रशासन और तमाम सारे अन्य कारकुन सिर्फ और सिर्फ दलितों पिछड़ों को हर तरह से बर्बाद करने के लिए चलाये गये अभियान का हिस्सा बनकर अपनी वास्तविक जिम्मेदारी और जवाबदेही से विमुख हो चुके थे ,ये सभी लोकसेवक दलित उत्पीड़न कानून के तहत आरोपी बनने लायक है ,इनकी भूमिकाओं की विशेष जांच करवाये जाने की जरूरत है ।

अब सवाल यह है कि करेड़ा के दलित पिछड़े लोगों का कसूर क्या है ? करेड़ा के निवासी होना या दलित वंचित समुदाय से होना अथवा अपने हको हकूक के ख़ातिर संघर्ष करना ? क्या यही दोष है ? अगर न्याय मांगना अपराध है तो वे अपराधी है ,नहीं तो अपराधी वो लोग है जिन्होंने अन्याय किया है ,जिन्होंने इनकी जमीन छीनी ,जिन्होने इनकी औरतों से बदसलूकी की ,जिन्होंने उनकी दुकान मकान गिराये ,आर्थिक सामाजिक बहिष्कार किया ,जिन्होंने उनके धर्मस्थल तोड़े ,जिन्होंने क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी की ,वो कसूरवार है ,धर्म की आड़ में जिन्होंने करेड़ा के इन निरीह नागरिकों के संवैधानिक अधिकार छीने है ,वे आरोपी है ,वे ही नामजद अभियुक्त है और वो ही कसूरवार ठहरेंगे ।

हमें तय करना है कि हम किधर है ? न्याय के साथ या अन्याय के साथ ? पीड़ितों के पक्ष में या ज़ालिमों के संग में ? कल जब वक़्त जवाब लेगा तो हम कहाँ ,किनके साथ खड़े मिलेंगे ,शोषकों के साथ या शोषितों द्वारा शोषण के खिलाफ किये जा रहे प्रयासों के साथ ?
फैसला हमारे ही हाथ में है ,तटस्थता की आड़ में अपनी खाल मत बचाईये ,जो तटस्थ होने का नाटक करेंगे ,उनका अपराध भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज होगा ,अपना पक्ष चुनिये ,पीड़ितों का साथ दीजिये ,सत्ता और सत्य के इस संघर्ष में सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस कीजिये ।

हमने करेड़ा में दलित पिछड़े वर्ग पर विगत ढाई बरसों से जारी ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया है ,आज घटना स्थल का दौरा किया गया और पीड़ितों से मुलाकात की गई ,कल और परसों कईं जवाबदेह और जिम्मेदारों से रूबरू बात करेंगे और अगर बात नहीं बनी ,न्याय की उम्मीद नहीं लगी तो 14 मार्च 2018 को भीलवाड़ा की तरफ कूच करेंगे ,आप सब लोग इस न्याय हेतु किये जा रहे सत्याग्रह में सादर आमंत्रित है ,कृपया शिरकत करें ,इंसाफ की इस लड़ाई में भागीदारी निभाएं ।

– भंवर मेघवंशी
( लेखक मानव अधिकार संगठन ‘पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज’ की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य है,उनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है )

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