उग्र भ्रामक भीड़ में भारत का भविष्य

- बाबुलाल सोलंकी

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लोकतंत्र में संवैधानिक तरीके से सड़कों पर उमड़ती भीड़ ये अहसास कराती है कि लोकतंत्र को मिटाना इतना आसान नही,जितना मीडिया द्वारा बढ़ा चढ़ा कर दर्शाया जाता है,ये सत्य भी है कि भीड़ लोकतंत्र का प्राण है। इसलिए कई राजवैज्ञानिक बड़े फक्र के साथ लोकतंत्र को भीड़तंत्र भी कहते है । किन्तु तुच्छ स्वार्थ ओर राजनीतिक पदलोलुपता से घिरे राजनैतिक सामाजिक लीडर जिस तरह से देश की आम जनता को झूठे मिथ्या-भ्रामक तथ्यों ओर घटनाओं का सहारा लेकर आए दिन बाजार,कस्बे ,शहर और राजधानियों को बंद करवाने में लगे हुए है जिसमे लोकतंत्र का हित कंही दिखता नही। हम इस बात से सहमत है कि लोकतांत्रिक राजव्यवस्था में जनता को अपनी बात हक के लिए क्रमश ज्ञापन,चेतावनी,प्रदर्शन,धरने, हड़ताल,अनशन ओर जरूरत पड़े तो उग्र आंदोलन से आमरन अनशन तक जैसे संवैधानिक हथियार मिले हुए है किंतु उनका समुचित प्रयोग करना भी एक कला है जो लोकतंत्र के आभूषण की तरह है बशर्ते है कि वो वांछित हो।

समाज की विडंबना कहिये या पथभ्रमित जनसमूह का मानसिक दिवालियापन जिनका नेतृत्व मुट्ठीभर लोग स्वार्थ,छिछोरी राजनीति, सस्ती लोकप्रियता की चाहत ओर रातोरात हीरो बनने की होंडाहोड़ी में अपनी जाति पंथ,सम्प्रदाय, संगठन,झण्डे के सहारे युवा शक्ति को सड़कों पर उतारे जा रहा है। जिन हाथो में कलम किताब कम्प्यूटर होने चाहिए थे उनके हाथों में अपनी अपनी रंग के झण्डे ओर डंडे थमा दिए है । कंही कही तो दृश्य तब ओर भयावह हो जाते है जब हजारो के जनसमूह के हाथों में लहराती तलवार,लाठियां,पत्थर,छुरे उछलते है । जिन जुबा से हर वक्त जन-गण-मन का गान या माँ भारती का जयघोष निकालना चाहिए उनकी जुबा से धर्म पंथ संगठन और शियासत के नाम नफरत ओर बगावत के नारे रटाए ओर बुलाए जाते है। ये हम कैसा भारत बनाने जा रहे है ।

विश्व मे प्रचलित वाद ओर धारणाए से इतर उन्ही वाद के नाम पर नेतृत्व कर्ता अपने हितस्वार्थ के उद्देश्य जोड़ कर समाज,संगठन और धर्म को बदनाम ओर गुमराह किये जा रहे है । अब वक्त आ गया है कि युवा भ्रामक,मिथ्या ओर मीडिया में तेजी से फैलती सनसनीखेज खबरों को उदार नजरिये से सोचे समझे और समाज को अपना आदर्श नेतृत्व दे,न कि किसी का संगठन या व्यक्ति का मोहरा बने । आज जाति और धर्म के नाम पर जिस तरह से राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही है उससे भी तीव्र गति से कुछ अतिवादी लोग अपने कुकर्मो को छिपाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है ऐसे सनकी लोग अपने अपराधों में समाज,संघ,धर्म,पंथ को गुमराह कर हजारो की भीड़ को भागीदार बनाने से परहेज नही करते उसी की आड़ में कई लोग भ्रामक भीड़ के सहारे जिसे जमीनी हकीकत से कतई सरोकर नही,वस्तुस्थिति का पता तक नही बस उन्हें तो आकाओं के आदेश का इंतजार रहता है । उनका मुकाम क्या है ये तो बस तुगलकी फरमान जारी करने वाले ही जाने, इस तरह भ्रामक भीड़ खतरनाक तब ओर हो जाती है जब उसे धर्म और जाति के दोगले बनावटी स्वाभिमान से जोड़ दिया जाता है। हाल ही में घटी घटनाए चाहे वो भीमकोरेगांव हो या अफराजुल की निर्मम हत्या हो,केरल में संगठन विशेष के कार्यकर्ता की हत्या हो या फिर गौरी लंकेश की हत्या । अंधभक्ति ओर अंधश्रद्धा का सत्य से कभी दूर तक वास्ता नही रहा है स्वभाविक है जिन्हें आप पसन्द करते है उनके अवगुण आप कभी देख नही पाएंगे और जिससे नफरत करते है उनके गुण कभी तलाश नही पाएंगे ।

आज हर कोई भीड़ के द्वारा अपनी ताकत दिखा रहा है जिसमे हद तक उन्हें सफलता भी मिल रही है क्योंकि भीड़ ही उन्हें सत्ता के गलियारे तक पहुचती है। पर भ्रामक भीड़ राष्ट्र और राष्ट्रीयता के लिए कितनी खतरनाक होती है उनका अनुभव हम रामपाल ओर रामरहीम की अंधश्रद्धा भीड़ में देख चुके है जिन्होंने बिना हकीकत जाने सैंकड़ो गाड़िया,बस ओर वाहन फुंके डाले वही करोड़ो की सार्वजनिक सम्पतियों में आगजनी,लूट पाट कर नष्ट कर दिया गया । जिनके आकाओं ने अपने कुकर्मो को छिपाने के लिए आम जन से लेकर बुद्धिजीवी लोगो को भी सम्मिलित किया । मेरी दृष्टि में बुद्धिजीवी होने के लिए व्यवसायीक कागजी डिग्रियों की जरूरत नही होती और यदि केवल डिग्रियां ही बुद्धि का पैमाना है तो मैं ऐसे पैमाने को बाथरूम के सिवाय जगह नही दूंगा। डिग्रियां हमे पेशाप्रमुख बना सकती है अपराध मुक्त नही, आलेखन के दौरान ही देश मे एक महत्वपूर्ण घटना घटी कि देश के चार प्रमुख न्यायधीशों ने चीफ जस्टिस पर गंभीर आरोप लगाए ।

मीडिया को मसाला मिल गया हफ्तेभर के लिए खबरों की सनसनी मिल गई । मीडिया मंथन की बजाय ट्रायल में लग गया, जैसे महाभियोग का अधिकार उन्हे ही प्राप्त है पहले से पूर्वाग्रसित भीड़ ने अपने अपने कबीले खंगाले कौन न्यायमूर्ति किस खेमे से आता है देश प्रदेश दिशा और रंग से अपनी तरह से फैसले किये जा रहा है । किस जज ने कब कौनसे फैसले दिए, को जात धर्म से जोड़कर योग्यता पर ही प्रश्न खड़े किए जा रहे है । जज कोई भगवान नही,फरिस्ता नही की उस पर किसी का प्रभाव नही हो वह स्वभाविक रूप से सामाजिक प्राणी है पूर्वाग्रह स्वभावतः है, को स्वीकार कर लेने में हर्ज नही है जिन पर चर्चा करने की बजाय गलती तलाशी जा रही न्यायपालिका के इतिहास के गर्भ में क्या छिपा है, पर नही बोला जा रहा । बल्कि इतिहास लिए नया कंटेंट बनाया जा रहा है ।
मित्रो !

इतिहास का पहिया कभी रुका नही है । हर बार उसने नई दूरी तय की, नए आयाम बनाए है किंतु अतिवादियो को कौन समझाए की इतिहास कभी दुबारा उसी पन्ने पर नही लिखा जाता है । उसे दोहराया नही जाता किन्तु हर बार लोगो को उन्ही मुद्दो पर गुमराह करना कि अब राम ,रावण मार्क्स लेनिन का पुनः साम्राज्य स्थापित होगा तो समझ लो ये मुंगेरी लाल को हसीन सपनो में भ्रमित किया जा रहा है.मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस सृष्टि के रहते इतिहास में किसी घटना का पुनरागमन संभव नही है मेरे पास कारण है इतिहास बनाने वाले किरदार हर बार अलग अलग होते है उनकी शैली और सामान एक जैसे हो सकते है किंतु परिणाम कभी एक जैसे नही हो सकते एक चिंतन शील व्यक्ति 5000 वर्ष के इतिहास को उठा कर देख सकता है।हर बार के संघर्ष,युद्ध,आक्रमण,वाद धारणाओं ने एक नई व्यवस्था को जन्म दिया है अतः सुनहरे भारत समृद्ध भारत, सुसंस्कृत भारत के निर्माण में लगे तमाम अतिवादी, बुद्धिवादी,जातिवादी,संगठनवादी,धर्म,पंथ से जुड़े प्रत्येक भारतीय को अपने नजरिये से स्वतंत्र रूप से चिंतन करने की जरूरत है कि हम भविष्य में कैसा भारत चाहते है?

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