सुखराम नट के गांव में

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( ईशमधु तलवार )
वैर से कोई चार किमी लंबी सड़क, जिसमें सड़क नाम की चीज अब कहीं-कहीं पर ही बची है, मुहारी गांव ले जाती है। दोनों ओर लगे जामुन और अमरूदों के बागों की खुशबू हम तक अपने आप पहुंच जाती है, क्योंकि इस बीहड़ रास्ते पर धीरे-धीरे ही चलना पड़ता है, तब जाकर मुहारी आता है। मुहारी- यानी सुखराम नट का गांव। सुखराम नट- यानी रांगेय राघव के सर्वकालिक क्लासिक उपन्यास “कब तक पुकारूं” का नायक।
सुखराम जैसे दलित और हाशिये के लोग रांगेय राघव जैसे संवेदनशील लेखक के पन्नों पर आकर ही प्रमुख स्थान पाते हैं और नायक की हैसियत हासिल करते हैं।
हमारे गांव पहुंचते ही नट परिवार के बच्चे, स्त्री और पुरुष इकट्ठे हो गए। उन्हें इस बात पर गर्व था कि वे सुखराम की संतति हैं, जिन्हें रांगेय राघव ने  इतिहास में दर्ज करा दिया। रांगेय राघव जब कैंसर से जूझ रहे थे, तब  सुखराम ने भी उनके लिए दुआ की थी और जड़ी बूटियों से उनका इलाज करने की कोशिश की थी।
हम जब गांव पहुंचे तो चरण सिंह पथिक, निशांत मिश्रा और पंडित जी यानी रमेश शर्मा मेरे साथ थे। पंडित जी चारों तरफ घूम कर तस्वीरें उतारते रहे।
इस गांव में सुखराम की चौथी-पांचवी पीढ़ी के लोग रहते हैं। हमारी मुलाकात सुखराम के चार पड़पोतों से हुई-  सुजान, दलेल, रघुवीर और सतीश। “कब तक पुकारूं” सीरियल में सुखराम नट बने पंकज कपूर ने रस्सी पर चलने जैसे जो अनेक हैरतअंगेज करतब दिखाए हैं, उन्हें दरअसल उनके डुप्लीकेट के रुप में सुजान ने ही अंजाम दिया था। सतीश कहता है- ” कइयों के हाथ टूट गए, पांव टूट गए, कई मर गए। खेल-तमाशे अब हम नहीं करते। अब कोई देखता भी नहीं। इसलिए हम मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं।”
नट एक खानाबदोश कौम है, जिनके यहां लिखने-पढ़ने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती। इसलिए इन लोगों को रांगेय राघव के उपन्यास के बारे में तो कुछ पता ही नहीं था। वह तो जब वैर में “कब तक पुकारूं” टीवी सीरियल की शूटिंग हुई, तब जाकर  सुखराम नट उपन्यास से निकल कर  बाहर आए।
दलेल ने बताया कि उनके यहां भी कुछ बच्चे अब पढ़ने लिखने लगे हैं और वे जयपुर भी काम से जाते रहते हैं। मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि जब भी कोई जयपुर आए तो  मुझे फोन कर ले। मैं उन्हें उपन्यास भेंट कर दूंगा। तब एक बच्चे ने कहा-” हम उस किताब की पूजा किया करेंगे।”
सुखराम नट को लेकर कई किस्से सुनाए गए।
 “और फिर कजरी कौन थी?”
यह सवाल  पूछते ही रघुवीर ने तपाक से कहा- ” वो हमारी परदादी थी।”
रांगेय राघव ने क्या ही किरदार गढ़ा है कजरी का- खतरनाक और दिल फ़रेब।
नटों में शव जलाए नहीं जाते, बल्कि  दफनाए जाते हैं। गांव के  पिछवाड़े अमरूदों के बाग के  पास कब्रिस्तान है। रघुवीर कहता  है- “ये हमारे पुरखों के थान हैं।”
इस कब्रिस्तान में सबसे पीछे कब्र है कजरी की। इससे ठीक पहले सुखराम की। ये दोनों कब्र सबसे दयनीय और जर्जर हैं। पत्थर ढीले हो कर निकल चुके हैं, कब्र छोटी होती जा रही है और झाड़-झंखाड़ उग आए हैं।
सुजान कहते हैं- वार-त्यौहार हम यहां आकर सुखराम की मजार पर पूजा करते हैं। सुखराम को गए बरसों हो गए, लेकिन  नटों की जिंदगी आज भी मजारों से लुढ़क चुके पत्थरों की तरह कठोर और उजड़ी हुई है।

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