इतना सा रहूंगा मैं

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– माया मृग
कितना रहता है कोई, जाने के बाद
जितना रहता है, उतना सा रहूंगा मैं…!
रहता है ज़मीन में धंसा हुआ ठूंठ
पेड़ कट जाने के बाद
धूप, पानी हरियाते नहीं, गलाते हैं धीरे धीरे
एक दिन समतल ज़मीन में ढूंढे जाने लगती हैं संभावनाएं
यहां सेमल लगेगा कि नीम
खोदी गई ज़मीन मेंं कभी-कभी निकल आता है कोई रेशा
पुराने पेड़ की जड़ों का ….!
टूटेगा पहाड़ तब भी बाकी रहेंगे छोटे-बड़े पत्‍थर
खेलते रहेंगे बच्‍चे पत्‍थरों से घर बनाकर
हर पत्‍थर एक छोटा पहाड़ है
बुहारने से पहाड़ खत्‍म नहीं होते
कभी न कभी, कहीं कोई पत्‍थर चुभता है
बच्‍चे के पैर में, पर्यटक की आंख में …!
बरसात तक रहती है बरसाती नदी
गुज़र जाती है तो कौन ढूंढता है, कहां गई
मुहानों पर जमी रह जाती है मिट्टी
पाट में पड़े रहते हैं दीमक खाए लकड़ी के छिल्‍लर
यहां-वहां से बहकर आई कुछ अनचीन्‍ही चीजें
जिनके नाम पर बतियाते हैं, बहस करते हैं
कस्‍बे के ऊबे हुए लोग …!
जिस दिन सूख जाएगा समन्‍दर
रह जाएंगी सुन्‍दर सीपियां, कुछ भद्दे घोंघे
और दुर्गन्‍धाती सूखी मछलियां
रेत पर जमी रहेगी तब भी खोजियों की निगाह
जाने कोई मोती छूट गया हो
चिपका रह गया हो प्रवाल भित्तियों पर कोई गुलाबी मूंंगा ..!
नहीं रहोगे तुम
तब भी कोई फरोलता रहेगा
स्‍मृतियों के ढेर को
प्रेम में होने के पल कभी छू जाएंगे उंगुलियों को
नहीं रहने पर भी रहती है एक आश्‍वस्ति स्‍पर्श की
लौट जाएगा कोई मुस्‍कुराहट के साथ …!
नहीं रहता पेड़
ना पहाड़ ना नदी, ना तुम
ठीक इसी तरह नहीं रहूंगा मैं
बची रहेंगी कविताएं कुछ घर के बाहर, कुछ भीतर
सब कुछ भूल जाने के बाद किसी दिन
कोई सुने हुए किस्‍सों में खोजेगा कभी खुद को, कभी मुझको …!
कितना रहता है कोई, जाने के बाद
जितना रहता है
उतना सा रहूंगा मैं
जानता हूं
इतना सा ही बचता है समन्‍दर सूख जाने के बाद
कुछ सुन्‍दर सीपियां, कुछ बदरंग घोंघे….!

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