धर्म निरपेक्षता का पाठ मैंने अपने बचपन से सीखा !

- मंजुल भरत

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बात 1987-88 से शुरू करता हूँ। मैं 10-11साल की उम्र में ही जीवन की एक ऐसी यात्रा पर निकला जो धर्मनिरपेक्षता- जाति निरपेक्षता- क्षेत्र निरपेक्षता की की तीर्थ यात्रा थी। इस यात्रा का पावन धाम था- नवोदय विद्यालय नान्दला।

अजमेर जिले के मेरे जैसे कुल 80 बच्चे पहली बार इस धाम पर आये थे, एक दूसरे से अनजान इन बच्चों के जाति, धर्म और सामाजिक- सांस्कृतिक- आर्थिक स्तर में अनेक भिन्नताएं थी। पहले ही दिन जब मैं हॉस्टल के कमरे में गया तो वहां एक दूसरे से अनजान 8-10 बच्चे पहले से ही मौजूद मिले। इनमें कुछ घर की याद में रो रहे थे और कुछ उन्हें शांत भाव से देख रहे थे। कुछ नटखट बच्चे भी थे, जिन्होंने मेरी संदूक पर इस आशा से नजरें गड़ा रखी थी कि उसमें नमकीन- बिस्किट और घर से लाई अन्य खाद्य सामग्री हो सकती है। कुल मिलाकर हम सबकी चिंता का विषय घर की याद और हम सबकी संदूकों में रखी खाद्य सामग्री होती थी। हमारे किसी की भी चेतना में जाति- मजहब नहीं था।सुबह स्कूल की प्रार्थना सभा में रोज हम नवोदय गीत गाते थे –

” हम नवयुग की नई भारती, नई आरती, हमीं नवोदय हों,
हम स्वराज की रिचा नवल, भारत की नवलय हों,
नव सूर्योदय, नव चंद्रोदय हमीं नवोदय हों,

रंग,जाति,पद भेद रहित हम, हम सबका एक भगवन हो,
संतान हैं धरती माँ की हम,
धरती पूजा स्थान हो,

मानव हैं हम, हलचल हम, प्रकृति के पावन वेश में,
खिले फले हम में संस्कृति, अपने भारत देश की,
हिमगिरी हम, नदियाँ हम, सागर की लहरें हों,
जीवन की मंगल माटी के हमीं नवोदय हों…..!”

भविष्य के सात सालों तक रोज हम इसी नवोदय गीत को गाकर बढे हो गए। हर साल हमारी दुनियाँ में 80 बच्चे और जुड़ जाते थे। इस बीच प्रांतीय माईग्रेशन पालिसी के तहत 9वीं कक्षा में आगे की पढाई के लिए दीव और भरुंच (गुजरात) से भी 20 प्रतिशत बच्चे हमारे पास आये और हमारे 20 प्रतिशत साथी भी दीव व भरुंच चले गए। लेकिन जाति- मजहब- संस्कृति और भाषा भेद के सवाल हमारे जहन में अभी भी नहीं आये। दाल में चीनी मिलाकर खाने का स्वाद हमने उन गुजराती बच्चों से ही सीखा। हमने भी उनको गुड़- दलिए की लापसी और बिना चीनी की दाल- बाटी खाना सिखा दिया।

इन पूरे सात सालों में मुझे असलम खान, बरकत अली और अल्फ्रेड जोसफ कभी अलग तरह के मानव नहीं लगे। उनको भी मैं उनके जैसा ही लगता था। असलम- बरकत के घर से आई ईद की खीर या मीठी सिवेयाँ पर हम अपना हक़ समझते थे। बाल स्वार्थ मन के कारण यदि वो खाने की सामग्री सन्दुक में छिपाकर रखते भी थे, तो हम चुराकर खा लेते थे। हमारे घर से आई खाद्य सामग्री पर वे भी ऐसा ही सलूक करते थे। लेकिन कभी इस बात को लेकर झगडा नहीं हुआ। स्कूल की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में असलम की कव्वाली हो या अल्फ्रेड की यीशू वंदना या हिमांशु शर्मा के भजन हों या किरण रावत का सुरीला गायन हो या शंकर भाई बसावा का गुजराती में “पंछिडा गीत” हो, सभी को चाव से सुनकर आत्ममुग्ध हो जाते थे। गुरूजी चाँदरत्न छंगाणी द्वारा माताजी के मंदिर में गाई “आजा मोरे कंठ मात- भवानी” आरती में असलम- बरकत- अल्फ्रेड सहित हम सब बच्चे भक्तिभाव से शामिल होते थे। पीटीआई सर राजेंद्र धाबाई का ठेठ मारवाड़ी में गाया “मरोडया लाज्यो रे बाजूदार बंगड़ी” गीत पर गुजराती बच्चे भी मन्त्र मुग्ध हो जाते थे। जेदी सर की स्वरचित उर्दू गज़ल उन्हीं की जबान से सुनकर एक नई दुनियाँ में खो जाते थे।

मेस में कब किसकी थाली में खाना खा लिया और कब एक ही थाली का खाना 3-4 मित्रों ने मिलकर चट कर दिया, किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ा। एक दूसरे के कपड़ों को पहनकर इतराने का शोक भी धर्मनिरपेक्ष ही था।

इन सुन्दर लम्हों के बीच 1989 में अयोध्या विवाद के चलते बाबरी मज्जिद ढह जाने और उसके बाद मुंबई में सांप्रदायिक दंगों के उपरांत पूरे देश की आबो-हवा बदली, लेकिन हमारे केम्पस की आबो-हवा अभी भी जहरीली नहीं हुई। 12 वीं कक्षा के बाद जब केम्पस से पास आऊट हुए तो सबकी आँखों में एक दूसरे के लिए आँसू थे। जिस दिन केम्पस में पहला कदम रखा था, उस दिन हम घर की याद में रोये थे और जिस दिन केम्पस छोड़ा, हम अपनी बहु सांस्कृतिक मित्र मण्डली के बिछुड़ने के लिए रोये थे। मेरी नजर में ये आँसू धर्म निरपेक्ष -जाति निरपेक्ष और क्षेत्रिय भावनाओं से निरपेक्ष थे, जिनसे हम सबका मन भीगकर हमारे अन्दर की मनुष्यता पवित्र हो गई थी। किन्तु केम्पस से बाहर आकर हमने जाना कि केम्पस की हमारी मित्र मंडली में कोई मुसलमान था तो कोई हिन्दू तो कोई इसाई। कोई ब्राहमण था तो कोई राजपूत, कोई महाजन था तो कोई दलित- आदिवासी। हालाँकि इतना जानकर भी एक दूसरे के प्रति कभी प्रेम और आदर कम नहीं हुआ। हाँ, उम्र के पकने के साथ वैचारिक मतभेद आना जरुर शुरू हो गया है।

संविधान में लिखी धर्म निरपेक्षता को मैं कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ते समय समझ पाया। इसकी दार्शनिक गहराई गुरूजी *डॉ आलोक श्रीवास्तव* के साथ घंटों किये गए संवाद से समझ में आई। अभी तक इतना समझ पाया हूँ कि धर्म निरपेक्षता किसी *धर्म का विरोध* करने का भाव तो बिलकुल नहीं है। धर्म निरपेक्षता का विचार सभी नागरिकों को *नास्तिक* हो जाने के लिए विवश भी नहीं करता है। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि राज्य का कोई राष्ट्रीय धर्म नहीं होगा, राज्य धार्मिक संस्थाओं का समर्थन नहीं करेगा, धार्मिक शिक्षा का प्रबंधन नहीं करेगा और प्रशासन में धार्मिक भेदभाव नहीं करेगा। धर्म व्यक्ति की निजी आस्था का विषय है, कोई भी व्यक्ति अपने निजी जीवन में हिन्दू- मुसलमान- इसाई- सिख मान्यताओं के अनुसार आचरण कर सकता है। लेकिन जब वह सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करे, तब उससे संवेधानिक आशा की जाती है कि वह अपने धर्म से ऊपर उठकर वैज्ञानिक समझ का परिचय दे।

एस.आर बोमई केस में सुप्रीम कोर्ट के फेसले के अनुसार धर्म निरपेक्षता का यह अर्थ नहीं है कि (1) राज्य धार्मिक मामलों में विरोध का नजरिया रखता है, अपितु उसे विभिन्न धर्मो के विषय में तटस्थ रहना चाहिए। (2) यदि राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जाता है तो राज्य की तटस्था का उल्लघन होगा।

धर्म निरपेक्षता से अभिप्राय सभी धर्मों के प्रति समभाव भी रहा है। यह जातिवाद, द्वेषवाद और अन्धता के विरुद्ध है। भारत के दार्शनिक राजनेता डॉ. राधा कृष्णन ने 1956 में एक भाषण में धर्म निरपेक्षता का समन्वयात्मक नजरिया प्रस्तुत किया-

“जब भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य कहा जाता है, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि हम अदृश्य
आत्मा के यथार्थ को या जीवन में धर्म की प्रासंगिकता को अस्वीकार करते हैं या धर्महीनता को प्रोत्साहित करते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि धर्म निरपेक्षता स्वयं एक सकारात्मक धर्म बन जाती है या राज्य दैवी पूर्वाग्रहों का अनुमान लगाता है….धार्मिक निष्पक्षता या समझ या सहिष्णुता के इस द्रष्टिकोण को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय जीवन में एक भविष्योन्मुखी भूमिका अदा करनी है।”

अपने बचपन की पाठशाला, संविधान के दिशा निर्देशों तथा कोर्ट की व्याख्या के अनुसार धर्म निरपेक्षता का विचार मुझे जीवन को उसकी स्वभाविकता में जीने का ढंग ही लगता है। क्योंकि अगर प्रेम स्वभाविक है और सभी धर्मों का सार मानव प्रेम है तो फिर सार्वजनिक जीवन में धर्मनिरपेक्ष आचरण की संवेधानिक अपेक्षा भी स्वभाविक है .

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