इंसान फिर से पशु हो रहा है ..!

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-भंवर मेघवंशी

मनुष्य का जानवर प्रेम आदिकाल से ही है ,मूलतः मानव भी सामाजिक जानवर ही है, वह प्रारम्भ से पशुपालक और पशुचारक रहा है।
मनुष्य और जानवर में भय ,भूख ,प्रजनन, नींद ,डर आदि के भाव लगभग समान ही है ,सिर्फ चेतना के स्तर पर इंसान आगे होने का दावा कर सकता है।

इंसान अकसर जानवर बनने की कोशिश करता रहता है, कभी क्रोध में तो कभी कभी खुशी के अतिरेक में, ऐसा भी होता है कि अनुयायियों की अविवेकी भीड़ भी अच्छे भले आदमी को खुलेआम जानवर कहने लगती है, जैसे कि यह तो हमारे समाज के शेर है !

जिसको शेर कहा जाता है ,वह फूलकर कुप्पा हो जाता है, अगर उसे गीदड़ कह दो तो नाराज हो जाता है, मारने को दौड़ता है, अरे भाई शेर भी जानवर ही है ,स्वयमेव मृगेन्द्रता कहो, चाहे नाम शेरसिंह रख दो, बात तो वही है।

मनुष्य भी बड़ा अजीब प्राणी है, जिन जानवरों से डरता है, उनकी पूजा करने लगता है, जिनसे नहीं डरता उनकी बलि चढ़ा देता है, इंसान अपनी नस्ल की पैदाइश से लेकर आज तक सर्वाधिक भयभीत जीव है ।

भारत मे कुछ पशुओं को पवित्र, तो कुछ को हराम मानने का रिवाज है,गाय और सुअर के उदाहरण से इसे बखूबी समझा जा सकता है। हालांकि ये दोनों चौपाये शायद ही जानते हो कि इक्कीसवीं सदी का अत्यधिक विकसित मानव उन्हें लेकर क्या सोचता है, वे तो चरने में व्यस्त है,उनको हराम और हलाल से कोई लेना देना नहीं है।

गाय के नाम पर गौरक्षा का अद्भुत कार्य उत्तरी भारत में किया जाता है, जो लोग घरों में कुत्ते पालते हैं और बहुमंजिला फ्लैट्स में रहते हैं, वे लोग गाय की रक्षा के नारे बड़े जोरशोर से लगाते हैं, इनमें से बहुतेरे अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर संगमरमर की गाय दिखावे के लिए पालते हैं।

प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा है कि दुनियाभर में गाय दूध देती है और भारत में वोट ।

गाय ,गधे ,घोड़े-घोड़ी ,बंदर -लंगूर आदि पशु समकालीन भारतीय समाज के बहुचर्चित विषय है,लगभग सारा सवर्ण हिन्दू गाय को लेकर अतिसंवेदनशील है ,हालात इतने क्रूर हो चुके हैं कि गाय को बचाने के लिए दर्जनों इंसानों की जानें ली जा चुकी है।

कुछ अपर कहीं जाने वाली जातियों को कभी गाय तो कभी घोड़ी को लेकर दिक्कत होती रहती है, वे दलितों की घुड़चढ़ी के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, हालांकि आज तक घोडे घोड़ी का पक्ष मालूम नहीं हो सका कि उनकी क्या राय है ?

इंसान के पशु होने का सिलसिला जारी है,सवर्ण हिंदुओं में जिस तरह गाय को लेकर क्रेज चरम पर पहुंच चुका है, वैसे ही दलितों ने घोड़ी से एमओयू साइन कर लिया ,ये चढ़ने नहीं देंगे ,वो चढ़ कर ही दम लेंगे ।

आदमी का जानवर होना जारी है, वह मूलतः पशु ही था ,चौपाया जानवर ! फिर वह दो पैरों पर खड़ा हुआ ,उसके हाथ आज़ाद हुये, उसने तरक्की की कईं मन्ज़िले पार की ,अब वह वापस पशु हो जाना चाहता है।

मुझे घोड़ी को लेकर दलितों का बढ़ रहा दीवानापन कोई शुभ संकेत नहीं प्रतीत होता है, दरअसल जानबूझकर उनको उलझाया जा रहा है।
वक़्त और व्यवस्था के बहेलिये द्वारा बिछाये गये जाल में इस देश के वंचित ,शोषित लोग फंसते जा रहे हैं, दूसरी तरफ तमाम साधन संसाधन और सत्ता प्रतिष्ठान पर कुछेक लोग काबिज़ हो गए हैं, बाकी लोग घोड़ी पर चढ़ने में व्यस्त हैं ।

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