एससी-एसटी एक्ट को लेकर फैलाये जा रहे झूठ का मुकाबला कैसे करें ?

2,021

(भँवर मेघवंशी)

सोशल मीडिया पर एससी एसटी एक्ट में हुए बदलावों  की अपनी ही तरह से व्याख्या करते हुए एक पेम्पलेट प्रचारित किया जा रहा है ,जिसे लोग सच मानकर फॉरवर्ड कर रहे है, जबकि इस मामले में तथ्य यह कहते है ?

किसी भी कानून का विरोध किया जा सकता है, उस पर अलग विचार भी रखे जा सकते है ,पर गलत बयानी करके लोगों को भड़काना किसी अपराध से कम नहीं है ,अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण संशोधन अधिनियम 2018 को लेकर यही किया जा रहा है ,न अपील ,न दलील,न वकील की बात कह कर इस कानून को अब तक का सबसे खतरनाक और काला कानून बताया जा रहा है,जो कि एकदम झूठ है ।

मैं इस देश की सवर्ण आबादी से निवेदन करता हूँ कि वह पहले इस सच्चाई को जान लें और फिर विरोध करे,अंध विरोध ठीक नहीं है ,आपको तकलीफ नोटबन्दी और जीएसटी से है और खीज दलित आदिवासी कानून पर निकाल रहे है ,यह कहाँ का न्याय हुआ ?

आईये इस कानून के बारे में जानें –

उस झूठ के पुलिंदे पेम्पलेट की फोटो यहां पोस्ट करते हुए इस पेम्पलेट का बिंदुवार झूठ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

 1- पहला झूठ

मुकदमे में एससी एसटी के ही गवाह होंगे,जबकि ऐसा कोई प्रावधान इस संशोधन में नहीं है।

2-दूसरा झूठ

मुकदमा दर्ज होते ही बिना जांच के ही 6 माह की जेल होगी। जबकि एक्ट या संशोधन में ऐसा कोई प्रावधान है ही नहीं ।

3- तीसरा झूठ

एससी एसटी सेल का जांच अधिकारी भी इसी वर्ग का होगा। जबकि न तो एक्ट में और न ही संशोधन में ऐसी कोई बात है।

4-चौथा झूठ

केस की सुनवाई एससी एसटी के ही जज करेंगे। जबकि न तो एक्ट में ,न ही संशोधन में ऐसा कोई प्रावधान है।

5-पांचवा झूठ

पहले इसमे अग्रिम जमानत मिल जाती थी। अब इस एक्ट में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं रहा। अग्रिम जमानत का प्रावधान सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च 2018 के फैसले में जोड़ा था, जिसे संसद ने अनुचित मानते हुए हटाया है ,पर बाद में जमानत तो हो ही सकती है ,अग्रिम न सही ।

6- छठा झूठ

6 महीने तक जेल में रहना अनिवार्य ,तब तक जमानत का कोई प्रावधान नहीं,जबकि यह कोर्ट का विशेषाधिकार है कि वह कब किसकी जमानत लें,पर एक्ट में तो 6 माह तक जमानत न लेने जैसी कोई बाध्यता नहीं है।

अब बात करते है कि संशोधन की ,जिसका बड़ा हल्ला मचाया जा रहा है ,आखिर उसमें क्या है ? 

संसद में सर्वदलीय सहमति  से पारित संशोधन के जरिये एससी एसटी एक्ट में धारा 18(A) जोडी गयी है। जो इस प्रकार है-

“(क) किसी भी व्‍यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से पहले आरंभिक जांच कराने की जरूरत नहीं होगी 

 अथवा

(ख) किसी भी ऐसे व्‍यक्ति की गिरफ्तारी, यदि आवश्यक हो, से पूर्व जांच अधिकारी को किसी अनुमोदन की आवश्‍यकता नहीं होगी, जिसके खिलाफ पीओए अधिनियम के तहत कोई अपराध करने का आरोप लगाया गया है और पीओए अधिनियम अथवा फौजदारी प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत उल्लेखित प्रक्रिया के अलावा कोई और प्रक्रिया लागू नहीं होगी।

किसी भी अदालत का चाहे कोई भी फैसला अथवा ऑर्डर या निर्देश हो,लेकिन संहिता की धारा 438(अग्रिम जमानत) का प्रावधान इस अधिनियम के तहत किसी मामले पर लागू नहीं होगा।”

इस संबंध में कुछ तथ्य इस प्रकार है- 

1- सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही कई निर्णयों में गंभीर अपराधों में मुकदमा दर्ज करने की बाध्यता का प्रावधान कर रखा है। एफआईआर दर्ज होने का मतलब यह नहीं है कि गिरफ्तारी होगी ही। यदि साक्ष्य न हो तो जांच अधिकारी एफआर (फाईनल रिपोर्ट ) भी दे सकता है।

2- 18A(ख ) के मुताबिक जांच अधिकारी को यह अधिकार प्राप्त है कि वो गिरफ्तार करें या नहीं। इस धारा में ही स्पष्ट किया गया है कि – “किसी भी ऐसे व्‍यक्ति की गिरफ्तारी के लिए,यदि आवश्यक हो तो जांच अधिकारी को मंजूरी लेने की आवश्‍यकता नहीं होगी।”  आशय यह कि अनुसंधान अधिकारी सीआरपीसी की धारा 41 के प्रावधानों के तहत मिले अधिकारों का उपयोग कर सकता है। 

3- इस एक्ट में अग्रिम जमानत का प्रावधान 1989 से ही नही था एवं संशोधन में भी यह प्रावधान नहीं रखा गया है। फिर भी जिनको लगता है कि मुकदमा झूठा है और जबरन फंसाने के लिए है ,वे लोग सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाई कोर्ट में अपनी अर्जी दे सकते है ,जहां हाई कोर्ट को यदि उचित प्रतीत लगता है तो एफआईआर क़्वेश भी की जा सकती है। 

कृपया अधकचरे व्हाट्सएप ज्ञान पर आधारित झूठ के पुलिंदे पेम्पलेटस और अफवाहों पर ध्यान नहीं दें ,यह अंग्रेजो के रोलेट एक्ट से ज्यादा खतरनाक कानून नहीं है ,यह इस मुल्क के करोड़ों करोड़ दलित व आदिवासी भाई बहनों के स्वाभिमान,सम्मान ,जीवन और गरिमा के संरक्षण हेतु भारतीय राष्ट्र राज्य द्वारा निभाई जाने वाली जिम्मेदारी मात्र है ,यह सभ्य सवर्ण नागरिकों के विरुद्ध नहीं है ,यह एससी एसटी के खिलाफ अपराध करने वाले अपराधियों के खिलाफ है ,बेवजह अपराधबोध से ग्रस्त न हों ,मिलजुल कर रहें और वंचित पीड़ित लोगों का मनसा ,वाचा ,कर्मणा अपमान करने से बचें ,अत्याचार न करें I 

(लेखक शून्यकाल के संपादक है )

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