आजाद भारत में कब तक गोली चलेगी निर्दोषों पर?

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– बाबूलाल नागा

आखिरकार, तमिलनाडु सरकार को तूतीकोरिन स्थित वेदांता स्टरलाइट प्लांट को स्थाई तौर पर बंद करने का आदेश देना ही पड़ा। आदेश के बाद अधिकारियों ने प्लांट को सील कर दिया है। उल्लेखनीय है कि स्टरलाइट कॉपर प्लांट के खिलाफ जनसंगठनों द्वारा किए जा रहे आंदोलन के 100वें दिन 22 मई को पुलिस द्वारा चलाई गोली में निर्दोष आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी। स्टरलाइट कॉपर को प्रदूषण फैलाने के चलते बंद करने की मांग को लेकर महीनों से चल रहा प्रदर्शन हिंसक हो गया। इस दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज और गोलीबारी की, जिसमें 13 लोग मारे गए हैं और 30 से ज्यादा लोग घायल हो गए।

गौरतलब है कि इस फैक्ट्री से हो रहे प्रदूषण के खिलाफ लोग महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। वेदांता समूह के स्वामित्व वाले संयंत्र को प्रदूषण संबंधी चिंताओं को लेकर बंद करने की मांग कर रहे लगभग पांच हजार लोग 22 मई को पुलिस से भिड़ गए तथा वाहनों और सार्वजनिक संपत्ति को आग लगा दी। यह जानते हुए भी तूतीकोरिन शहर ही नहीं पूरा जिला स्टरलाइट प्लांट को बंद करने की मांग कर रहा है। प्रबंधकों ने हजारों नागरिकों के प्रतिनिधियों से बात करने की आवश्यकता भी नहीं समझी। जिलाधीश कार्यालय तक आंदोलनकारियों को बिना रोक टोक के पहुंचने दिया गया तथा बिना किसी पूर्व चेतावनी के लाठीचार्ज व गोली चलाना शुरू कर दिया गया। नियमनुसार पहले धारा 144 लागू करनी चाहिए फिर आंसू गैस का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लाठीचार्ज से भी अगर भीड़ तितर-बितर नहीं होती है, तब लाठीचार्ज के बाद हवाई फायर किया जाना चाहिए। यदि पुलिस गोलीचालन की स्थिति बनती है तब भी गोली घुटने के नीचे चलाई जानी चाहिए लेकिन गोलीचालन के दौरान अंग्रेजों के जमाने के पुलिस मैन्युअल का भी पालन नहीं किया गया। तमिलनाडु पुलिस ने शार्प शूटर्स का इस्तेमाल कर चुन-चुन कर लोगों की हत्या की। 50 राउंड पुलिस फायरिंग की गई।

पुलिस चालन का मुद्दा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी पहुुंच चुका है। मुख्य विपक्षी दल डीएम के द्वारा राज्यव्यापी बंद किया जा चुका है लेकिन देश के प्रधानमंत्री स्टरलाइट कंपनी के खिलाफ एक भी शब्द बोलने को तैयार नहीं हैं। जिससे साफ होता है कि वे वेदांता समूह के साथ खड़े हैं। 13 निर्दोष लोगांे की मौत की केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराना तो दूर सीबीआई तक से जांच कराने की घोषणा तक नहीं की है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बेशर्मी पूर्वक बयान दे रहे हैं कि पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलीचालन किया था। गोलीबारी पहले से तय नहीं थी। जैसा आरोप लग रहा है। उन्होंने कहा कुछ विपक्षी दलों और असामाजिक तत्वों के भडकाने से ही प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया।

वेदांता समूह की इकाई स्टरलाइट इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड का संयंत्र तूतीकोरिन में मीलवितन में पिछले 20 साल से चल रहा है। 1996 में यह प्लांट शुरू हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण कानून तोड़ने के कारण 2013 में 125 करोड़ का जुर्माना लगाया था। मार्च 2013 में संयंत्र में गैस रिसाव के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता ने इसे बंद करने का आदेश दिया था। इसके बाद कंपनी एनजीटी में चली गई। एनजीटी ने राज्य सरकार का फैसला उलट दिया। राज्य सरकार इस पर उच्चतम न्यायालय में चली गई और अब याचिका शीर्ष अदालत में लंबित है। असल में कंपनी सालाना 4 लाख टन की क्षमता को बढ़ाकर 8 लाख टन करना चाहती है, जबकि तमिलनाडु प्रदुषण बोर्ड ने इस वर्ष के अंत तक खत्म हो रहे पर्यावरण सर्टिफिकेट को रिंयु करने से इंकार कर दिया है। दुनिया भर में वेदांता के 28 प्लांट हैं तथा सालाना रेवेंयु 78 हजार करोड़ है। स्थानीय निवासियों द्वारा स्टरलाइट कंपनी से पर्यावरण संबधी कानूनों को लागू करने की मांग की जा रही थी? क्योंकि वहां के नागरिकों की प्रदूषित पानी एवं वायु के चलते लगातार मौतें हो रहीं थीं। 2 माह पूर्व 24 मार्च को भी यहां बड़ा प्रदर्शन हुआ था, जिसके बाद तमिलनाडु प्रदूषण बोर्ड को 15 स्थानों पर पानी की जांच करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। पानी की जांच से पता चला था कि वहां पीने का पानी 55 गुना तक प्रदूषित हो चुका है। कंपनी के लगने के बाद से कार्यस्थल की बदतर स्थिति के चलते 15 कामगारों की मौत भी हो चुकी थी।

स्थानीय निवासियों के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता स्टलाइट काॅपर का विरोध कर रहे हैं। जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय ने तुत्तुकुडी पुलिस गोली चालन को लेकर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मानव अधिकार आयोग को पत्र लिखकर सर्वोच्चन्यायालय की निगरानी में जांच कराने (जबकि अभी उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश से जांच कराने की घोषणा की गई है), स्टरलाइट कॉपर शेल्टर संयत्र को स्थायी रूप से बंद करने, शहीद परिवारों को 1 करोड़ मुआवजा देने तथा दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने और नागरिकों पर लादे गए फर्जी मुकदमे वापस लेने की मांग की है। किसान संघर्ष समिति के कार्यकारी अध्यक्ष पूर्व विधायक डॉ सुनीलम ने कहा कि जिलाधीश और पुलिस अधीक्षक का तबादला किया गया है जबकि उन पर 302 का मुकदमा चलाकर गिरफ्तार और बर्खास्त किया जाना चाहिए था।

देशभर में अब तक हुए गोली चालनों में 85 हजार निर्दोष, निहत्थे नागरिकों की मौत हो चुकी है। हर गोली चालन के बाद सत्तारूढ़ दल और सरकार गोली चालन को जायज ठहरा रहे हैं, विपक्ष पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाया जाता है। एसपी, कलेक्टर को निलंबित कर दिया जाता है। बाद में बहाली हो जाती है। हर गोलीचालन के बाद एक जांच आयोग गठित किया जाता है। जांच आयोग का कार्यकाल लगातार बढ़ाया जाता है। जांच आयोग आंदोलनकारियों के खिलाफ रपट देता है और गोलीचालन को जायज ठहराया जाता है। जांच आयोग की रपटों पर विधानसभाओं तथा लोकसभा में कभी चर्चा नहीं होती। सरकार द्वारा आंदोलनकारियों पर सैंकडों मुकदमें दर्ज कर दिए जाते हैं, फिर दसियों वर्ष तक मुकदमें चलते रहते हैं। कभी-कभी आंदोलनकारियों को सजा भी हो जाती है लेकिन पुलिस गोलीचालन के दोषी अधिकारियों पर कभी हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं किया जाता, उलटा सरकार उन्हें आउट ऑफ टर्न पदोन्नती देती चली जाती है।

बहरहाल, सरकार लोगों की सुरक्षा और उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव पर नजर रखने में नाकाम है। इस इलाके की हवा और पानी को फैक्ट्री ने गंदा कर दिया है। अदालत भी इस बात को माना है। फिर भी कंपनी एक आबादी वाले इलाके में अपने प्रोडेक्ट यूनिट का विस्तार करने के बारे में कैसे सोच रही है। इस पर सोचने की जरूरत है।

(लेखक विविधा फीचर्स के सम्पादक है )

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