दलितों की लाशें कब तक इंतजार करेगी ?

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( कल शाम से जालोर जिले में यह डेड बॉडी श्मसान जाने की प्रतीक्षा में है,सरकारी अमला मौजूद है,पर रास्ता नहीं दिया जा रहा है )

दलित आदिवासियों को जीते जी तो न्याय नहीं मिलता ,मरने के बाद भी उन्हें इंसाफ मयस्सर नहीं है ।

दलितों की लाशें कब तक श्मसान पहुंचने का इंतज़ार करेगी ? कब उन्हें लकड़ी और आग मिलेगी ?

कितने शर्म की बात है कि जालोर जिले के भीनमाल तहसील के जूनी बाली गांव में कल शाम 5 बजे से एक लाश रोड पर रखी हुई है,क्योंकि उसे श्मसान तक जाने का रास्ता नहीं मिल रहा है ।

जिंदा दलितों से नफरत तो समझ आती है,पर मरे हुए दलित आदिवासियों की लाशों से भी उतनी ही घृणा ? लानत है इस समाज पर ?

कल शाम 5 बजे के करीब जूनी बाली के दलाराम भील की मौत हो गई, तब से उनके परिजन डेड बॉडी लिए बैठे सिर पीट रहे है।

इन रोते हुए गरीबों की आवाज़ कहीं नहीं पहुंच रही, न शासन तक,न प्रशासन तक ,जबकि मीडिया,पुलिस तथा सामान्य प्रशासन सब वहां मौजूद है ।

पीड़ित पक्ष ने बताया कि जूनी बाली के चौधरी परिवार द्वारा अतिक्रमण करके सौ साल से ज्यादा पुराने श्मसान भूमि के रास्ते को रोक दिया गया है और प्रशासन उसके सामने लाचार है।

अब प्रशासन लाचार है कि लचर ? यह तो सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज लोग तय करें ,पर अभी अति आवश्यक कदम यह उठाना होगा कि दलाराम भील की लाश को अंतिम क्रिया नसीब हो ।

खुले आम दलितों के मूलभूत मानवीय अधिकार का हनन किया जा रहा है,पर सुनने वाला कोई नहीं है ।

लाश को श्मसान भी दे न सके ,उस सरकार को क्या कहा जाये ?

भंवर मेघवंशी

(दलित,आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान,राजस्थान)

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