इस भयावह विषमता का कैसे हो खात्मा !

- एच एल दुसाध

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स्विटज़रलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के शुरू होने से पहले अंतरराष्ट्रीय अधिकार समूह ऑक्सफैम ने दुनिया में बढ़ रहे असमान धन के बंटवारे पर जो रिपोर्ट जारी की, वह किसी भयावह भूकंप से कम नहीं था. 10 देशों के 70 हजार लोगों पर सर्वे कर जारी की गयी ‘ रिवॉर्ड वर्क, नॉट वेल्थ’ नामक वह रिपोर्ट अमीर- गरीब के गहरी होती खाई पर बहुत ही चिंताजनक तस्वीर पेश की है. यह बताती है कि बीते साल भारत में जितना धन सर्जित हुआ, उसमें से 73 प्रतिशत धन देश के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों के हिस्से में आया. एक वर्ष में यह संपत्ति विस्फोटक रूप से बढ़ी है, क्योंकि पिछले साल जारी रिपोर्ट में इन 1 प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश की 58 प्रतिशत दौलत थी. इस विस्फोटक वृद्धि के चलते इस साल अमीर आबादी की दौलत में 4.89 लाख करोड़ का इजाफा हुआ , जो सभी राज्यों के शिक्षा व स्वास्थ्य बजट के बराबर है. अब अरबपतियों की कुल दौलत 20.9 लाख करोड़ हो गयी है, जो 2017-18 के केन्द्रीय बजट के बराबर है. आर्थिक विषमता की भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती इस रिपोर्ट पर ऑक्सफैम इंडिया की सीईओ निशा अग्रवाल ने चिंता जताते हुए कहा है ,’ अरबपतियों की बढती संख्या अच्छी अर्थव्यवस्था का नहीं, ख़राब होती अर्थव्यवस्था का संकेत है. जो लोग कठिन परिश्रम करके देश के लिए भोजन उगा रहे हैं, इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रहे हैं, फैक्टरियों में काम कर रहे हैं , उन्हें अपने बच्चों की फीस भरने, दवा खरीदने और दो वक्त का खाना जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. अमीर- गरीब के बीच बढती खाई लोकतंत्र को खोखला कर रही है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है.’
भारी अफसोस की बात है कि इस चिंताजनक रिपोर्ट पर चिंता जताने के लिए निशा अग्रवाल की भांति बहुत कम लोग सामने आये . शायद लोगों के लिए चिंता का बड़ा विषय ‘ पद्मावत ‘ फिल्म रही, इसलिए इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान मीडिया और बुद्धिजीवी इस फिल्म को लेकर अब भी चर्चा में मशगूल दिखाई पड़ हैं. वह तो गनीमत थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावोस संबोधन पर तंज कसने के लिए राहुल गाँधी ने कह दिया,’ मोदी को यह बताना चाहिए कि देश की 73 फीसद दौलत सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास ही क्यों है? राहुल गाँधी के इस तरह सवाल करने से निश्चय ही कुछ लोगों का ध्यान इस रिपोर्ट की ओर गया है , किन्तु इसे लेकर देश में कोई हलचल नहीं: प्रायः उदासीनता का ही माहौल है.

बहरहाल भयावह विषमता को उजागर करती इस रिपोर्ट पर देश के जिम्मेवार लोगों की उदासीनता कोई नयी बात नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई रिपोर्टें प्रकाशित हुईं जिनसे यह साफ़ दिखा कि भूमंडलीकरण के दौर में , खासकर मोदीराज में विषमता की खाई तेजी से बढ़ी है,किन्तु उन्हें लेकर अपेक्षित चिंता कभी जाहिर नहीं की गयी. ऑक्सफैम के रिपोर्ट में जो चित्र उभरा है, कुछ वैसा ही 2015 में प्रकाशित क्रेडिट सुइसे, जो वैश्विक धन-बंटवारे का अध्ययन करती है , की रिपोर्ट में उभरा था. उसमें बताया गया था कि भारत की टॉप की दस प्रतिशत आबादी के पास 81 धन है.जबकि नीचे की 50 प्रतिशत आबादी 4.1 प्रतिशत धन पर गुजर बसर करने के लिए विवश है.उस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद अख़बारों ने लिखा था-‘गैर – बराबरी अक्सर समाज में उथल-पुथल की वजह बनती है. सरकार और सियासी पार्टियों को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए.संसाधनों और धन का न्यायपूर्ण बंटवारा कैसे हो , यह सवाल अब प्राथमिक महत्त्व का हो गया है.’ लेकिन क्रेडिट सुइसे की रिपोर्ट में उभरी भयावह विषमता के बाद संसाधनों और धन का न्यायपूर्ण बंटवारा न तो देश की सियासी पार्टियों और न ही बुद्धिजीवियों के लिए प्राथमिक महत्त्व का विषय बन सका. वे तब भी भयावह विषमता की समस्या से निर्लिप्त रहे और आज भी दिख रहे हैं.

बहरहाल क्रेडिट सुइसे या ऑक्सफैम ने तो सिर्फ आर्थिक विषमता को सामने लाने के प्रयास किया है, किन्तु यदि वे आर्थिक के साथ सामाजिक विषमता को जोड़ते हुए अध्ययन करते तो पता चलता टॉप की दस प्रतिशत आबादी में शामिल बाबू साहेब, बाबा जी, सेठजी जहाँ 80-85 प्रतिशत धन-संपदा के साथ गगन-स्पर्शी सामाजिक मर्यादा से संपन्न हैं,तो वहीँ वंचित बहुजन अस्पृश्य, आदिवासी, पिछड़े और विधर्मी धन-दौलत के साथ सामाजिक मान-सम्मान से भी पूरी तरह विपन्न हैं.कुल मिलकर अभागा भारत आर्थिक के साथ सामाजिक विषमता से जिस तरह पीड़ित है, उसकी मिसाल दुनिया में दूसरी नहीं मिल सकती . इस सामाजिक और आर्थिक विषमता के भयावह परिणाम को ध्यान में रखते हुए ही 25 नवम्बर, 1949 को संविधान निर्माता ने राष्ट्र को चेताते हुए कहा था कि हमें निकटतम समय के के मध्य आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा कर लेना होगा, नहीं तो विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र को विस्फोटित कर सकती है.’ शायद डॉ.आंबेडकर की चेतावनी को ध्यान में रखते हुए ही ऑक्सफैम इंडिया की सीईओ निशा अग्रवाल ने अमीर-गरीब की बढती खाई, जो दरअसल सवर्ण और बहुजनों के बीच बढती विषमता की खाई , को लोकतंत्र के लिए अशुभ बताया है.

इसमें कोई शक नहीं कि देश की मौजूदा सरकार और सियासी पार्टियाँ आर्थिक और सामाजिक विषमता को लेकर नहीं के बराबर चिंतित हैं.ऐसे में भारत में भीषणतम रूप से फैली आर्थिक और सामाजिक विषमता के लिए बुद्धिजीवी वर्ग के सक्रिय होने के सिवाय कोई विकल्प नहीं रह गया है. अगर वह सामने नहीं आएगा तो विषमता की समस्या से निर्लिप्त राजनीतिक दलों की निष्क्रियता से देश में उथल-पुथल मचना तय है. और यदि हमारा बुद्धिजीवी वर्ग सामने आता है तो उसे सबसे पहले आर्थिक और सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के कारणों को नए सिरे से समझने का प्रयास करना होगा. क्योंकि जिस तरह विषमता नियंत्रण से बाहर हुई है, उससे तय सा लगता है कि इसके उत्पत्ति के कारणों को ठीक से समझने में हम अबतक पर्याप्त रूप से सफल नहीं हो पाए हैं. जहाँ तक आर्थिक और सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के कारणों का सवाल है सदियों से ही इसकी उत्पत्ति शक्ति के स्रोतों का विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से होती रही है. थोड़ा और परिष्कृत रूप में कहना हो तो यही कहा जाएगा कि दुनिया के तमाम शासक ही शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन करा कर ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या , आर्थिक और सामाजिक विषमता को जन्म देते रहे हैं.

ध्यान देने की बात है कि सदियों से ही दुनिया का सारा समाज जाति, नस्ल, लिंग, भाषा, धर्म इत्यादि के आधार पर विविध समूहों में बंटा रहा है, सिर्फ अमीर-गरीब में नहीं, जैसा कि मार्क्सवादी दावा करते हैं. जहाँ तक शक्ति के स्रोतों का सवाल है , समाज में इसके प्रमुख स्रोत रहे हैं-‘आर्थिक,राजनीतिक,शैक्षिक और धार्मिक.’शक्ति ये स्रोत जिन समूहों के हाथ में जितना ही संकेंद्रित रहे, वह उतना ही शक्तिशाली: विपरीत इसके जो जितना ही इनसे दूर व वंचित रहा, वह उतना ही अशक्त व् दुर्बल रहा. सदियों से सामाजिक परिवर्तन या समतामूलक समाज निर्माण के लिए संघर्ष और कुछ नहीं: मात्र शक्ति के स्रोतों में वंचित समूहों को उनका प्राप्य दिलाना है. बहरहाल सामाजिक और आर्थिक विषमता की सृष्टि में उपरोक्त कारणों से सहमत होते हुए यदि हमारा बुद्धिजीवी वर्ग शक्ति के स्रोतों के पुनर्वितरण का मन बनाता है तो निम्नलिखित क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन अर्थात विविधतामय भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों-सवर्ण, ओबीसी,एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों- के स्त्री और पुरुषों के संख्यानुपात में अवसरों के बंटवारे पर विचार करे!

1-सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार नौकरियों;2-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जाने वाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप;3- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जाने वाली खरीदारी; 4 – सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, परिवहन; 5 – सरारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जाने वाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकी-व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के सञ्चालन, प्रवेश व अध्यापन;6 -सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों, उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जाने वाली धनराशी;7- देश-विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं(एनजीओ ) को दी जाने वाली धनराशि 8 -प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं फिल्म के सभी प्रभागों;9 -रेल-राष्ट्रीय राजमार्गों क खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की जमीन व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए एससी/एसटी के मध्य वितरित हो एवं पौरोहित्य तथा 10- ग्राम पंचायत, शहरी निकाय, सांसद-विधानसभा, राज्यसभा की सीटों एवं केंद्र की कैबिनेट ; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों ,राष्ट्रपति- राज्यपाल, प्रधानमंत्री- मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि में सामाजिक और लैंगिक विवधता लागू हो !

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.संपर्क-9654816191)

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