अत्यंत पौष्टिक है पहाड़ी सब्ज़ी लुंगड़ू !

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(भँवर मेघवंशी)

 

नाम जरूर अजीब है और दिखने में भी अजीबोगरीब ,लेकिन औषधीय गुणों से भरपूर है यह वस्तु ।

इस बार जब गगल से पालमपुर के रास्ते पर जाते वक्त जगह जगह सब्ज़ी भंडारों पर इसे देखा ,तो मेरी जिज्ञासा अदम्य हो गई, एक जगह गाड़ी रुकवाई और उतर कर पूछ लिया कि यह सांप की तरह नजर आ रही चीज़ क्या है और किस काम आती है ?

जवाब मिला – यह लुंगड़ू है जी,इसकी स्वादिष्ट सब्ज़ी,मधरा, साग और अचार बनता है।

मेरे तो आश्चर्य की सीमा ही नहीं थी,कभी पहले इसकी सब्जी के बारे में न तो सुना और न ही खाई ,हमें तो रोज रोज वही भिंडी,मिर्ची,बैंगन,पालक,आलू से काम चलाना पड़ रहा है और ये पहाड़ी लोग इस तरह भांत भांत की सब्ज़ी भाजी खा कर मजा ले रहे हैं !

खैर,सोचा कि राजस्थान लौटते वक्त जरूर इसे खरीदूंगा और रेसिपी जानकर एक बार अपने हाथों बना कर चख लूंगा तो मन की मुराद पूरी हो जाएगी,सो वही किया।

वापसी में ट्रेन पठानकोट से थी,वही शाम 8 बजे वाली लेट लतीफ जम्मू तवी,जो जम्मू से चलकर अजमेर आती है,हर बार वही तो मिलती है,कभी कभार इमरजेंसी में हवा में भी उड़ना पड़ता है तो बसों में भी हिचकोले खाते हुए वाया दिल्ली आना जाना पड़ता है,पर इस बार आते वक्त ट्रेन में टिकट कन्फर्म हो गया ,इसलिए टेक्सी से पालमपुर से पठानकोट के लिए प्रस्थान किया,पर दिल मे एक ही तमन्ना थी कि लुंगड़ू ले जाना है,चाहे जो हो जाये।

लूँगडू सब्जी
लूँगडू सब्जी

ज्यादा रिस्क नहीं ली,पालमपुर के एक चौराहे पर बैठे सब्ज़ी वालों के यहीं दिख गई तो ले ली किलो भर,ज्यादा महंगी नहीं मिली,मात्र 40 रुपये किलोग्राम। सब्ज़ी वाले से पूछ भी लिया कि कल तक खराब तो न होगी। बोले कि नहीं होगी दो तीन दिन तो,फिर तो लेनी ही थी,लेकर झोले में रख दी और जयपुर ले आया,शाम होते होते सब कुछ छोड़ छाड़ कर लुंगड़ू का मधरा बनाने में लगे और फिर बना कर ही दम लिया।

रेसिपी रास्ते मे टेक्सी चालक राजेश राणा से सीख ली,बची खुची जानकारी महाज्ञानी यूट्यूब महाराज से जान ली और बना ली पहली बार लुंगड़ू की सब्ज़ी।

मैं फिर से कहता हूं कि आप इसकी शक्ल सूरत और नाम पर मत जाइये, यह बड़े काम की चीज़ है ,इसमें भरपूर पौष्टिक तत्व है ,शोधकर्ताओं का दावा है कि इसके डंठल में विटामिन-ए ,विटामिन-बी, आयरन,फैटी एसिड,सोडियम,फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, कैरोटीन व मिनरल्स पाये गये हैं।

वनस्पति विज्ञान व जैव विविधता पर काम करने वाले लोग बताते है कि यह पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है,इसमें शुगर,हृदय रोग,केंसर तथा चर्मरोग रोधक व नेत्रज्योति वर्धक तत्व मौजूद है।

लुंगड़ू इसका इकलौता नाम नहीं है,इसे लोग प्यार से लिंगड़ी भी कह देते हैं तो थोड़ा गुस्से में खसरोड भी,उत्तराखंड वाले तो इसको लिंगड़ा कहने से भी नहीं चूकते ,पर अंगलभाषी इसे फर्न कहकर मजा लेते हैं।

यह पूरे हिमालयन रीजन में होता है,ठंडे जलवायु वाले इलाकों में बरसात के मौसम में बहुतायत में स्वतः उगता है,अकेले हिमालय में ही इसकी 1200 प्रजातियां पाई जाती है। हिमाचल के चंबा,किन्नौर,कुल्लू और शिमला में तथा उत्तराखंड में और चीन,रूस व अमेरिका के शीत क्षेत्रों में इसकी पैदाइश के प्रमाण मिलते हैं।

आजकल इसका सीजन शुरू हो गया है,अब यह सितंबर तक मिलेगी,कहते हैं कि लुंगड़ू हम सबसे और हमारे पुरखों से भी बहुत बड़ा है,इसकी उम्र कईं लाख बरस होने का अनुमान है,अब तो इसे लुंगड़ू जी कहने का मन करता है।

फिलहाल सब्ज़ी तैयार है,पोस्ट के चक्कर में ठंडी हो रही है,हमने इसे दही के साथ बनाया है,जिसे लुंगड़ू का मधरा कहा जाता है,खा लेते हैं,अच्छा लगा तो रेसिपी भी बता देंगे।

तब तक के लिए विदा

-भंवर मेघवंशी
(संपादक – शून्यकाल )

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