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शहीद उधम सिंह के पोते के गले का फंदा बन गया कर्जा

-प्रमोदपाल सिंह

कर्जा देश के एक शहीद के पोते के गले का फंदा बन गया। बात शहीद उधमसिंह के पोते की हैं। जिसने कर्ज माफी की सूची में अपना नाम न होने से हताश होकर यह कदम उठा लिया। फरीदकोट जिले के चाहल गांव के किसान गुरदेव सिंह ने अपने खुद के ही खेत में गले में फंदा लगाकर मौत को गले लगा लिया।

बता दे कि पंजाब के तत्कालिन गवर्नर जनरल माइकल ओ डायर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल एडवर्ड हैरी डायर ने अपने 90 सैनिकों को लेकर जलियावाला बाग को चारों तरफ से घेर लिया और निहत्थे लोगों पर गोलियां चलवा दी थी। 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही निकाले गए थे। इस घटना के बाद उधमसिंह ने प्रतिज्ञा ली थी कि वे डायर को मारे बिना चैन से नही बैंठेगे। उन्होंने जलियावाला बाग काण्ड के जिम्मेदार जनरल डायर को इग्लैण्ड में जाकर गोली मारी। 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को पेंटनवीले जेल में फांसी दे दी गई। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए।

इसी महान क्रांतिकारी के पोते किसान गुरदेव सिंह पर बीस लाख रुपये का कर्ज था। उसे कर्ज माफी का बेसब्री से इंतजार था। पंजाब में नौ महीने इंतजार के बाद इस हफ्ते कर्ज माफी स्कीम की शुरुआत की गयी। राज्य के पांच जिलों में शुरू हुई इस योजना के तहत पांच जिलों के 47 किसानों को दो लाख तक का कर्ज माफी योजना का फायदा मिला। इस सूची में अपना नाम न पाकर गुरदेव सिंह की आत्महत्या की खबर पंजाब सरकार के लिए शर्मसार करने वाली है। यह मौत देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले शहीदों के परिवारों की अनदेखी का ही परिणाम हैं।

पंजाब में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला बढ़ता जा रहा हैं। चुनावों से पहले नेता कर्जमाफी की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। मगर वादे के मुताबिक किसानों को उतना हासिल नही होता। पंजाब में कर्ज माफी स्कीम में गिने-चुने किसानों के ही नाम निकले। जिससे कई किसान सदमें में हैं। इस बार शहीद परिवार के एक किसान ने मौत की राह चुनी और गुरदेव सिंह अपने परिवार को रोता बिलखता छोड़ इस दुनिया से अलविदा हो गया। फिलहाल पुलिस भी मामले की तफ्तीश कर रही है।

किसान गुरदेवसिंह को गांव में एक बेहद अच्छे इंसान बताया जाता हैं और उनके पास करीब 20 एकड़ जमीन थी। वो काफी दिनों से परेशान चल रहे थे। देश के लिए अपनी जान देने वाले शहीदों के परिवार की ओर सरकार ध्यान ही नहीं देती। इसी के चलते गरीबी का शिकार परिवार मुफलिसी में दिन बिताने को मजबूर होता है। इस व्यवस्था के सामने अंग्रेजों के जुल्म का बदला लेने वाले क्रांतिवीर के पोते ने अपने को कितना असहाय महसूस किया होगा? उसके टूटते जमीर के आगे शायद कोई रास्ता ही नही बचा हो।

इतिहास में भी उधमसिंह को वो जगह नहीं मिल पाई। जिसके वे असली हकदार थे। दुश्मन को उसके घर में मारना,वो भी विदेश में जाकर अपने आप में एक महान और साहसिक कारनामा था। लेकिन पुराने समय से ही जातिवाद से ग्रसित समाज ने उन्हें इतिहास में भी सीमित कर दिया। क्रान्तिकारी उधम सिंह का जन्म पंजाब के संगरुर जिले के सुनाम गांव में 26 दिसंबर 1899 को हुआ था। उनके पिता चुहड राम व माता का नाम नारायणा देवी पंजाब से मजदूरी करने यूपी के कानपुर में आ गए थे। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी और रोल्ट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोगों ने एक सभा रखी थी। जिसमें सभी धर्मों के लोग मौजूद थे। उधम सिंह यहां सबको पानी पिलाने का काम कर रहे थे। उधम सिंह ने जलियाँवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी।

जिस शहीद के साथ इतिहास न्याय नहीं कर सका। आज उसी का पोता व्यवस्था का शिकार हो गया। शायद अब भी सरकार चेत जाए। देश को जिन शहीदों पर गर्व हैं,उनके परिवारों को टूटने से बचा ले।
( फोटो क्रेडिट – एनडीटीवी )

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