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First day of Udaipur Film Festival!

उदयपुर फिल्म फेस्टिवल का पहला दिन !

-रिंकू परिहार 
उदयपुर फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन दिखाई गयी दस्तावेजी फिल्मों ने दर्शकों के बीच एक सार्थक बहस को जन्म दिया. फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह के मुख्य वक्ता प्रख्यात दस्तावेजी फ़िल्मकार राहुल रॉय ने कहा कि यूरोपीय राष्ट्रवाद के प्रतिरोध में लाये गए राष्ट्रवाद में भी स्वर्णिम अतीत के महिमामंडन और वर्त्तमान की समस्याओं से मुंह चुराने की ऐसी प्रवृत्ति थी कि वह साम्प्रदायिकता की अंधी गली की ओर ले गया. उन्होंने ‘नोट इन माय नेम’ अभियान के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि जब जुनैद की ट्रेन में उसके पहनावे के कारण हत्या हुई और यह हत्या एक लम्बे सिलसिले की कड़ी थी जो घृणा के काणर की जा रही थीं, तब कुछ दोस्तों ने एक फेसबुक पोस्ट के जरिये लोगों से इकट्ठे होने का आह्वान किया और इस अनोखे सांस्कृतिक आन्दिओलन ने जन्म लिया. इस आंदोलन में भाषण नहीं होते बल्कि आम नागरिक अपनी विविध अभिव्यक्तियों जैसे कविता,नृत्य,गीत,नाटक के जरिये घृणा के विरुद्ध अमन की आवाज़ उठाते हैं. उन्होंने कहा कि ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जैसे आयोजन भी सांस्क्रतिक प्रतिरोध के इस काम को बड़ी खूबी से कर रहे हैं और यही उनकी सफलता है.
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्द गांधीवादी एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार ने कहा कि राष्ट्रवाद के वर्तमान पुरोधा वे लोग बने हुए हैं जो नहीं चाहते कि समाज में सदियों से हो रहे जातिगत शोषण या किसानों की आत्महत्या या शिक्षा की बदहाली या इस तरह के देश के जरूरी मुद्दों पर बात की जाए. इस तरह की बात करने वालों को वे लोग देशद्रोही करार देते हैं, आज यह बात जोर देने की जरूरत है कि यह देश इस देश की अस्सी फीसदी मेहनतकश आबादी का है और उनके सवालों को अनदेखा नहीं किया जा सकता.
उदघाटन सत्र में दो शोर्ट फ़िल्में दिखाई गयीं – ‘द अदर साइड’ और ‘टू प्लस टू’ दोनों में भीड़तंत्र और तानाशाही के खतरों की ओर प्रतीकात्मक रूप से संकेत किया गया था. दोपहर के सत्र में फ़िल्मकार यूसुफ़ सईद की नई दस्तावेजी फिल्म ‘कैम्पस राइजिंग’ दिखाई गयी जिसमें देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में उभर रहे असंतोष और आंदोलन की वजहें जान्ने की कोशिश की गयी. फिल्म के बाद यूसुफ़ सईद ने दर्शकों के सवालों के जवाब भी दिए. वेबसाईट ‘ऑल्ट न्यूज़’ के संचालक प्रतीक सिन्हा ने दर्शकों को कई उदाहरण देकर एवं वीडियो दिखाकर फ़ेक न्यूज़ को पहचानना और उससे बचना सिखाया. उन्होंने कहा कि फ़ेक न्यूज़ का समय पर सतर्क खंडन करके ही हम उसके जरिये समाज को होने वाले नुक्सान से सबको बचा सकते हैं. इसके बाद एक  पैनल डिस्कशन में वक्ताओं ने नए वैकल्पिक मीडिया की संभावनाओं और उसके विस्तार की रणनीति पर चर्चा की.
शाम को अंतिम फिल्म ‘आवर गौरी’ दिखाई गयी जो पत्रकार गौरी लंकेश के दोस्त दीपू ने उनकी स्म्रतियों को जुटाकर बनायी है.संयोजक रिंकू परिहार ने बताया कि कल तीन फ़ीचर फ़िल्में ‘जाने भी दो यारों’,’तुरुप’, ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ तथा एक दस्तावेजी फिल्म ‘जहाँ चार यार मिल जाएँ’ दिखाई जायेगी.आख़िरी तीनों फिल्मों के निर्देशक संवाद के लिए मौजूद होंगे. साथ ही कल एक महत्त्वपूर्ण आयोजन ‘दास्तानगोई’ है जो एक पुराणी किस्सागोई की परंपरा को पुनर्जीवित करने की कोशिश है.

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