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बाकी सब कुशल-मंगल है !

गला मेरा भी सूखता है. थकान मुझे भी होती है. लेकिन काम भी तो कितना सारा है. अधूरा है. अभी कुछ बाकी है. प्रोफेशनल जीवन में जो ऊंचाई चाही, सब मिल गई. ज्यादा ही जल्दी सब कुछ होता चला गया. दुनियावी सुख-सुविधा, पारिवारिक जीवन में किसी तरह का कोई अभाव कभी नहीं रहा. हादसे फिर कहां नहीं होते. वे भी हुए. इस मायने में जिदगी से कोई शिकायत नहीं है.
जिंदगी मेरे प्रति ज्यादातर मामलों में उदार रही है. थैंक्स.
सामाजिक जीवन में बेशुमार सम्मान मिला. हजारों दोस्त मिले. शहर-शहर घूम गया. हर जगह सैकड़ों लोग सुनने आए. लोगों ने अपने बच्चों के नाम मुझसे रखवाए. कितनी जगह बच्चों में पुरस्कार बांटे. विश्वविद्यालयों में की-नोट स्पीच दी. और भी जाने क्या-क्या.
2007 में जब सोशल मीडिया पर लिखना शुरू किया तो सामाजिक न्याय और परिवर्तन के बारे में इंटरनेट पर लिखने वाला शायद पहला व्यक्ति था. अब लाखों लोग इस विषय पर हर दिन लिख रहे हैं. इस विमर्श की एक भाषा बन गई है, एक तर्क पद्धति बन गई है, जिसे मैं अपने जीवन का अब तक का सबसे महत्वपूर्ण काम मानता हूं. लेकिन इस पर मेरा कोई दावा या क्लेम नहीं है. किसी ने किसी से कुछ सीखा नहीं है. सबकी स्वतंत्र यात्राएं रही हैं.
किताबें लिखीं. बेस्टसेलर बनीं. पुरस्कार भी जो होते हैं, या जो चाहिए, सब मिल ही गए. जीवन का एक चक्र पूरा हो चुका है, जिसे लेकर मैं बहुत असंतुष्ट नहीं हूं.लोगों ने कहा राजनीति कर लीजिए. लेकिन यह मुमकिन नहीं. मैं कम्युनिकेटर हूं और यही रहना चाहता हूं. राजनीति के दोस्तों को निराशा हुई, लेकिन वह मेरा काम नहीं है.
तो अब यहां से किधर?
मुझे लगता है कि आज से  25 साल बाद रिटायर होना चाहिए. शायद वह भी नहीं हो पाएगा. मेरे जैसा आदमी क्या खाक रिटायर होगा. किसी दिन कुछ लिखते हुए, किसी प्रोजेक्ट पर काम करते हुए मर जाएगा.
अभी मरने की बात कैसे कर सकता हूं?
इतना काम अधूरा पड़ा है कि सुनेंगे तो पागल हो जाएंगे. भीमा कोरेगांव पर उपन्यास अधूरा है. फिल्म भी बनानी है. बहुजन मीडिया बनाना है. हजारों पत्रकार बनाने हैं. किताबें लिखनी हैं. रिसर्च पूरा करना है. काउंटर कल्चर के लिए काम करना है. कितने सारे नए नैरेटिव खड़े करने हैं. बहुत काम पड़ा है.इतना सारा जीना है. दुनिया भर की नदियों में तैरना बाकी है. इतने पहाड़ सामने खड़े हैं.
वैसे भी,जब ब्राह्मणवाद जुल्म करते हुए हजारों साल में नहीं थका, तो एक न्यायपूर्ण लोकतांत्रिक समाज बनाने की लड़ाई में मैं कैसे थक सकता हूं? इन सबके साथ,जीवन में एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है. जीवन ही एक प्रोजेक्ट है.  उसने जीवन को एक उद्देश्य दिया है.
काम मुश्किल है. लेकिन प्रिय है.  बहुत कुछ नया सीख रहा हूं. अध्ययन का एक नया आकाश सामने खुल गया है. पॉलिटिकल फिलॉसफी, मास कम्युनिकेशन और सोशियोलॉजी के बाद एक नया विषय मेरे पास है. बेसिक्स पढ़ रहा हूं. डिसक्रिमिनेशन स्टडीज के एक हिस्से के रूप में उस विषय को देख रहा हूं.
बाकी सब कुशल-मंगल है.उम्मीद है किआप सब भी ठीक से होंगे. अपना स्नेह बनाए रखें. आप हैं तो हम हैं.
– दिलीप मंडल 

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