अपने-अपने अम्बेडकर !

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 (बाबूलाल सोलंकी ✍️)  

डॉ भीमराव  अम्बेडकर की जयंती 14 अप्रेल को पूरे देश मे बड़ी धूमधाम  मनाई जाएगी ।  अखबारो में छप रही है । बड़े-बड़े बेनर ओर हार्डिंग लग रहे है । पेंपलेट बंट रहे है ,टेंट सज रहे है । एक शहर की खबर दुसरे  शहर को उकसा रही है , लोग जयंती समारोह को ही मिशन मान रहे है । वाट्सअप यूनिवर्सिटी व फेसबूक के विद्यालयों में हर उम्र का आदमी अपनी अपनी जरूरत ओर समझ के हिसाब से गुणा भाग कर बाबा साहेब को सीख रहा है ,सिखाया जा रहा है । इधर उधर से तोड़-मरोड़ कर आधे अधूरे वाक्य के पीछे बाबा साहेब का नाम लगाकर अपनी भाषा सिखाई जा रही है । कभी महाराष्ट्र, यूपी ओर बंगाल जैसे प्रदेशो तक सीमित रहने वाले अम्बेडकर आज भारत ही नही विश्व की धरोहर बन गए है । कोलंबिया,केम्ब्रिज, ऑक्सफ़ोर्ड, जैसी यूनिवर्सिटी में आपकी तस्वीर व स्टेच्यु देखे जा सकते है । आपको “विश्व ज्ञान के प्रतीक”के रूप दुनिया मे पढ़ाया जाता है वही  दुनिया के कई बड़े महानगरों सहित भारत के हर छोटे बड़े गांव व शहरो में  बाबा साहेब की आदमकद मूर्तिया खड़ी की गई है ।  बेशक मूर्ति बोलती नही किंतु उनके संघर्ष की कहानी पक्ष और विपक्ष आज भी पढ़ता है, सुनता है और अनुयायी इसे गाता है जैसे वर्षों  से रामायण,गीता,वेद और पुराणों के मंत्र गाते आए है । विज्ञ कुछ लोग ही होंगे बाकी मात्र तोतारट है । उन्हें न शब्द अर्थ पता है न उद्देश्य अर्थ पता है । जिनके कार्यो ओर संघर्षों से प्रेरित हो मिशन को आगे बढाना था, उसे भूलकर  मूर्ति, सर्किल, चौराहे बनाने व जयंती ओर निर्वाण दिवस मनाने में व्यस्त हुए जा रहे है । मैं इन कार्यक्रमो के खिलाफ नही हूं । अम्बेडकर जी ऐसे कार्यक्रमो के खिलाफ थे क्योंकि जो राम, सीता, कृष्ण से विरक्त हो मूर्ति पूजा का घोर विरोध किया करते थे, वह व्यक्ति अपनी मूर्ति  पूजा का पक्षधर कैसे हो सकता है । मिशन ओर मान्यता में बड़ा अंतर होता है । यदि कोई सरकार या संगठन किसी महापुरुष के नाम छात्रवृति या समारोह का आयोजन करती है ये तो कभी मत समझना कि वह उस महापुरुष के तय किये लक्ष्य की ओर बढ़ रही है दरअसल वो अपने निजी लक्ष्यो को साधने में लगे है I असली मिशन तो ये होता कि अनुयायी व सरकारें ऐसे महापुरुषों के कृतत्व ओर व्यक्तित्व को पाठ्यक्रम में पर्याप्त जगह देते, उन्हें विस्तृत रूप से पढाया ओर समझाया जाता, उन पर अनुसंधान के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित किया जाता । उनके सपनो को साकार करने हेतु विभिन्न उपक्रम ओर  जमीनी योजनाए चलाई जाती ।  महापुरुषों के चाहे गए अधूरे कार्यो को सशपथ पूरे करने को  कृतसंकल्पित होते । उदाहरणार्थ डॉ.आंबेडकर भारत मे महिला उत्थान व सामाजिक व्यवस्था में सुधार हेतु हिन्दू कोड बिल पास करना चाहते थे किंतु उनके जीते जी और मरने के बाद भी, मिशन ओर सरकार को चलाने वाले लोग कभी प्रयासरत नही दिखे । बाबा साहेब जातिमुक्त ,भेदभाव ऊंच-नीच व छुआछूत को समाप्त कर बंधुता,समानता आधारित समाज की स्थापना चाह रहे थे I सभी धर्मों में सुधार के साथ सामंजस्य उनका मकसद था  किन्तु आजादी के 70 सालों बाद भी ये समस्याए मुँह बाए खड़ी है । आज धार्मिक उन्माद की अंधी भीड़ जंगली भेड़ियों की तरह बेखोफ हो इन्सानियत की निर्मम हत्या करने से नही चूकती, इससे साफ जाहिर होता है कि सर्वोच्च सता व कानून का डर नही रहा । विभिन्न प्राणी ओर पंथ के नाम गोरख धंधा चलाने वालों को न धर्म से मतलब है न पंथ से I उनका अपना कारोबार है, सता की ओर से लालबत्ती ओर बोर्ड  की गाड़िया उपलब्ध कराना, गाय,गीता ,कुरान ,जाति,धर्म-पंथ की रक्षार्थ गली मोहल्लों में विभिन्न नामो की सेनाओं का गठन करना, देश की तीनो सेनाओं पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है । आपका संवैधानिक हक़ है कि अपने देश-प्रदेश धर्म- पंथ,सामाजिक,धार्मिक,शैक्षिक ,सांस्कृतिक उत्थान  के लिए समूह व संगठन  बना सकते है किन्तु ऐसी भीड जो अपने आगे या पीछे सेना लिखती हो ओर कानून को अपने हाथों में ले, संविधान की प्रतियां जलाए,चलती ट्रेन में आग लगाए व मारधाड़,तोड़फोड़,आगजनी कर राष्ट्रीय स्मारकों से तिरंगा उतार अपना-अपना नीला,पीला हरा, लाल,झण्डा डंडा गाढ़ने के काम करे तो ये राष्ट्र सुरक्षा के लिए खतरा है । अब वक्त आ गया है कि ऐसे तमाम उन्मादी संगठनो पर तुरन्त प्रतिबंध लगाया जाए जिसमे सेना शब्द जुड़ा हो । सेना शब्द मात्र भारतीय आर्मी के अलावा कंही प्रयुक्त नही हो । जो संगठन और पार्टी बाबा साहेब के नाम लेकर वोट-नोट ओर लूट की राजनीति करते है उन पर पैनी नजर रखी जाए,हर महान पुरुष की आड़ में राजनीति करने वाले शख्स को सख़्ती से परखा जाए क्योंकि बाबा साहेब  अंतराष्ट्रीय महापुरुष है I आप भारत के ही नही दुनिया के हर गरीब, शोषित, पीड़ित, श्रमिक कामगार सहित मानवता व मानवीय अधिकारो के लिए जीवंत पर्यंत संघर्षरत रहने वाले साझी विरासत है । समानता आधारित समाज की स्थापना के लिए कृतसंकल्प हो आप सर्वहारा वर्ग को समाज की मुख्यधारा में लाकर समाजवाद की स्थापना चाह रहे थे, उनके सर्वहारा समाजवाद व मार्क्सवादी सर्वहारा में फर्क है अम्बेडकर के चिंतन में कुलीन या सामन्त वर्ग की महिलाओं के हक , उच्च घरानों में परिवारवाद, पूंजीवाद की विभत्स परंपरा , राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व, भूमिहीन आदिवासी  सहित कई जटिल मुद्दे सम्मिलित है ।

भारत के संदर्भ में विश्वभर में अलग ही दर्शन रहा है I दुनिया मे नस्ल,रंग,धन, बल या प्रदेश के आधार पर  भेदभाव  देखा जा सकता है किंतु यंहा दुनिया की सबसे विभत्स प्रथा पाई जाती है जिसे ‘जाति’ के नाम से जाना जाता है, प्रथा में आदमी की योग्यता चरित्र एवं व्यक्तित्व के बारे में उनके जन्म के साथ ही धारणाए जोड़ दी जाती है उसे उसी दृष्टि से समाज देखता है,  उनके कर्तव्य ओर अधिकार जन्म के साथ तय हो जाते थे । ऐसे संक्रमण के दौर में बाबा साहब का अभ्युदय  उनका संघर्ष और सुझाव भारत के लिए एक नवाचार था  डॉ.अम्बेडकर कभी मानवता व मानवीय अधिकारों के लिए पहचाने जाने वाले आज दलित राजनीति का मोहरा मात्र बन रह गए है । अम्बेडकर का नाम हर राजनीतिक दल और संगठन के लिए भीड़ जुटाने के काम आ रहा है । पंचायत से लेकर प्रधानमंत्री तक के चुनावों में अम्बेडकर के नाम का जिक्र किया जा सकता है, जयंती ओर निर्वाण के दिनों मिशन के साथी खूब बढ़ चढ़कर अम्बेडकरवाद का नीला झण्डा थामे गली मोहलो में चंदा उगाई करते नजर आ जाएंगे । ये बुरी बात नही है ! क्योंकि कोई भी मिशन बिना धन के आगे नही बढ़ सकता है पर मिशन केवल 6 दिसम्बर ओर 14 अप्रेल को ही चरम पर होता है बाकी दिनों मिशन गायब हो जाता है । समाज की विडंबना कहिए या दुराग्रह या फिर भारतीय समाज की पूर्वाग्रसित वर्णवाद मनुवाद आधारित सामाजिक ढांचागत सोच जिसके चलते अम्बेडकर को एक हासिये में धकेल दिया गया । वरना आजादी के बाद धर्म-पंथ, जातपांत में बँटे विविध सास्कृतिक परम्परा के लोगों को किसी व्यक्ति ने संवारा है ओर विविधता भरी हजारों जातियों और धर्मो में बंटे लोगो को एक सूत्र में बांधने का काम किया है तो वो है अम्बेडकर कृत संविधान है । डॉ अम्बेडकर ने जिस सूझबूझ से भारत का संविधान लिखा है उसे आदर्श मानकर  विश्व में बाद के कई नवोदित राष्ट्रों ने अपना संविधान लिखा है । भारत का औद्योगिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक ओर शैक्षिक ढांचा अम्बेडकर के सुझाए उपागमो पर खड़ा है । जैसे आरबीआई ,योजना आयोग, आदि । महिला-पुरुष,बालक,अमीर-गरीब की गाड़ी उन्ही की थमाई स्टेरिग से चलती है किंतु आज अम्बेडकर मात्र दलित वर्ग तक सीमित कर लिए गए है I एकाध प्रतिशत को छोडकर भारत का अन्यपिछडा वर्ग व सामान्य वर्ग सबकुछ जानते हुए भी जानबूझकर जातिवादी मानसिकता के चलते उनसे दूरी बनाए हुए है ।

आज अम्बेडकर के नाम हजारों संगठन बने हुए है जिनके आगे पीछे राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लेबल लगे हुए है वही मिशन के लोग अपनी आवासीय कॉलोनी के नाम, आवास का नाम तक जय भीम नाम से रखते है । मिशनरी साथी  धर्म कर्मकांड,मूर्ति पूजा, मंदिर-मस्जिद से दूर रहने  की सलाह देते नजर आते है किंतु स्वयं के  बच्चो की शादी ब्याव घर मुहर्त में शुभ घड़ी का प्रमाण लेते पाए जाएंगे। परिजनों की मुक्ति हेतु गंगा-प्रसादी व मौसर की युक्ति सुझाते भी दिखेंगे । दुनिया जिन्हें SYMBOL of Knowledge कहना चाह रही है वहीँ भारत  उसे ‘लीडर ऑफ दलित पॉलिटिक्स’ कह कर एक सीमित दायरे में बाँधने का प्रयास कर रहा है ।

इसके लिये काफी हद तक सत्ता ओर मिशन के लोग जिम्मेदार माने जा सकते है  सभी ने अपने-अपने फायदे के हिसाब से अम्बेडकर का उपयोग किया है । दलित अम्बेडकर के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने में लगे है, तो सत्ता में बैठे लोग भीम के नाम की राजनीति से सत्ता पर स्थायी रूप से काबिज़ रहना चाह रहे है । आज अम्बेडकर के सपनो का समाज और राष्ट्र बनाने के लिए भारतीय सविंधान की उद्देशिका को समझना ही पर्याप्त था ।

पुनः आप सभी को 14 अप्रेल महामानव,संविधान शिल्पी,ज्ञान दीप डॉ. भीमरावजी आंबेडकर जयंती पर हार्दिक शुभकामनाए देता हूं । अच्छा तब होता कि सरकार और संगठन बाबा साहेब की इस जयंती पर गरीबी,शोषण,अन्याय, जातिमुक्त, सुसमाज, सुदृढ राष्ट्र निर्माण हेतु दृढ़ संकल्प  होते पर  यंहा अपने-अपने अम्बेडकर बना लिए जाएंगे । पार्टियों ओर जातियों के दड़बों में गोलबंद हुए लोग अपने-अपने बेनर तले अपने तरीके से अम्बेडकर के मिशन का विश्लेषण कर लेंगे, गली मोहल्लो में रैली, फेरी ,निकाल कर शाम होते-होते जुनून उतर जाएगा और अगले साल के लिए फिर नई पटकथा लिख दी जाएगी ।

ये  लेखक के निजी विचार है ।

बाबुलाल सोलंकी ‘स्नेही’✍️

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