चुनाव घोषणापत्र और अल्पसंख्यकों के अधिकार !

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नेहा दाभाड़े  

देश में लोकसभा चुनाव चल रहे हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मतदाताओं का निर्णय 23 मई को सामने आ जाएगा। लगभग सभी राजनैतिक दलों और उम्मीदवारों ने जनता से अलग-अलग वायदे किये हैं। इन वायदों में घोषणापत्र मुख्य हैं। घोषणापत्र वे लिखित दस्तावेज हैं, जिनके जरिए राजनैतिक दल अपनी सोच  लोगों के सामने रखते हैं और उन नीतियों और कार्यक्रमों का वर्णन करते हैं, जो सत्ता में आने पर वे लागू करेंगे। यद्यपि कई मामलों में घोषणापत्र केवल घोषणा रह जाते हैं और सम्बंधित पार्टी के सत्ता में आने पर भी उन्हें पूरी तरह लागू नहीं किया जाता परन्तु वे निश्चित तौर पर हमें यह बताते हैं कि किसी पार्टी की विचारधारा और दृष्टिकोण क्या है और उसके सत्ता में आने पर हम क्या अपेक्षा कर सकते हैं। घोषणापत्र में किये गए वायदों को पूरा करना, किसी भी पार्टी के लिए कम से कम नैतिक दृष्टि से जरूरी होता है।

इस लेख में हम कुछ राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों का विश्लेषण कर यह पता लगाने का प्रयास करेंगे कि उनकी कल्पना के भारत में अल्पसंख्यकों का क्या स्थान होगा और अगले पांच वर्षों में अल्पसंख्यक, इन पार्टियों से क्या अपेक्षा रख सकते हैं।

राजनैतिक पार्टियों के घोषणापत्रों में अल्पसंख्यकों के स्थान का विश्लेषण करने की यह कवायद क्यों जरूरी है? इसके कई कारण हैं। सबसे पहले, जैसा कि अक्सर कहा जाता है, किसी भी समाज को इस आधार पर आंका जाना चाहिए कि वह अपने सबसे कमजोर सदस्य के साथ कैसा व्यवहार करता है। भारत में अल्पसंख्यक, विशेषकर मुसलमान, दलितों से भी ज्यादा पिछड़े हुए हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर रोजगार तक उनकी पहुँच बहुत सीमित है और सरकारी तंत्र में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र माना जाता है परन्तु यहाँ हो रही लिंचिंग की घटनाओं, सांप्रदायिक हिंसा और नफरत से उपजे अपराधों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। भारत में अल्पसंख्यकों के साथ दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता है और वे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, अन्यों और यहाँ तक कि राज्य के भी निशाने पर रहते हैं।

यह पहली बार नहीं है कि भारत में चुनाव हो रहे हैं। परन्तु शायद ही कभी चुनावों के समय देश, धार्मिक आधार पर इतना ध्रुवीकृत रहा हो, जितना कि अभी है और शायद ही कभी इतनी शिद्दत से यह महसूस हुआ हो कि देश की प्रजातान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष आत्मा को बचाने के लिए हर संभव प्रयास जरूरी है। आज, अल्पसंख्यक, देश के राजनैतिक विमर्श के केंद्र में हैं, फिर चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो, पर्सनल लॉ का, राममंदिर का, तीन तलाक का या फिर गौ भक्ति का, जिसके नतीजे में मुसलमानों और दलितों को उन्मादी भीड़ द्वारा पीट-पीट कर जान से मारा जा रहा है। इन चुनावों में कुछ ऐसे उम्मीदवार भी मैदान में हैं जिन पर अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत से उपजे आतंकी हमलों में शामिल होने का आरोप है। ये हमले, जिनमें निर्दोष नागरिक मारे गए थे, देश के धर्मनिरपेक्ष और प्रजातान्त्रिक तानेबाने को झकझोरने वाले थे।

इस परिदृश्य में यह देखना महत्वपूर्ण है कि विभिन्न राजनैतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में अल्पसंख्यकों को कितना और क्या स्थान दिया है।

अल्पसंख्यकों के अधिकारों के तीन पहलू हैं – सुरक्षा का अधिकार, समानता का अधिकार और अपनी संस्कृति को संरक्षित रखने का अधिकार। इन सभी अधिकारों को संयुक्त राष्ट्रसंघ ने मान्यता दी है और वे भारत के संविधान का हिस्सा भी हैं। राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों में अल्पसंख्यकों के बारे में कही गयी बातों का इस लेख में आंकलन इन्हीं अधिकारों के सन्दर्भ में किया जाएगा। कुछ पार्टियों के घोषणापत्र में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में एक शब्द भी नहीं है तो कुछ ने टुकड़ों में इस विषय पर कुछ कहा है। केवल चंद पार्टियों ने ही इस मामले में समग्र दृष्टिकोण अपनाया है।

राष्ट्रीय पार्टियाँ

भारतीय जनता पार्टी

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का घोषणापत्र, अल्पसंख्यकों के अधिकारों के सम्बन्ध में मौन है। इसमें अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, समानता और उनकी संस्कृति के संरक्षण के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। यह महत्वपूर्ण है कि इस दस्तावेज में उन मुद्दों की भरपूर चर्चा है जिनके कारण अल्पसंख्यकों का हाशियाकरण और दानवीकरण हुआ है और उन्हें समाज में अलग-थलग कर दिया गया है। ये वे मुद्दे हैं जिनके कारण धार्मिक विभाजक रेखाएं गहरी हुईं हैं, ये वे मुद्दे हैं जो देश की विविधता को नजरअंदाज करते हुए, उसे एकसार बनाने के लिए निर्मित किये गए हैं। घोषणापत्र में सभी अल्पसंख्यकों के विकास की बात तो कही गयी है परन्तु यह कैसे होगा, इसकी कोई चर्चा नहीं है। हाँ, इसमें अयोध्या में राममंदिर के निर्माण, तीन तलाक और निकाह हलाला पर प्रतिबन्ध, देश के अन्य क्षेत्रों में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर लागू करने, नागरिकता संशोधन विधेयक और समान नागरिक संहिता पर विस्तार से चर्चा है।

देश के अन्य राज्यों में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर लागू करने और नागरिकता संशोधन विधेयक को पारित करने के वायदे का सीधा उद्देश्य इस धारणा को मजबूती देना है कि हिन्दू इस देश के असली नागरिक हैं और अन्य धर्मावलम्बियों को भारत में दूसरे दर्जे के नागरिक बतौर रहना होगा। इसी तरह, भाजपा जिस तरीके से हलाला निकाह और तीन तलाक पर प्रतिबन्ध और समान नागरिक संहिता की वकालत कर रही है, उससे साफ है कि पार्टी का लक्ष्य महिलाओं को समान अधिकार दिलवाना नहीं बल्कि मुसलमानों का दानवीकरण करना और उन्हें दकियानूसी साबित करना है। भाजपा ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने का वायदा या आश्वासन नहीं दिया है- यह इस तथ्य के बावजूद कि देश में लिंचिंग और सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं बढीं हैं। उसने मुसलमानों को अवसरों की समानता देने की बात नहीं कही है- यह इस तथ्य के बावजूद कि सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग ने अपनी रपटों में मुसलमानों को आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से देश का सबसे पिछड़ा तबका बताया है। और ना ही भाजपा ने मुसलमानों के सांस्कृतिक अधिकारों के बारे में कुछ कहा है। कुल मिलाकर, भाजपा का घोषणापत्र यह सन्देश देता है कि अगर पार्टी सत्ता में आई तो यह देश हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर बढ़ेगा और इस हिन्दू राष्ट्र में न तो समानता होगी और ना ही समावेशिता।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

भाजपा के विपरीत, कांग्रेस के घोषणापत्र में अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों को जगह दी गयी है। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में स्वीकार किया है कि देश को जो पांच आतंरिक खतरे हैं, उनमें से एक सांप्रदायिक हिंसा है। कांग्रेस ने यह वायदा किया है कि वह नैतिक पुलिस और गुंडों के उन समूहों पर नियंत्रण करेगी जो बेफिक्री से सड़कों पर हिंसा का तांडव करते हैं। घोषणापत्र में कहा गया है कि पुलिस का इस्तेमाल सांप्रदायिक हिंसा को सख्ती से दबाने के लिए किया जायेगा। यहाँ हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि देश के पुलिस बलों में अल्पसंख्यकों के प्रति दुराव और पूर्वाग्रह रखने वालों की कमी नहीं है। इसके अलावा, पुलिस अधिकारियों को इसी तरह के पूर्वाग्रह से पीड़ित अपने राजनैतिक आकाओं की आज्ञा भी माननी पड़ती है।  पुलिस बलों में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। इन तथ्यों के प्रकाश में कांग्रेस के घोषणापत्र में आश्वासन दिया गया है कि पार्टी की सरकार, राज्य सरकारों के साथ मिलकर सुनिश्चित करेगी कि पुलिस बल सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करें और उनमें उन वर्गों को प्रतिनिधित्व मिले, जिनका प्रतिनिधित्व वर्तमान में कम है। घोषणापत्र में यह भी कहा गया है कि राज्यों की पुलिस के विशेष दस्तों द्वारा सांप्रदायिक दंगों व लिंचिंग और सामूहिक बलात्कार की घटनाओं की जांच, सम्बंधित पुलिस मुख्यालयों की सीधी निगरानी में करवाई जाएगी।

घोषणापत्र में कहा गया है कि सांप्रदायिक दंगे भड़काने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी और ऐसी घटनाओं के लिए जिला प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया जायेगा। यद्यपि घोषणापत्र में कहा गया है कि केवल सड़कों पर हिंसा करने वालों पर ही नहीं बल्कि दंगे भड़काने वालों पर भी कार्यवाही होगी, तथापि उसमें यह नहीं बताया गया है कि दंगों की योजना बनाने वालों और संस्थागत दंगा प्रणाली के जरिये इस योजना को अमल में लाने वालों से कैसे निपटा जायेगा। जाहिर है कि ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही किये बगैर, दंगों को रोकना संभव नहीं होगा।

घोषणापत्र में यह वायदा भी किया गया है कि 17वीं लोकसभा के प्रथम अधिवेशन में नफरत से उपजे अपराधों जैसे भीड़ द्वारा लोगों को नंगा करने, उन्हें जिंदा जलाने या पीट-पीट कर मार डालने जैसी घटनाओं को रोकने के लिए एक नया कानून बनाया जायेगा। कानून में पीड़ितों के लिए मुआवजे और जिला प्रशासन व पुलिस की लापरवाही प्रमाणित होने पर, उनके खिलाफ कार्यवाही का प्रावधान होगा।

घोषणापत्र में यह भी कहा गया है देश में शांति की संस्कृति के विकास और अल्पसंख्यकों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए, राष्ट्रीय एकता परिषद् का गठन किया जायेगा। यह परिषद्, देश में एकता, सांप्रदायिक सद्भाव, बंधुत्व और मेलमिलाप को बढ़ावा देने के लिए काम करेगी। सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव विकसित करने के लिए अंतर्धार्मिक परिषद् के गठन का प्रस्ताव भी घोषणापत्र में किया गया है। यह परिषद, अंतर्धार्मिक संवाद सुनिश्चित करने के अलावा, समाज में सहिष्णुता को बढ़ावा देने का भी प्रयास करेगी। घोषणापत्र में कहा गया है कि अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया का अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान का चरित्र बनाये रखा जायेगा और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलेगा।

अल्पसंख्यकों की समानता, अवसरों तक समान पहुंच और उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए  विभिन्नता सूचकांक का प्रयोग किया जाना प्रस्तावित है। घोषणापत्र में कहा गया है कि इस सूचकांक का प्रयोग सभी शासकीय संस्थाओें, अर्धशाकीय व सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और अन्य संस्थाओं में विविधता का आंकलन करने और उसे सुनिश्चित करने के लिए किया जाएगा। घोषणापत्र में यह वायदा भी किया गया है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो वह भेदभाव-निरोधक कानून बनाएगी, जिसके अंतर्गत आवास, छात्रावासों, होटलों, क्लबों इत्यादि में वस्तुओं व सेवाओं के प्रदाय में धर्म, जाति, लिंग या भाषा के आधार पर भेदभाव प्रतिबंधित होगा। घोषणापत्र में नागरिकता संशोधन विधेयक को वापिस लेने और न्यायपालिका में अल्पसंख्यकों, महिलाओं, एससी, एसटी व ओबीसी का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की बात भी कही गई है।

कुल मिलाकर, घोषणापत्र में अल्पसंख्यकों के संबंध में जो वायदे किए गए हैं अगर उन्हें पूरा किया जाता है तो  काफी हद तक इस तबके के नागरिकों के हितों का संरक्षण हो सकेगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि अभी ये वायदे केवल कागज पर हैं।

क्षेत्रीय पार्टियां

तृणमूल कांग्रेस

पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल में भाजपा व तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ी है। सन् 2014 के बाद से पश्चिम  बंगाल में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगे हुए और समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के आक्रामक प्रयास किए गए। भाजपा, ममता बेनर्जी व टीएमसी पर मुसलमानों का तुष्टिकरण करने का आरोप लगाती रही है। यद्यपि टीएमसी, अल्पसंख्यकों के प्रति अपने प्रेम और प्रतिबद्धता का जमकर शोर मचाती है परंतु पश्चिम  बंगाल में विकास और सुरक्षा की दृष्टि से मुसलमानों – जो कि राज्य की कुल आबादी का 27 प्रतिशत हैं – की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है। टीएमसी पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह सिर्फ नाम के लिए अल्पसंख्यकों के कल्याण की बातें करती है। अपने घोषणापत्र में टीएमसी ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, उनके साथ भेदभाव रोकने और उनके अपनी संस्कृति को संरक्षित रखने के अधिकार के संबंध में कोई वायदे नहीं किए हैं। हां, घोषणापत्र में शुरूआत में ही कहा गया है कि टीएमसी, समावेशी, बहुवादी और धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध है और गौरक्षा के नाम पर हो रही लिंचिंग और साम्प्रदायिक हिंसा से खासी विचलित है। घोषणापत्र का अधिकांश हिस्सा टीएमसी के पिछले साढ़े सात साल के शासनकाल की उपलब्धियों का वर्णन है। परंतु वह यह नहीं बताता कि अगले पांच सालों में पार्टी अल्पसंख्यकों के लिए क्या करने का विचार रखती है। घोषणापत्र में कहा गया है कि टीएमसी एक नए भारत में सभी समुदायों की प्रगति और समृद्धि के लिए काम करेगी परंतु यह कैसे होगा, इसका कोई रोडमेप नहीं दिया गया है। घोषणापत्र में कहा गया है कि टीएमसी सरकार ने पिछले साढ़े सात सालों में रिकार्ड दो करोड़ अल्पसंख्यक युवाओं को वजीफे दिए और आठ लाख को रू. 1,300 करोड़ के ऋण उपलब्ध करवाए।

समाजवादी पार्टी

समाजवादी पार्टी (सपा) ने सन् 2019 के चुनाव के लिए अपनी पुरानी प्रतिद्वंदी बहुजन समाज पार्टी के अलावा राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन किया है। बहुजन समाज पार्टी कभी अपना घोषणापत्र जारी नहीं करती और इस बार भी उसने मतदाताओं से घोषणापत्र के जरिए कोई वायदा नहीं किया है। ये तीनों ही पार्टियां सामाजिक न्याय के मुद्दे पर केन्द्रित रही हैं। सपा ने अपने घोषणापत्र में इसी मुद्दे पर जोर दिया है। इन तीनों पार्टियों का दलितों, ओबीसी, यादवों और मुसलमानों में जनाधार है। विशेषकर सपा चुनाव में जीत के लिए यादव-मुस्लिम मतों पर निर्भर रहती है। यद्यपि सपा की अपेक्षा है कि मुसलमान (जो कि उत्तरप्रदेश की आबादी का 19 प्रतिशत हैं) उसका साथ दें और उसे यह भरोसा भी है कि वे ऐसा ही करेंगे, परंतु सपा ने उनकी सुरक्षा या विकास के लिए कोई वायदे नहीं किए हैं। सन् 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों ने बड़ी संख्या में मुसलमानों को बेघर कर दिया था और समुदाय के अनेक सदस्य मारे गए थे। लिंचिंग की घटनाएं भी सबसे ज्यादा उत्तरप्रदेश में हुई हैं परंतु इन दोनों की ही कोई चर्चा सपा के घोषणापत्र में नहीं है। उसमें यह जरूर कहा गया है कि सपा, कश्मीर समस्या का संवैधानिक हल निकालेगी और कष्मीरी युवाओें में अलगाव के भाव को समाप्त करने के लिए पहल करेगी। सपा के घोषणापत्र से अल्पसंख्यक गायब हैं। सपा अपने आपको सामाजिक न्याय का झंडाबरदार बताती है। यह समझना मुश्किल है कि अल्पसंख्यकों के विकास के बिना सामाजिक न्याय की स्थापना कैसे होगी।

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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