प्रधानमंत्री मोदी को डॉ मीणा का खुला ख़त – एस सी,एस टी एक्ट को दुरूपयोग के नाम पर खत्म मत कीजिये !

कानून के दुरुपयोग की आशंका में न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग कितना जायज? x

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प्रिय प्रधानमंत्री जी,

आपको ज्ञात हो ही चुका है कि अजा एवं अजजा वर्गों के नेतृत्व से विहीन सुप्रीम कोर्ट ने अजा एवं अजजा वर्गों के संरक्षण के लिये संसद द्वारा निर्मित कानून को दुरुपयोग की आशंका बताकर निष्प्रभावी कर दिया है! जिसके चलते देशभर के अजा एवं अजजा वर्गों के आम लोग भयंकर रूप से डरे, सहमे और आतंकित महसूस कर रहे हैं। इसके बावजूद आपकी ओर से इस अत्यंत गम्भीर विषय पर प्रधानमंत्री के रूप में आपकी चुप्पी हालातों को और भी खतरनाक बना रही है। यह स्थिति स्वस्थ एवं परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिचायक नहीं कही जा सकती। अत: इस खुले खत के मार्फत आपको हालातों से सार्वजनिक रूप से अवगत करवाना अपरिहार्य हो गया है।

प्रधानमंत्री जी, सबसे पहला विचारणीय तथ्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को संसद द्वारा क्यों अधिनियमित किया गया? निश्चय ही इन दोनों वर्गों के साथ होने वाले अत्याचारों को तत्कालीन प्रभावी कानूनों और नियमों से रोकना संभव नहीं था। इसलिये यह नया कानून बनाया गया था। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि जब भी किन्हीं उत्पीड़ित या कमजोर या अशक्त या निशक्त समुदायों को अतिरिक्त या विशेष संरक्षण सहयोग की वास्तविक जरूरत होती है तो किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य में, लोकतंत्रीय सरकारों का संवैधानिक दायित्व होता है कि उन समुदायों को कानून का विशेष/अतिरिक्त संरक्षण प्रदान किया जाये।

प्रधानमंत्री जी, आप जानते हैं कि 1950 से 1989 तक भारत में अजा एवं अजजा वर्गों के विरुद्ध जारी अत्याचारों तथा अपराधों के आंकड़ों तथा घटनाओं का अध्ययन एवं विचारण करने के बाद निर्वाचित संसद ने यह उचित समझा कि इन दोनों वर्गों को शेष वर्गों से विशेष कानूनी संरक्षण की जरूरत है। इसीलिये अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को अधिनियमित किया गया। इसके लागू होने के बाद भी अजा एवं अजजा के विरुद्ध अपराधों और अत्याचारों में पूरी तरह से रुकावट नहीं आयी। अत: इस अधिनियम में संसद द्वारा उचित संशोधन भी किये गये। इसके उपरांत भी सरकारी आंकड़े बताते हैं कि आपकी सरकार के पदासीन होने के बाद पिछले कुछ वर्षों में अजा एवं अजजा वर्गों के निरपराध आम लोगों के विरुद्ध अत्याचार तथा अपराध की घटनाओं में लगातार एवं उत्तरोत्तर वृद्धि होती रही है।

प्रधानमंत्री जी, उक्त पृष्ठभूमि में इंसाफ-पसंद विधिवेत्ताओं द्वारा उक्त अधिनियम को पर्याप्त नहीं समझा जा रहा था तथा अजा एवं अजजा वर्गों को अतिरिक्त वैधानिक संरक्षण की जरूरत अनुभव की जा रही थी। ऐसे विकट समय में आपकी सरकार की ओर से कोर्ट में कमजोर एवं औपचारिक पैरवी की जाती है तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्णय सुनाता है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 का दुरुपयोग होने की आशंका या दुरुपयोग हो रहा है और इसी अप्रमाणिक, संदेहास्पद एवं काल्पनिक आधार पर संसद द्वारा निर्मित इस कानून के प्रावधानों को लगभग निरस्त कर दिया गया है। मगर आपकी चुप्पी नहीं टूटी है!

प्रधानमंत्री जी, यहां य​ह तथ्य विचारणीय है कि इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि अजा एवं अजजा के उत्थान और संरक्षण हेतु उपबन्धित संवैधानिक प्रावधानों की संकीर्ण और नकारात्मक व्याख्या करके सुप्रीम कोर्ट ने 1950 से लगातार हर बार उन्हें कमजोर किया है। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे संकीर्ण व्याख्या करने वाले निर्णयों को निष्प्रभावी करने हेतु तत्कालीन संसद द्वारा संविधान में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट को बार-बार संकेत दिया गया कि न्यायपालिका द्वारा कानूनों का निर्वचन अजा एवं अजजा वर्गों के हितों के विरुद्ध किया जा रहा है। इसके बावजदू सुप्रीम कोर्ट द्वारा संकीर्ण एवं नकारात्मक व्याख्या किये जाने का सिलसिला लगातार जारी है। आपकी सरकार के कार्यकाल में इसमें तेजी आयी है।

प्रधानमंत्री जी, इन हालातों में न केवल अजा एवं अजजा वर्गों के लिये, बल्कि देश की 90 फीसदी वंचित आबादी के लिये न्यायपालिका का यह दृष्टिकोंण गंभीर चिंता का विषय बन चुका है! क्योंकि केवल मात्र किसी कानून के दुरुपयोग की आशंका को आधार बनाकर वंचित वर्गों के संरक्षण के लिये संसद द्वारा निर्मित कानून को एक झटके में निरस्त कर देना, लोकतंत्र सबसे बड़े आधार संसद को कमजोर करने और अति न्यायिक सक्रियता का जीता जागता प्रमाण है। यह इसलिये भी विशेष चिंता का कारण है कि बिना किसी निष्पक्ष जांच और बिना किन्हीं आधिकारिक आंकड़ों के सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने देश के निर्वाचित सांसदों द्वारा निर्मित कानून को निष्प्रभावी कर दिया है! क्या यह न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग नहीं है?

प्रधानमंत्री जी, इन हालातों में केन्द्र सरकार को चाहिये कि यदि किन्हीं कानूनों का दुरुपयोग होता है तो ऐसे कानूनों का दुरुपयोग रोकने के लिये अधिक कठोर कानून बनाकर, उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जावे और दुरुपयोगों को रोकने में विफल/जिम्मेदार संस्थानों के विरुद्ध कठोर दण्डात्मक प्रावधान लागू किये जाना सुनिश्चित किया जावे। अन्यथा कानूनों के दुरुपयोग के बहाने, कानूनों को निरस्त/निष्प्रभावी किया जाना शुरू हो गया तो ऐसे सैकड़ों कानूनों तथा हजारों प्रावधानों को निरस्त करना होगा। जिनका हर पल दुरुपयोग होते रहने की आशंका बनी रहती है और अनेक बार दुरुपयोग होता भी है। ऐसे कुछ ज्वलंत उदाहरण आपके विचारण हेतु पेश हैं:—

1—कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय कुछ गिने—चुने परिवारों के लोगों को ही सुप्रीम कोर्ट एवं होई कोर्टों में जज नियुक्त किये जाते रहे हैं। क्या कॉलेजियम से जजों की नियुक्ति का अधिकार छीन लिया जाना चाहिये?
2—उच्च न्यायपालिका में 67 फीसदी पदों पर सीधे जजों की नियुक्ति करने में वंचित वर्गों के योग्य तथा पात्र लोगों की 67 साल से सरेआम अनदेखी की जाती रही है। क्या इन 67 फीसदी पदों पर जजों की सीधी नियुक्ति का संवैधानिक प्रावधान निरस्त कर दिया जाना चाहिये?
3—विज्ञापन के नाम पर सरकारों द्वारा जनता की गाढी कमाई से संग्रहित राजस्व को मीडिया को लुटाया जाता रहता है। क्या सरकार से विज्ञापन प्रदान करने के विशेष विवेकाधिकार को प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिये?
4—शासकीय अधिकारियों को मिले वित्तीय एवं प्रशासकीय विवेकाधिकारों का हमेशा से जमकर दुरुपयोग होते रहने के आरोप लगते रहे हैं। क्या विवेकाधीन अधिकार सामाप्त कर दिये जाने चाहिये?
5—सांसदों और विधायाकों को मिले बस—रेल यात्रा पासों का दुरुपयोग होता रहता है। क्या सांसदों और विधायकों को बस—रेल यात्रा पास बंद कर दिये जाने चाहिये?
6—जनहित में उपयोग करने हेतु आवंटित सरकारी वाहनों का निजीहित में उपयोग होता रहता है। क्या सभी सरकारी वाहनों का संचालन बंद कर दिया जाना चाहिये?
7—यातायात पुलिस द्वारा यातायात नियमों का जमकर दुरुपयोग किया जाता है। क्या यातायात नियमों को निरस्त कर देना चाहिये?
8—बैंकों द्वारा प्रदान स्वीकृत किये जाने वाले लोन में मनमानी और भेदभाव के आरेप लगते रहते हैं। क्या बैंकों को लोन स्वीकृत करने पर पाबंदी लगा देनी चाहिये?
9—सरकारी बसों में परिचालों द्वारा टिकिट जारी किये बिना यात्रियों को बिठाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया जाता है। क्या सरकारी बस संचालन बंद कर देना चाहिये?
10—सरकारी सेवाओं में भर्ती की प्रक्रियाओं में जमकर भ्रष्टाचार होता है। क्या भर्ती प्रक्रिया बंद कर दी जानी चाहिये?
11—आधे से अधिक विभागीय अनुशासनिक मामले उच्चाधिकारियों की तानाशाही और मनमानी का भय बनाये रखने के लिये बनाये जाते हैं। क्या अनुशासनिक नियमों को रद्द कर दिया जाना चाहिये?
12—टेलीफोन मोबाईल पर बात करते समय टैपिंग करके व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन किया जाता है। क्या टेलीफोन पर बात करना प्रतिबन्धित/बंद कर देना चाहिये?
13—​हाई टेंसन बिजली की लाइनों से आयेदिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं और लोगों की जानमाल को खतरा होता रहता है। क्या हाई टेंसन बिजली की लाइनों को हटा दिया जाना चाहिये?
14—आदर—सत्कार और शिष्टाचार के नाम पर शासकीय अधिकारियों, जजों और मंत्रियों को मिलने वाले बजट का जमकर निजीहित में दुरुपयोग होता है। क्या आदर—सत्कार और शिष्टाचार के नाम पर मिलने वाले बजट को समाप्त कर दिया जाना चाहिये।
15—सुप्रीम कोर्ट सहित अनेक हाई कोर्ट अनेकों मामलों में इस बात को स्वीकार चुके हैं कि हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती जैसे गंभीर अपराधों के कानून का जमकर दुरुपयोग होता है। क्या इन कानूनों को निरस्त कर दिया जाना चाहिये? इत्यादि!

प्रधानमंत्री जी, आप भूले नहीं होंगे कि 6 फरवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ में शामिल जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि ‘अगर किसी तकनीक का दुरुपयोग हो रहा है तो इसका मतलब ये नहीं किसी कानून को ही रद्द कर दिया जाए। ऐसे कोर्ट के फैसलों की लंबी कतार है जिनमें कहा गया है कि सिर्फ मिसयूज होने की संभावना से कानून को रद्द नहीं किया जा सकता।’ इसके बावजूद दो जजों की पीठ ने पांच जजों की राय को दरकिनार करते हुए अजा एवं अजजा वर्गों के विरुद्ध निर्णय सुनाते हुए सीधे—सीधे 1989 से पहले की स्थिति ला दी है। सबसे दु:खद पहलु तो यह है कि आपराधिक मामलों में विचारण का अधिकार न्यायपालिका का होता है, जहां पक्ष एवं विपक्ष की उपस्थिति में विचारण किया जाता है, लेकिन सु्प्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने विचारण का हक पुलिस के उन उच्चाधिकारियों को सौंप दिया है, जिनकी अनदेखी, सहमति, संरक्षण या चुप्पी के कारण अजा एवं अजजा वर्गों के लोगों के विरुद्ध बेरोकटोक अत्याचार एवं अपराध किये जाते रहते हैं।

प्रधानमंत्री जी, वंचित वर्गों के हित संरक्षण तथा संविधान एवं लोकतंत्र की रक्षा हेतु देशभर में सेवारत हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के लाखों समर्थकों एवं सदस्यों की ओर से आपको याद दिलाया जाता है कि प्रधानमंत्री के रूप में वंचित वर्गों की हिफाजत करना आपका संवैधानिक दायित्व है। आप विचार कीजिये कि कानून के दुरुपयोग की आशंका में न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग कितना जायज है? आशा है आप अपने दायित्वों का निर्वाह करेंगें, अन्यथा लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ जायेगा और वंचित वर्गों के विरुद्ध सुनाये जाने वाले इस प्रकार के न्यायिक निर्णय कानून—व्यवस्था एवं आपकी राजनीतिक पार्टी तथा सरकार के अस्तित्व के लिये चुनौती बन सकते हैं! उम्मीद है आप इस पर ध्यान देंगे!

प्रधानमंत्री जी, अंत में यह और कि ‘हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!’ जय भारत! जय संविधान! नर, नारी सब एक समान! इस खुले खत को वंचित समुदायों के देश के हर एक नागरिक का समर्थन मिले बिना न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती। क्योंकि वंचित वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधियों की जबान को तो लकवा मार गया लगता है? अत: आम लोगों को खुद ही अपनी आवाज उठानी होगी और जनप्रतिनिधियों से सवाल करने की हिम्मत जुटानी होगी।

सदभावी

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
( राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 9875066111 )

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