महाराणा प्रताप की महानता को कमतर मत कीजिये !

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(भँवर मेघवंशी)

 

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के एक गांव में लगे पोस्टर को देखकर लगा कि जैसे महाराणा प्रताप भी एससी एसटी एक्ट के विरोधी थे और सामान्य वर्ग के गांव में रहते थे ।

इसका मतलब तो यह हुआ कि जो इतिहास में पढ़ा ,वह शायद झूठ था कि महाराणा प्रताप की तरफ से भील (एसटी समुदाय ) के लोग हल्दीघाटी के मैदान में लड़े थे और महाराणा किसी सामान्य वर्ग के गांव में नहीं बल्कि आज़ादी के लिए जंगलों में रहे ,घास की रोटियां खाई ।

अब जाकर असली इतिहास सामने आया ,जानकर खुशी हुई ,पर लगे हाथों यह भी कोई बता दें कि आज जो ‘जय जय राजपुताना’ कहते नहीं थक रहे हैं ,उनमें से कितनों के पूर्वज महाराणा और उनकी भील सैनिकों से युक्त सेना के खिलाफ अकबर की तरफ से युद्ध लड़े थे ।

मेरा अनुरोध है कि इस विषय पर भी जरूर आत्मचिंतन करें और महाराणा प्रताप को सिर्फ राजपूत समाज का नेता न बनाये,महज सामान्य वर्ग तक सीमित करके उनका सामान्यीकरण न करें । वे आज़ादी के प्रतीक है और राष्ट्र के आदर्श है ।

दलित आदिवासी कानून से उनका कोई लेना देना नही है,आपका हो सकता है,आपके वर्तमान नेताओं का हो सकता है ,उनके साथ तो हर वर्ग था।

महाराणा की तस्वीर का बैजा इस्तेमाल मत कीजिये। महाराणा प्रताप सिर्फ आपके नहीं है,जिस तरह से एक ही जाति उनकी जयंती मना रही है,इससे भी उनका विराट व्यक्तित्व कमतर होता है,मत कीजिये।

राष्ट्र के नायक को सिर्फ एक जाति का नायक मत बनाइये।

(लेखक शून्यकाल के सम्पादक है)

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