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बहुजनों की उपेक्षा ना करें पत्रिका !

माननीय गुलाब कोठारी जी !
आपकी पत्रकारिता पर प्रश्नचिन्ह लगाना सहज नही है. आप राष्ट्रीय स्तरीय समाचार पत्र के संपादक हो इसीलिए आपको सलाह देना तो उचित नही समझता लेकिन जो शब्द आज आपने आलेख के माध्यम से बहुजन व अल्पसंख्यक के विरुद्ध लिखे है उसे पढकर मै अपने आपको पत्रिका का विरोध करने से तो नही रोक पाऊँगा . ये आपके व्यक्तित्व का विरोध नही बल्कि आपके समाचार पत्र की सामुहिक मानसिकता का विरोध है . मै सबसे पहले इस बात की तरफ आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा की अगर हम मिडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानते है तो हमे ये भी स्वीकारना होगा कि लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष दर्शन के विरुद्ध विचारो का प्रचार जनसंचार मिडिया के मानको के खिलाफ है . आपका आज का आलेख पाठको का ध्रुवीकरण लगता है ,जिस तरह से राजनीति में वोट पाने के लिए वोटो का ध्रुवीकरण किया जाता है ,शायद ठिक उसी तरह आपने हिंदुत्व की आड़ में अपनी पाठक संख्या बढाने के लिए पाठको का ध्रुवीकरण किया है . आपकी मानसिकता आरएसएस की पोषक लगती है इसीलिए आपका अखबार आम जनता की मुखर आवाज बनेगा इसमे पुरा संदेह है.

आरक्षण पर आपके विचार संकीर्ण मानसिकता का परिचय देता है ,आरक्षण का आधार आर्थिक ना होकर सामाजिक है इसीलिए इसे निर्धन या अमीर होने के आधारो पर नही दिया जा सकता ,हाँ मै स्वीकार करता हुँ के आरक्षण की समीक्षा जरुर होनी चाहिए पर आपने तो आरक्षण को जातिवाद की जड़ मानकर सवैधानिक विरोध का गुनाह किया है . आरक्षण हमारे देश में कुछ क्षेत्र में ही लागू है इसीलिए इसको जातिवाद का कारण बताना ओछी मानसिकता है ,आज जातिवाद व छुआछुत सबसे ज्यादा गाँवो में है और गाँवो में बहुजन समाज से सरकारी सेवा में इक्का दुक्का लोग ही है तो आप किस आधार पर कह रहे हो कि आरक्षण ने देश में सांप्रदायिक माहौल खराब किया है . वैसे भी आरक्षण जाति आधारित ना होकर वर्ग आधारित है और वो भी एक निश्चित क्षेत्र में फिर इसे क्युं जातिवाद से जोड़ा जाए . उस ऐतिहासिक उत्पीड़ित सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ़ भी आप कुछ बोलेँगे ,लिखेँगे, जो कई हजार वर्षो से मौजूद है और वो भी हजारो वर्गो व जातियो के विभाजन के रुप में , हिंदुओ को एक जाजम पर बिठाने के लिए आरक्षण को हटाने की क्या व कैसे जरुरत है . क्या आपके पास इसका जवाब है कि आरक्षण हटाने से किस प्रकार सामाजिक समरसता पैदा होगी .आप क्युं चाहते हो कि अपना देश धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र से हिंदुत्व राष्ट्र बन जाए ,सबकी अपनी इच्छाए आकांक्षाए व मान्यताएं है इसीलिए इस देश में रहकर कोई भी किसी भी विचारधारा को मानने के लिए स्वतंत्र है ,फिर क्युं आप जबरन लोगों पर विचारधारा थोपने पर आमादा हो . क्युं आप सविधान प्रदत्त स्वतंत्रता ,अभिव्यक्ति व धर्म की मौलिक स्वतंत्रता पर बन्दिशे लगाना चाह रहे है . क्या आप इस बात को नही जानते कि इस देश में और भी कितने मुद्दे पड़े है जिस पर सार्थक बहस की आवश्यकता है फिर क्युं आप सिर्फ नफरती हवा फैला रहे है .

मानते है कि अभिव्यक्ति आपकी स्वतंत्रता है तो आप भी इस बात को जान लो कि बहिष्कार व नकारना हमारी आजादी है . मै आपके पत्रिका समाचार पत्र का पूर्ण बहिष्कार करता हुँ और जंहा तक मेरी पहुंच है, मै अपने दोस्तो ,परिजनो व मेरी वैचारिक समता के तमाम लोगो को पत्रिका वर्जित का आग्रह करूँगा . आप बेशक लिखिए , पर हम स्वीकार नही करेंगे.
-जितेन्द्र के परमार ,रानीवाड़ा (जालोर)

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