अयोध्या में धर्म संसद : फिर मांद से निकले साधु-संत !

राम मंदिर मुद्दा !

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(एच.एल.दुसाध)

विगत दो दशकों से जब-जब लोकसभा चुनावों का समय आता है, साधु-संत राम मंदिर निर्माण के प्रति अपनी उग्र प्रतिबद्धता का इजहार कर निरीह हिन्दुओं की धार्मिक चेतना का राजनीतिकरण करने की कोशिश में जुट जाते हैं और चुनाव ख़त्म होते ही अपनी मांद में घुस जाते हैं. इस सिलसिले को जारी रखते हुए विश्व हिन्दू परिषद् के झंडे तले इकट्ठे होने वाले साधु-संत इस बार विगत चुनावों की अपेक्षा और बड़ी तैयारी के साथ आगामी 25 नवम्बर को अयोध्या में इकठ्ठा हो रहे हैं. उस दिन वहां एक धर्मसंसद आहूत है, जिसमें हिन्दू धर्म के सभी पंथों,पीठों,अखाड़ों,प्रमुख मठों के साधु-संतों का समागम हो रहा है. इस धर्मसंसद के आयोजन की तुलना 1992 के मंदिर आन्दोलन से की जा रही है. आज तमाम चैनलों पर चर्चा का विषय संतो का यह धर्मसंसद ही है. इससे गरमाने वाले धार्मिक माहौल को देखते हुए कई मुस्लिम संगठनों ने वहां के स्थानीय मुसलमानों की सुरक्षा के लिए प्रशासन के समक्ष गुहार लगाई है.

इस धर्मसंसद पर विहिप की ओर से कहा गया है कि भव्य मंदिर निर्माण में जो बाधा आ रही है, उससे हिंदू समाज में आक्रोश है। संतों और हिंदुओं ने तय किया है कि अब वे माननीय न्यायालय के फैसले का और इंतजार नहीं कर सकते। देश की सर्वोच्च पंचायत इस संबंध में फैसला करें, नहीं तो सड़क से संसद तक संघर्ष होगा. प्रयागराज में अगले वर्ष 31 जनवरी को आयोजित धर्म संसद में संत समाज मंदिर निर्माण पर निर्णय लेंगे। 25 नवंबर से नौ दिसंबर तक देशभर में विहिप की ओर से सभाएं भी की जाएंगी। 29 नवंबर को प्रयागराज में विहिप के 20 हजार कार्यकर्ता जिला मुख्यालय के समक्ष संतों के मार्गदर्शन में सभा करेंगे।

बहरहाल धर्मसंसद के आयोजन के पीछे संतों का एकमेव लक्ष्य भाजपा को लाभ पहुँचाना है, यह बुद्धिजीवी वर्ग ही नहीं, आम जनता तक कह रही है, यह बात चैनलों पर बहस देखने वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है.चैनलों पर साफ देखा जा रहा है कि संतों के इस प्रयास का जहाँ कई लोग मखौल उड़ा रहे हैं, वहीं राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित उनकी गतिविधियों से गंभीर किस्म के हिन्दू आहत भी हैं. वह इसलिए कि वे ऐसा मानते हैं कि जो संत जगत को मिथ्या और ब्रह्म को सत्य मानकर संसार त्याग दिए हैं,वे क्यों एक दल विशेष को लाभ पहुचाने के लिए राम की आड़ में इस किस्म खेल, खेल रहे हैं. बहरहाल लोग अगर साधु-संतो की गतिविधियों से आहत हैं तो उन्हें होना भी चाहिए, क्योंकि विगत सहस्राधिक वर्षों के हिन्दू समाज की गुलामी के दौर में ब्रह्मलीन संतों का ध्यान कभी भंग नहीं हुआ. बेशक अंग्रेज भारत में जन्मे स्वामी दयानंद सरस्वती, ऋषि अरविन्द, स्वामी विवेकानंद जैसे संतों ने देव-भक्ति से अपना ध्यान देश-भक्ति में लगाते एवं राजनीती में रूचि दिखाते हुए सदा ब्रह्मलीन रहने वाले भारतीय साधकों की महान परम्परा में कुछ अपवाद घटित किया था. लेकिन शंकराचार्य, रामानुज स्वामी, सूरदास-तुलसीदास, रामदास कठियाबाबा, बाबा गंभीरनाथ, भोलानाथ गिरी, तैलंग स्वामी, बामाक्षेपा जैसे संत मिथ्याजगत से आँखे मूंदे ब्रह्मलीन बने रहे ताकि मोक्ष-प्राप्ति, जोकि साधु-संतों का परम लक्ष्य होता है, के मार्ग में विघ्न न आ जाये. इसलिए हम पाते हैं भारत विदेशियों का गुलाम बना रहा, बहुसंख्य जनता कीड़े-मकोड़ों की जिन्दगी जीती रही, पर हमारे सुपर स्टार साधकों का ध्यान कभी जागतिक समस्यायों को लेकर भंग नहीं हुआ. यही कारण है भारतीय साधकों की महान परम्परा के ध्वजवाहक कल के गिरिराज किशोर, रामचंद्र दास परमहंस, तेजसानंद,दिव्यानंद हों या आज के महंत मणिराम दास , महंत रघुनाथ दास, महंत राम नृत्य गोपाल दास, महंत सुरेश दास या महंत जन्मेजय शरण इत्यादि जैसे असंख्य छोटे-बड़े साधु-संत: राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित इस तरह की गतिविधियों में उन्हें लिप्त होंते देखे हिन्दू भक्त-मन आहत है. बहरहाल वर्तमान साधकों के क्रियाकलाप से वे ही लोग आहत हो सकते हैं जिन्हें विगत हजार साल की गुलामी में न तो विभिन्न जातियों की सामाजिक स्थिति और न ही भारत के हिन्दू समाज में जन्मे व्यक्तियों के मनोविज्ञान की सही समझ है.

वास्तव में अतीत से लेकर आज तक हिन्दू समाज में व्यक्ति की सोच स्व-जाति/वर्ण की स्वार्थ सरिता के मध्य प्रवाहित होती रही है. ऐसे समाज में जन्मे लोगों में समग्र वर्ग की चेतना का नितांत अभाव रहा है. हिन्दू समाज की इस मनोवैज्ञानिक कमजोरी के कारण ही फुले,शाहूजी, आंबेडकर,पेरियार ने अगर दलित-पिछड़ों के लिए अपना सर्वस्व त्याग किया तो राजा राममोहन राय, विद्यासागर, गाँधी, डॉ.हेडगेवार जैसे अनगिनत उच्च वर्णीय हिन्दू महापुरुषों सोच सवर्ण समाज की परिधि को पार कर, बहुजन समाज तक प्रसारित न हो सकी. वर्तमान पीढ़ी के साधु-संत भी हिन्दू-जाति समाज की इसी मनोवैज्ञानिक व्याधि के हाथों पीड़ित होकर 1990 के बाद से ही भाजपा को फायदा पहुचाने का सतत उपक्रम चला रहे हैं. चूँकि प्रधानमंत्री मोदी की चरम देश व बहुजन विरोधी नीतियों के कारण भाजपा का 2019 में सत्ता से बाहर जाना तय सा दिख रहा है, इसलिए वे इस बार 1992 के बाद अतिरिक्त प्रयास करते दिख रहे हैं.

भारत के साधु-संत किस जाति के हैं? दिमाग पर बिना कोई बोझ डाले कहा जा सकता है,’ब्राह्मण जाति के’! कुछ संख्या योगी आदित्यनाथ जैसे क्षत्रियों की भी हो सकती है. दूरबीन से देखने पर इनमें उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा, आचार्य धर्मेन्द्र,बाबा रामदेव,साध्वी सावित्रीबाई फुले, साक्षी महाराज जैसे नगण्य संख्यक शुद्र भी मिल जायेंगे, जो संतों की जमात में घुसपैठियों जैसी हैसियत रखते हैं. घुसपैठिये इसलिए कि जिस उद्देश्य(मोक्ष) के लिए संत गृह-त्याग कर आध्यात्मानुशीलन में रत होते हैं, उसकी पूर्ति के लिए हिन्दू धर्म-शास्त्र-ईश्वर ने शुद्रातिशूद्रों के लिए एकमात्र उपाय तीन उच्चतर वर्णों की निष्काम-सेवा बताया है: सन्यास इनके लिए पूरी तरह वर्जित रहा है. इस प्रावधान के कारण ही राम ने शम्बूक का सर कलम किया: इस कारण ही स्वामी विवेकानंद के मरणोपरांत सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस सर गुरुदास बंदोपाध्याय ने कहा था-‘भारत में होता यदि कोई हिन्दू राजा,विवेकान्द को फांसी के फंदे पर लटका देता, क्योंकि हिन्दू धर्म में शुद्र को सन्यास ग्रहण करने का कोई अधिकार नहीं है.’ धर्माधारित इन तथ्यों के आईने में कहा जा सकता है कि शास्त्रगत अधिकारों और प्रावधानों के कारण साधु-संतों की जमात में कमसे कम 90 प्रतिशत ब्राह्मण होंगे, वहीं शुद्रातिशुद्र और क्षत्रिय-वैश्यों से युक्त अ-ब्राह्मण साधु-संत 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकते. ऐसे में यह मानने में द्विधा नहीं होनी चाहिए कि संत समाज वास्तव में ब्राह्मणों का समाज है. और जब ब्रह्मणों का समाज है तो जाहिर है उसकी सोच ब्राह्मण हित से प्रेरित होगी. क्योंकि पहले ही बताया जा चुका है कि हिन्दू जाति-समाज में व्यक्ति की सोच स्व-जाति/वर्ण के स्वार्थ की परिधि के मध्य प्रवाहित होती है. चूंकि भाजपा के पितृ-संगठन आरएसएस का लक्ष्य ब्राह्मणों के नेतृत्व में सवर्णों का शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनितिक-शैक्षिक-धार्मिक) पर एकाधिकार स्थापित करवाना है और इस काम में भाजपा का कोई जोड़ नहीं है. इसलिए ही साधु-संत भाजपा के प्रति अतिरिक्त दुर्बलता का पोषण करते हुए इसके पक्ष में आप आदमी की तरह फिजा बनाने में जुट जाते हैं. यहाँ कई लोगों के मन में प्रश्न उठ सकता है कि जिन संतों ने प्राचीन ऋषि-मुनियों की वाणी पर विश्वास करते हुए जगत को मिथ्या मान लिया वे भला क्यों ब्राह्मणों के स्वार्थ की बात सोचेंगे?

इस प्रश्न का जवाब जानने के लिए सबसे पहले यह जानना जरुरी हा कि क्या वास्तव में संतों(ब्राह्मणों) ने जगत को मिथ्या और ब्रह्म को ही शेष सत्य माना है? नहीं ! संतों का यह प्रचारित दर्शन हाथी के दांत की तरह है, जो खाने के लिए और तथा दिखाने के लिए और होता है. अगर ऐसा नहीं होता क्या हजारों साल से लेकर आजतक मंदिरों में अकूत संपदा जमा होती! स्मरण रहे कि मध्य युग के मुसलमान लूटेरों ने अपनी लूट  का लक्ष्य मंदिरों को इसलिए बनाया क्योंकि उन्हें पता था कि देश की जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई  मठों-मंदिरों में जमा हैं. लोगों की धार्मिक –दुर्बलता का दोहन कर जमा की गयी अकूत दौलत को लूटने के सिलसिले में ही हिन्दू मंदिरों का ध्वंस हुआ: सैकड़ों सालों के लिए देश इस्लामी विजेताओं का गुलाम बना . इसी क्रम में देश में खड़े हुए बाबरी जैसे गुलामी के असंख्य प्रतीक !संतों ने इस पार्थिव जगत को ही सत्य और ब्रह्म को मिथ्या माना था, इसलिए देवालयों को वेश्यालयों में परिणत करने में उन्हें ईश्वर-भय कभी नहीं सताया. डॉ. आंबेडकर ने कहा है धर्म भी शक्ति का एक स्रोत है और शक्ति के रूप में इसकी अहमियत आर्थिक शक्ति से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है. जागतिक सुख को ही परम सुख मानने के कारण ब्राह्मणों ने ऐसा कुचक्र रचा कि आर्थिक शक्ति के समतुल्य धार्मिक शक्ति पर उनका चिरकाल के लिए शत-प्रतिशत कब्ज़ा हो गया : गैर-ब्राह्मणों को इसमें रत्ती भर भी शेयर नहीं मिला . ब्रह्म-सत्य,जगत मिथ्या में विश्वास किया तो सिर्फ शुद्रातिशुद्रों ने. इसलिए मोक्ष के लिए तीन उच्चतर वर्णों की निष्काम सेवा करते हुए चिरकाल के लिए स्वतः स्फूर्त रूप से खुद को शक्ति के स्रोतों से वंचित कर नर-पशु में तब्दील कर लिए. बहरहाल इसमें कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि ब्राह्मण चाहे गृहस्थ रहे या गृह-त्यागी संत : उन्होंने सर्वोच्च वरीयता सिर्फ और सिर्फ जागतिक सुख को दिया. जागतिक सुख को सर्वोच्च वरीयता देने के कारण वे आज भी निज व निज-वर्ण के स्वार्थ के लिए सब समय सक्रिय रहते हैं. इसलिए भाजपा के जिस मोदी सरकार की कृपा से ब्राहमणों का धर्म-सत्ता ही नहीं, राज-अर्थ व ज्ञान-सत्ता पर अभूतपूर्व रूप से कब्ज़ा हुआ, उसकी पुनर्वापसी के लिए संत के वेश में छिपे ब्राह्मण अभूतपूर्व रूप से धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण में जुट गए हैं.

एच.एल.दुसाध   

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)

(ये लेखक के निजी विचार है)
फोटो क्रेडिट- इन्टरनेट

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