‘नियति’ महज़ एक ‘बचाव’ का शब्द है !

- तोलाराम चौहान

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हम कहते है कि नियति को यही मंजूर था,इसलिए हमारे साथ बुरा हो गया। यंहा हम ये बोल कर स्वयं का बचाव कर रहे है, खुद को धोखा दे रहे है या जिसके लिए उपयोग कर रहे है,उसे बरगला रहे है।

कुछ भी करते तो आज तो उसे मरना ही था। दुर्घटनाओं के बाद अक्सर गावो में ये बात बोलते हुए सुन सकते है,पर ऐसा नही है। यदि विश्व की समस्त दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया जाए तो 70 प्रतिशत लापरवाही या भूल से, 20 प्रतिशत तकनीकी कारणों से और 10 प्रतिशत अन्य कारणों से होती है। तो फिर नियति का नाम लापरवाही हुआ! हमे तर्क संगत सोचना होगा,बोलना होगा, जागरूक करना होगा।

मेरे गांव में 4 युवा हाल ही के समय मे दुर्घटनाओं के शिकार हो गए,लोग हर बार बोलते है कि नियति को यही मंजूर था,ऐसा कभी नही हुआ कि एक जान जाने पर युवाओ के साथ संवाद किया जाए, हैलमेट की सलाह दी जाए, पर नही। सब बोलते है कि नियति को यही मंजूर था।

एक गांव में एक व्यक्ति को काले सांप ने डस लिया और उसके परिवार वाले झाड़ फूंक वाले के पास ले गए।। व्यक्ति की तबियत बिगड़ी औऱ दुनिया छोड़ दी। लोग बोले कि नियति को यही मंजूर था,यदि आज हम इसको कोठी में भी बंद कर देते तो भी इसकी मौत इस सांप के काटने से ही होती। ऐसे किस्सा सुनाते है जो मंनगढंत होते है।

नियति यानी होनी !

अनहोनी होनी नही,होनी हो सो होय। ऐसे वाक्यांश ओर दोहे भरे पड़े है,जो ये कहते है कि जो गुनाह या भूल हुई वो होनी थी,नियति का ही स्वरूप। एक व्यक्ति को सुगर औऱ उक्त रक्तचाप था। कभी जांच नही करवाई,3 महीने तक ये क्रम चलता रहा,आखिर उसकी वजह से ब्रेन हेमरेज हो गया अस्पताल में जानकारी ली तो बताया कि बहुत देरी कर दी। अब बहुत सारे सिस्टम फेल हो चुके है। आखिर मौत हो गयी। लोग बोले इनकी इतनी ही उम्र लिखी हुई थी। किसने लिखी ? कहाँ लिखी ? लिखी हुई पढ़ी किसने? तर्क करेंगे तो कई जिंदगी संवार सकते है। हम इसी तरह की दकियानूसी बातों से समाज को सकारात्मकता से रोक रहे है।।

नियति का असर ग्रामीण क्षेत्र में

बुरा या भला कुछ भी हो,ग्रामीण एरिया में उसके लिये जिम्मेवार व्यक्ति को नही ठहराते । बल्कि नियति या कर्मो को देंगे। यदि कलक्टर बन जाये तो कर्म अच्छे थे,यदि फेल हो गया तो किस्मत खराब थी। तो उस किस्मत की किताब तक पढ़ने वाले कैसे पहुंचे ?

आपके आस पास भी हजारो उदाहरण दिन भर में घटित होते होंगे,जिसमे आप ऐसे शब्द सुनते होंगे,या बोलते होंगे। उस समय उस पर टिप्पणी करके वजह जाने,ताकि नियति नामक ये तकलीफ दूसरे को नही आये। नही तो पुलिस हेलमेट या बेल्ट का कानून बनाने की बजाय नियति का कानून बनाएगी।

थोड़ा चिंतन करे, वैज्ञानिक तरीके से। गाड़ी का एक्सीडेंट होता है तो कम्पनी ये जांच करवाती है कि जान किस वजह से गयी और गाड़ी को ऐसी डिजाइन की कैसे बनाया जाए ताकि दुर्घटना में कम से कम जान की क्षति हो। अब वो भी नियति को मंजूर होना मानकर बैठ जाए तो मौत को कैसे रोक सकेंगे।

बेटी का ससुराल में प्यार मिल जाये तो किस्मत या कर्मो का फल।पति दारू पिये तो उसके बुरे कर्म। तो कर्म या नियति का अर्थ क्या होगा? जबकि मेरा मानना है कि दारू पीकर मारपीट करने वाले का बचाव मत करो,उसको पीटने का लाइसेंस मत दो।उसको ऐसी सजा दिलवाओ की कोई और नियति किसी बेटी की जिंदगी को बुरा न बना सके.क्या नियति हमे इजाजत देती है कि अस्पताल में इलाज नही करवाये ओर ठीक हो जाये ?

नियति से निकलकर वैज्ञानिक सोच तक आने के लिए कारणों का विश्लेषण करें,कलक्टर बनने पर उसकी और उसके परिवार की मेहनत को सम्मान दे और सीखे कि कैसे दूसरे को वंहा तक पहुंचाया जा सकता है। ठीक वैसे ही यदि असफल होता है तो उसकी वजह नियति को नही मानकर उसकी कमी की पहचान करें, ताकि अगली बार जरुर सफल हो। सकारात्मक एवं वैज्ञानिक सोच और चिंतन कई जिंदगियों को रोशनी,जीवन और हिम्मत दे सकती है।

( लेखक राजस्थान में कार्यरत वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता है )

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