मुनाफे की हवस में मरते मजदूर

-सुनील कुमार

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दिल्ली देश की राजधानी है जहां पर देश के नियम, कानून बनाने वाले और उसको लागू कराने वाले रहते हैं। देश के अन्य हिस्सों में यह समझा जाता है कि दिल्ली में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहतर है। कुछ घटनाओं पर हम नजर डालें तो यह पुलावी ख्याल ही लगता है। दिल्ली में आये दिन होती लूट और बलात्कार तो रोजमर्रा की घटना बन चुकी है। मुनाफे की हवस के कारण मजदूरों की आग में जल कर मरने की घटना भी तेजी से बढ़ती जा रही है। लूट, बलात्कार और मजदूरों की आग में जलने की घटनाओं में अंतर है; जहां पहली घटना से लोगों में आक्रोश दिखता है और लोग इसको बातचीत में खराब होती व्यवस्था के उदाहरण के तौर पर रखते हैं। मजदूरों के जलकर मर जाने की घटना के कारण लोगों में वह आक्रोश नहीं दिखता और न ही इसे व्यवस्था की नाकामी के रूप में माना जाता है। इन दोनों घटनाओं में यह भी एक अंतर है- जहां पर लूट (सड़क पर छीन लेना या घर में घुस कर डकैती करना) पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा उत्पन्न की गई समस्या है, वहीं बलात्कार पूंजीवादी-बाजारवादी संस्कित की देन है। मजदूरों का फैक्ट्री में आग में जलकर मर जाना पूंजीवादी मुनाफे की हवस का परिणाम है।

मुनाफे की हवस की आग में 9 अप्रैल, 2018 को सुल्तानपुरी का राज पार्क में 4 मजदूर जल कर मर गए। सुल्तानपुरी का यह इलाका एक मध्यम वर्गीय रिहायशी इलाका है जहां पर करीब 500 के आस-पास घर हैं। इनमें से 100 से भी अधिक घरों में जूते, चप्पल, सिलाई और अन्य कामों की फैक्ट्रियां चलती हैं। इनमें से अधिकांश में जूते, चप्पल का काम होता है जिसमें पेस्टिंग से लेकर सिलाई तक का काम होता है। यहां पर काम करने वाले मजदूरों से न्यूनतम मजदूरी के आधे में 10-12 घंटे काम कराया जाता है। यहां पर ज्यादातर मजदूर पीस रेट या 5-7 हजार रू. प्रति माह पर काम करते हैं। मजदूरों को लालच दिया जाता है कि रहने की जगह दी जायेगी। शहर में आवास की समस्या से जूझ रहे मजदूरों के लिए रहने की जगह मिलना बहुत बड़ी राहत जैसी होती है जिंसके कारण वह कम पैसे में भी काम करने को राजी हो जाते हैं। मालिक के लिए यह सोने पर सुहागा जैसे हो जाता है। उनको 24 घंटे का फ्री में मजदूर मिल जाता है जो किसी भी समय फैक्ट्री में लोडिंग, अनलोडिंग, चौकीदार का काम करते हैं। इसके बदले इनको टैरिस (छत) पर एक रूम मिल जाता है जिसमें 8-10 लोग रहते हैं और बनाते, खाते हैं। मालिक घर जाते वक्त फैक्ट्री में बाहर से ताले लगा देते हैं। इसके दो कारण हैं एक तो यह कि नये मजदूर कहीं काम अच्छा नहीं लगने के कारण भाग न जाए; दूसरा कि मजदूर रात में चोरी न कर ले।

10 अप्रैल को जब मैं सुल्तानपुरी के राज पार्क स्थित ए-197 मकान पर पहुंचा (जहां पर एक दिन पहले आग लगी हुई थी) उस गली में सन्नाटा था। ए-197 के बगल वाले घर के सामने प्लास्टिक की तीन-चार कुर्सियां पड़ी थीं और गली के एक मुहाने पर कुछ लोग आपस में बातचीत कर रहे थे और मुझे देख रहे थे। ए-197 मकान को देखकर पूछने की जरूरत नहीं थी कि इसी फैक्ट्री ने एक दिन पहले चार जिन्दगियों को निगल लिया। यह मकान चार मंजिला है, नीचे वाले फ्लोर पर एक 4 फुट का गेट है। इसके अलावा ऊपर में दो रोशनदान लगा है जो कि आग लगने से काला हो चुका था। गेट के बगल में काले पत्थर पर मकान नं. ए-197, अनिता सदन और ऊं लिखा हुआ है। साथ ही स्वास्तिक का दो चिन्ह बना हुआ है, दिवाल के ऊपरी हिस्से पर सी.सी. टीवी कैमरा लगा हुआ था। लोगों ने बताया कि यह फैक्ट्री बृजेश गुप्ता की है जो कि ए-83 में रहते हैं। ए-197 में चप्पल बनाने का काम होता है जिसमें करीब 30-35 मजदूर काम किया करते थे। इस इलाके में रविवार अवकाश होता है लेकिन बहुत सी कम्पनियों में काम होता है। जनसत्ता में छपी खबर के अनुसार कारखाने में काम करने वाले मोहम्मद अली ने बताया कि यह फैक्ट्री 15 सालों से चल रही थी और 8-9 अप्रैल की रात 2 बजे तक मजदूरों ने काम किया। 9 तारीख की सुबह यूपी के हरदोई जिला के अस्मदा गांव के मजदूर परिवारों के लिए बुरी खबर लेकर आई। अस्मदा गांव के रहने वाले मोहम्मद वारिस (18), मोहम्मद अय्यूब (17), मोहम्मद राजी (20) व मोहम्मद शान (17) 10 तारीख की सुबह नहीं देख पाए और जलकर फैक्ट्री के अन्दर ही मर गए। चार लोगों के अलावा कई लोग जान बचाने के लिए छत से कूदे जिसमें उनको चोटें लगीं। मोहम्मद वारिस और मोहम्मद अय्यूब दोनां सगे भाई हैं जबकि मोहम्म्द राजी व मोहम्मद शान चचेरे भाई हैं। सुल्तानपुरी में यह आग की कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी फैक्ट्रियों में आग लग चुकी है लेकिन कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हो पाने के कारण न्यूज नहीं बन सकी।

आस-पास के लोगों के अनुसार इसमें आग करीब सुबह 6.30 बजे के करीब लगी। दमकल विभाग और पुलिस को सूचना 6.35 पर मिल चुकी थी। लोगों का कहना है कि मुहल्ले के काफी लोग इक्ट्ठा हो गए थे, लेकिन बिजली कटी नहीं थी इसलिए लोगों ने पहलकदमी नहीं ली। दमकल की दर्जनों गाड़ियों ने मिलकर करीब दो घंटे में आग पर काबू पाई और लोगों को संजय गांधी अस्पताल पहुंचाया, जिसमें से चार लोगों को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

इस तरह की दिल्ली में यह पहली घटना नहीं है अभी जनवरी माह में ही बवाना सेक्टर 5 में आग लगने से 17 मजदूरों की जान चली गई। इस घटना में भी कहा जाता है कि काफी संख्या में मजदूरों की मौत हुई, लेकिन फैक्ट्री में जो मजदूर रहते थे उनका पता नहीं चल पाया। इससे पहले पीरागढ़ी, मंडोली, शादीपुर, शाहपुर जाट इत्यादि जगहों पर दर्जनों मजदूरों की जानें जा चुकी हैं। बवाना, सुल्तानपुरी, नरेला के बाद नवादा की क्रॉकरी फैक्ट्री में लगी आग ने तीन मजदूरों को निगल लिया है और चार मजदूर लपाता हैं। यह घटना भी नरेला, सुल्तानपुरी की घटना की ही पुनरावृत्ति है। मालिक बाहर से ताला लगाकर काम करा रहे थे और दिल्ली और केन्द्र सरकार सो रही थी।

इस तरह की घटना के बाद जब उक्त जगह पर जाते हैं तो पीड़ित मजदूर नहीं मिल पाते हैं। सही जानकारी इक्ट्ठा करना मुश्किल होता है लेकिन इंडस्ट्रीयल एरिया में होने से कुछ तथ्य मिल जाते हैं। सुल्तानपुरी जैसे रिहायशी इलाके में इस तरह की घटना होती है तो किसी भी तरह के मजदूर से मिल कर कुछ पता करना लगभग असंभव सी बात होती है। राज पार्क में जाने पर वही लोग मिलते हैं जो आस-पास फैक्ट्रियों के मालिक हैं। यह मालिक हर आने-जाने वाले बाहरी व्यक्तियों पर निगाह रखे होते हैं और अपनी बात सुनाते हैं कि मालिक कि किस्मत खराब थी, वह फंस गए। मीडिया वाले गलत बयान छाप रहे हैं- लड़के तो काम ही नहीं करते थे, वह तो घूमने आए थे, बाहर से कोई ताला बंद नहीं रहता था, इत्यादि, इत्यादि। जब तक कोई बाहरी व्यक्ति उस इलाके में रहता है यह लोग नजर बनाए रखते हैं कि वह कहां जा रहा है, किससे बात कर रहा है। पास में खड़े एक व्यक्ति ने इस मुद्दे को अलग रूप देने के लिए बोलता है कि हिन्दुस्तान एक नहीं हो रहा है लेकिन सऊदी अरब एक करना चाहता है। इस व्यक्ति का साफ-साफ इशारा हिन्दू-मुस्लिम करने का था। हम जान सकते हैं कि इस तरह की मानसिकता रखने वाले व्यक्ति मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान के मौत पर किस तरह सोचता होगा?

गांधी नगर रेडिमेड कपड़ों का जाना-माना मार्केट है। इस मार्केट की खबरें एक कोने से दूसरे कोने तक नहीं पहुंच पाती है। 22-23 अप्रैल, 2018 की रात लगी आग और दो लोगों की मौत का पता करने जब मैं गांधी नगर पहुंचा तो बहुत लोगों को पता ही नहीं था कि यहां पर आग लगी है। कुछ लोगों को मीडिया से पता भी चला तो उनको यह मालूम नहीं था कि आग किधर लगी है और क्या नुकसान हुआ है। काफी लोगों से पूछने के बाद एक नौजवान ने बताया कि गुरूद्वारे वाले गली की तरफ आग लगी है। जब मैं घास मार्केट के मुख्य सड़क पर गया तब भी कोई आग लगने की बात नहीं बता पा रहा था। गुरूद्वारे वाले गली में जाने के बाद एक जूस विक्रेता ने उस गली के तरफ इशारा करते हुए बताया कि उस घर में आग लगी है। जब मैं उस मकान के पास गया (मकान नम्बर 2490) तो माहौल देखकर नहीं लग रहा था कि इसी मकान में दो दिन पहले दो लोगों की जिन्दगी खत्म हो चुकी है। उस घर को देखने पर आग लगने का पता चल रहा है। बाकी उस मान में लोग आ जा रहे थे, कपड़े निकाल कर गाड़ी पर लादे जा रहे थे। कोई सिलिंग नहीं थी, सब कुछ सामान्य सा लग रहा था।

इस मकान के बगल में एक महिला से बात हुई तो वो बताया कि यहां पर दो-चार घर छो कर हर घर में फैक्ट्री व गोदाम है। 2490 नंबर मकान भी एक संकरी गली में है, जिसमें चार पहिया वाहन भी मुश्किल से जा सकता है। यह मकान 4 मंजिला है, जिकसी तीन मंजिलों में फैक्ट्री चलती है। सबसे ऊपर से मकान मालिक खुद रहते हैं और तीन मंजिल किराये पर दिए हुए हैं। इन ईलाकों में कोई श्रम कानून का पालन नहीं हो रहा है। मजदूरों को 8-10 हजार रू. प्रति माह देकर काम कराया जाता है, सप्ताहिक छुट्टी के अलावा और कोई नहीं दी जाती है। यहां तक कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी उस मकान को खानापूर्ति जांच के लिए भी सीलबंद करना उचित नहीं समझा गया। इस इलाके में चलने वाली हर फैक्ट्री मे रिहाईशी भी है, जो कभी भी दुर्घटना का एक बड़ा कारण बन सकता है। किसी भी फैक्ट्री में सुरक्षा मानकों का ध्यान नहीं रखा गया है। यहां तक कि इन मकानों के अन्दर एक ही दरवाजा होता है और आग से बचाव के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है। अगर प्रशासन का यही रवैया रहा तो कभी भी यहां बहुत बड़ा जान-माल का नुकसान हो सकता है।

दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर रिहायशी ईलाकों में फैक्ट्रियां चल रही हैं जहां पर मालिक मनमाने तरीके से काम करता है और किसी तरह के श्रम कानून को लागू नहीं करता है। दिल्ली सरकार, केन्द्र सरकार, एमसीडी, प्रशासन चुप बैठा हुआ है। क्या इस तरह की घटना प्रशासन और सरकार की मिली-भगत के बिना हो सकती है? इस तरह की घटना होने के बाद केवल मुआवजे देकर सरकार अपनी जिम्मेवारी से इतिश्री कर लेती है। क्या मुआवजे देने से ही मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान जैसे लाखों मजदूरों को इन्साफ मिल पाएगा? सरकार, प्रशासन कब तक ऐसी फैक्ट्रियों को चलते रहने देगी, जो कि श्रम कानूनों को ताक पर रखकर चला रही हैं? कब तक मजदूरों की आवास की मांग को श्रम कानून में एक अधिकार के रूप में जोड़ा जाएगा? क्या इसी तरह मजदूर मरते रहेंगे और मजदूर, कर्मचारी यूनियनें हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगी? जब दिल्ली में मेहनकश जनता के साथ इस तरह से होता है तो देश के बाकी हिस्सों के विषय में हम सोच सकते हैं।

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