दलित ,आदिवासी और क्षत्रिय समुदाय के बीच संवाद की एक अभिनव पहल !

सामाजिक सद्भावना संवाद की अगली कड़ी !

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जयपुर संवाद -1

किसी ने क्या खूब कहा –
“नफरतों का सफर ,एक कदम ,दो कदम
तुम भी थक जाओगे,हम भी थक जाएंगे।”

सब तरफ जब घृणा ,अविश्वास और द्वेष का भाव द्विगुणित हो रहा है,माहौल में जहर है,विचार नफ़रत सने है। कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं है ,लोग ‘हम’ और ‘वो’ के रूप में विभाजित करके एक दूसरे को देखा जाना पसंद कर रहे है,ऐसे विषाक्त वातावरण में मिल बैठकर मिलन के साझे बिंदुओं की तलाश करना बेहद कठिनाई भरा काम होता है।

मगर आज यह असंभव घटित हुआ जयपुर में ,जब दलित ,आदिवासी और क्षत्रिय समुदाय के विचारवान लोग एक साथ बैठे और खुलकर विचारों का आदान प्रदान किया।

तकरीबन पांच घण्टे तक चली यह संवाद प्रक्रिया एक अभिनव पहल मानी जा सकती है । क्योंकि कईं गम्भीर असहमतियों ,मत भिन्नताओं और वैचारिक विविधताओं के बावजूद तमाम उपस्थित लोगों ने अपनी बात पूरी दृढ़ता व निर्भीकता से रखी, एक दूसरे को पूरी तन्मयता से सुना और समझने का प्रयास किया ।

इस संवाद को “सामाजिक सद्भावना संवाद” का नाम दिया गया,राजस्थान के कईं जिलों से लोग मौजूद रहे । इस संवाद का हिस्सा बनने वाले संगठनों में क्षत्रिय युवक संघ, श्री क्षात्र पुरुषार्थ फाउंडेशन, दलित आदिवासी एवं घुमन्तू अधिकार अभियान, डेमोक्रेटिक भारत, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, पाक हिन्दू विस्थापित संगठन , जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वयन ,अम्बेडकर रिसर्च फाउंडेशन, बुद्धम पब्लिशर्स तथा अजा जजा एकता मंच के प्रतिनिधियों की भागीदारी रही ।

संवाद की शुरुआत में पुलवामा के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गयी ,फिर सबका परिचय हुआ और बाद में तनसिंह जी द्वारा रचित ” क्रांति का बजरा” नामक एक सुमधुर गीत से गाया गया ।

इस संवाद के मुख्य परिकल्पनाकारों में से एक राजेन्द्र सिंह भियाड़ ने संवाद की जरूरत और उसके एजेंडे के बारे में अपनी प्रभावपूर्ण बात रखी ,उन्होंने संविधान की प्रस्तावना से बात शुरू की और आज के जीवंत सवालों पर और वर्तमान परिस्थितियों पर बात की । उन्होंने इस संवाद की प्रक्रिया की आवश्यकता के बारे में बताया और देश समाज मे आ रहे बदलावों पर चर्चा करते हुए कहा कि हम किसी भी विचार या कलर की पार्टी या संस्था के लोग हों,हमें सामाजिक न्याय की अवधारणा को धरातल पर स्थापित करने के लिए जी जान लगा देनी चाहिए।

संवाद की शरुआत में ही मुझे भी अपनी बात कहने का अवसर प्राप्त हुआ ,इस मौके पर मैंने भी अपने मन की कुछ बातें रखी ,जो कमोबेश इस तरह से थी -” हम आज यहां एक स्वस्थ संवाद की नींव रखने के लिए एकत्र हैं,हम और वे के भाव से हम नहीं बैठे हैं ,न ही एक दूसरे को पराजित करने या जीतने के लिए यहां आये हैं, हमारे बीच कई मुद्दों पर मतभेद एवं वैचारिक असहमतियां है और आर्थिक व सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूपों में विषमताएं हैं ,हम कईं तलों पर आज भी असमान हैं ,हमारी पृष्ठभूमियाँ भी भिन्न है ।हम शासक- शाषित ,शोषक -शोषित ,राजा -प्रजा ,उच्च- निम्न जैसे अतीत की स्मृतियों से आये है। “

मैंने यह भी कहा कि मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं रहा हूँ, न ही मुझे इतिहास में कोई रुचि है, मैं अतीत के गौरव गान में समय व्यतीत करने का आग्रही नहीं हूं, पहले कौन क्या रहा,इन बातों को इतिहास की कब्रों में ही दफन रखा जाना हितकर है,हम आज क्या है,हमारा वर्तमान क्या है,आज के जलते सवाल क्या है,इस विषय पर चिंतन करने ,उन समस्याओं पर बात करने तथा उनका समाधान खोजने की दिशा में विचार विमर्श करने के लिए हम साथ बैठे हैं ।

हम 26 जनवरी 1950 को लागू हुये भारतीय संविधान की बुनियाद से हमारे राष्ट्र व समाज जीवन के निर्माण का स्वप्न देखते हुए संविधान के रास्ते पर चलने को संकल्प बद्ध होने का स्वप्न लिए इकट्ठा आये हैं, समता,स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के लोकतांत्रिक मूल्यों पर देश रचने को एकत्र आये हैं। तमाम मतभेदों व असहमतियों का आदर करते हुए हमने साथ बैठने व बात करने का टास्क चुना है और उसकी पहली सफलता के रूप में इसका गरिमामय आगाज हो चुका है ।

मैंने यह भी स्पष्ट किया कि- “इस मिलन के बाद भी घटनाएं-दुर्घटनाएं,आरोप प्रत्यारोप चलेंगे, अन्याय अत्याचार की खबरें भी आएगी,लेकिन हमें आपसी संघर्षों व असहमतियों के बावजूद भी सौहार्द्र व सद्भाव के मार्ग देखने होंगे,क्योंकि जिंदगी भर या पीढ़ियों तक हम नफरत करना जारी नहीं रख सकते है ,हम जानते हैं कि हमारे मध्य जाति, वर्ण,आरक्षण,अजा जजा अधिनियम ,भूमि विवाद,भेदभाव व ग्राम्य जीवन की विद्रूपताओं के बहुत सारे अनसुलझे बिंदु बने हुए हैं,जिनपर बातें होनी है ,आज बैठे हैं तो शिकवे भी होंगे,शिकायतें भी बयां होगी,पीड़ाएँ भी रखी जायेगी,समस्याओं पर भी विचार होगा,जब तक गुबार सामने नही आएगा,बात हो नहीं पाएगी,इसलिए खुलकर सब साथी आज बातें करेंगे ,ऐसी उम्मीद करता हूँ “

और वाकई फिर अगले कुछ घण्टों तक जमकर बातें हुई ,जयपुर संवाद ने सौहार्दपूर्ण माहौल में बंधुत्व की दिशा में एक बीज आज बोया है,उसके वटवृक्ष बनने की प्रतीक्षा करनी होगी ।

अगली कड़ी में जारी…….

भँवर मेघवंशी 

(संस्थापक -दलित,आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान)

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