दलित ,आदिवासी और क्षत्रिय सामाजिक सद्भावना संवाद !

सामाजिक सद्भावना संवाद की अगली कड़ी !

103

(जयपुर संवाद)

दलित,आदिवासी व क्षत्रिय समाज के मध्य हुये अपनी तरह के इस प्रथम “सामाजिक सद्भावना संवाद” के दौरान वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ सबके विशेष आग्रह पर इंडिपेंडेंट ऑब्जर्वर के नाते पूरे समय मौजूद रहे,सबको उन्होंने असीम धैर्यपूर्वक सुना और फिर जमकर सुनाया भी,जिसे सब सहभागियों ने सम्पूर्ण मन प्राण से सुना भी ।

इस संवाद में बीकानेर से सुरेंद्र सिंह शेखावत, गोटन के सरपंच नारायण सिंह राठौड़, न्यूज 18 नेटवर्क के राजस्थान हेड श्रीपाल शक्तावत, बहुजन चिंतक डॉ एम एल परिहार, पत्रकार महेश वर्मा, विस्थापित लोगों को अधिकार दिलाने के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले हिन्दू सिंह सोढ़ा, जन आंदोलनों के साथी कैलाश मीणा, मानवाधिकार कार्यकर्ता व वकील ताराचंद वर्मा, डगर के देबीलाल मेघवंशी, डाल चन्द रेगर, किशोर सिंह कानोड़, प्रेम सिंह बनवासा,आज़ाद सिंह,हरीश धनदेव, अर्जुन मोहनपुरिया, एडवोकेट भूपेंद्र आलोरिया,नारायण मेघवाल, महावीरसिंह ,राजेन्द्र सिंह भिंयाड, श्री क्षात्र पुरुषार्थ फाउंडेशन के संयोजक यशवर्धन सिंह ,लोकेंद्र सिंह राजावत तथा रेवन्त सिंह पाटोदा व पूर्व पत्रकार व राजनीतिक कार्यकर्ता श्रवण सिंह राठौड़ की गरिमामयी उपस्थिति ने इस संवाद को समृद्ध किया।

सबसे खास बात यह रही कि इस संवाद के दौरान पूरे समय क्षत्रिय युवक संघ के अंतरराष्ट्रीय प्रमुख भगवान सिंह जी रोलसाहबसर भी मौजूद रहे,उन्होंने हरेक संभागी की बात को गंभीरता से सुना और आध्यात्मिकता से लबरेज अपनी बात भी कही I

सामाजिक सद्भावना संवाद के बारे में सहभागियों की एकमत राय थी कि यह बहुत जरूरी पहल थी,जो बहुत देर से शुरू हो पाई है,आज़ादी 70 साल बाद इसकी शुरुआत हो पाई,फिर भी देर आयद,दुरुस्त आयद। इसलिए शुभस्य शीघ्रम कहते हुए स्वागत किया जाए इस बातचीत का ।

इस मौके पर देश के जाने माने बहुजन लेखक,चिंतक व प्रशासक ,प्रखर वक्ता डॉ एम एल परिहार ने अपने भोगे हुए यथार्थ का चित्रण किया,उन्होंने बताया कि वे पाली जिले के नाडोल कस्बे के नजदीक स्थित कर्णवा गांव से आते है,जहां उनकी पीढियां सामंतों के यहां बेगार करते जीवन जी और मर गयी,स्वयम उन्होंने तथा उनकी माँ और पिता ने जागीरदारों के यहां गोबर पाथने से लेकर मरे जानवरों खींचने जैसे काम किये,सिर्फ रोटी के बदले बेगारी की ,पर जब पढ़ने का मौका मिला ,तो पढ़ लिखकर एडिशनल डायरेक्टर पशुपालन विभाग के पद तक पहुंचे,राजस्थान के प्रथम गौसेवा निदेशक भी रहे।

डॉक्टर परिहार ने कहा कि जब उनकी शादी हुई तो दूल्हे के रूप में उनकी घुड़चढ़ी का गांव के सवर्ण समाज ने जमकर विरोध किया,भारी पुलिस जाप्ता मंगवाना पड़ा,क्योंकि एक दलित युवक का घोड़ी पर बैठना गांव के सवर्णों को गंवारा नहीं था,यह मानसिकता आज तक पश्चिमी राजस्थान में व्याप्त है,दलित दूल्हा दुल्हन को घोड़ी पर आज भी सवार नहीं होने दिया जा रहा है, इस परिस्थिति को बदलना होगा,जमाना बदल चुका है,दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंच चुकी है।

डॉ परिहार ने कहा कि हमारा क्षत्रिय समुदाय के साथ लम्बा विश्वास व काम काज का रिश्ता रहा है,पर आज यह रिश्ता द्वेषभाव में बदलता जा रहा है,जिसकी दोतरफा चिंता जरूरी है,उन्होंने क्षत्रिय समुदाय से अपील की कि वे भी देश के दलित आदिवासियों की भांति बुद्ध,साहूजी महाराज और रामदेवपीर के रास्ते पर चलें,संविधान को अपनाएं, वंचितों की तरक्की में सहभागी बनें ।

परिहार जी के मार्मिक उद्बोधन ने सबके दिल को छुआ, उनकी पीड़ा व शिकायतों के सकारात्मक भाव से ग्रहण किया गया तथा उनका इस बात के लिए आभार प्रकट किया गया कि उन्होंने इस संवाद में खरी खरी बातें कहकर बरसों से जमी बर्फ को पिघलाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

भँवर मेघवंशी 

(संस्थापक -दलित,आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान)

Leave A Reply

Your email address will not be published.