राजस्थानी साहित्य में दलित आहट

- बी एल पारस

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समानांतर साहित्य उत्सव [27-28-29 जनवरी 2018],यूथ हॉस्टल, जयपुर में विभिन्न कार्यक्रमों की श्रृंखला में अंतिम दिन विनोद स्वामी के संचालन में रामस्वरूप किसान, रामेसर गोदारा ग्रामीण, शिव बोधि, सतीश छिम्पा और बी.एल.पारस के साथ ‘राजस्थानी साहित्य में दलित आहट’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन हुआ । परिचर्चा की शुरुआत वरिष्ठ साहित्यकार और कथेसर संपादक रामस्वरूप किसान ने हाशिये पर छूटे लोगों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश और कथेसर के दलित साहित्य विशेषांक को एक ऐतिहासिक कार्य बताते हुए की। उन्होंने मुख्य धारा के साहित्यकारों के इस विशेषांक पर मौन धारण करने पर जहाँ चिंता प्रकट की,वहीं इस बात पर प्रसन्नता भी जताई कि पहली बार सामान्य पाठकों के इतने पत्र प्राप्त हुए कि कथेसर के आगामी अंक के लगभग 25 पृष्ठ प्रतिक्रियाओं से भर गये.

राजस्थानी तिमाही हथाई से जुङे रामेसर गोदारा ग्रामीण ने दलित शब्द को जातिय संदर्भ से न देखकर इसे व्यापक दृष्टिकोण से समझने की वकालत की । उन्होंने हथाई दलित विशेषांक की जानकारी देते हुए बताया कि हथाई राजस्थान की ही नही,संभवत: भारत की पहली पत्रिका है,जिसने एक ही अंक में लगभग दस नये रचनाकारों को छापने का साहसिक कदम उठाया.

परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए सतीश छिम्पा ने कहा कि राजस्थान जैसे सामन्ती राज्य में दलित साहित्य का स्थापित होना आवश्यक है और हम सबको मिलकर इसे उस स्तर पर ले जाना होगा, जहाँ ये मुख्य धारा के साहित्य के बराबर खङा हो जाये.युवा साहित्यकार बी.एल.पारस ने दलित को परिभाषित करते हुए बताया कि आर्थिक-राजनीतिक शोषण नही,सामाजिक भेदभाव व छूआछूत सहने वाला ही दलित है । लोक संत रामदेव सरीखे मध्यकालीन संतों से बात शुरु कर, आधुनिक राजस्थानी साहित्यकारों की कविता-कहानियों से लेकर किशन वर्मा के खण्ड काव्य ‘नेमीचंद’, उम्मेद धानिया के अकादमी पुरस्कृत कहानी संग्रह ‘लेबल’, उम्मेद गोठवाल के कविता संग्रह ‘पेपलो चमार’ और इनके पश्चात कथेसर और हथाई के दलित साहित्य विशेषांकों पर चर्चा करते हुए उन्होंने राजस्थानी साहित्य में दलित आहट को रेखांकित किया.

राजस्थानी में दलित साहित्य के लिए प्रतिबद्ध, कथेसर दलित साहित्य विशेषांक के संयोजक और हथाई पत्रिका के अतिथि संपादक शिव बोधि ने बाबा साहब आम्बेडकर, दादा साहब गायकवाङ, दलित पैंथर, कांशीराम काल पर संक्षिप्त चर्चा करते हुए मराठी, हिन्दी और फिर राजस्थानी साहित्य में दलित लेखन पर बेबाकी से अपनी बात रखी । ऐतिहासिक घटनाओं को वर्तमान से जोड़ते हुए उन्होंने दलितों-आदिवासियों के साथ हर क्षेत्र में होते आये भेदभाव की परतें उधेङी। साथ ही, वर्तमान राजस्थानी दलित कहानियों-कविताओं, विशेषकर आत्मकथांशों (बी.एल.पारस एवं ममता सम्बोधि) के लेखन को राजस्थानी दलित साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप बताया और इस हाशिये के साहित्य को मुख्य धारा में स्थापित करने तक इसी तरह के प्रयासों को जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की.अंत में, शिव बोधि द्वारा श्रोताओं के सवालों के तार्किक और तथ्यात्मक जवाबों के साथ इस परिचर्चा का समापन हुआ .

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