आम जन का मीडिया
dalit literature-rebellious-but not destructive

विद्रोही है ,पर विध्वंसक नहीं है दलित साहित्य-डॉ. एम.एल.परिहार

जयपुर 28 जनवरी। समानान्तर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन मुक्तिबोध मंच पर आयोजित सत्र में ‘‘हिन्दी साहित्य में दलित चेतना ’’ पर डॉ. एम.एल.परिहार, रत्न कुमार सांभरिया, राजाराम भादू, प्रेमचंद गांधी जैसे विद्वानों ने अपने विचार प्रकट किये। मंच संचालन भंवर मेघवंशी ने किया

शुरुआत में बहुजन लेखक डॉ. एम.एल.परिहार ने ‘‘हिन्दी साहित्य में दलित चेतना’’को स्पष्ट करते हुए कहा कि अब दलित साहित्य बहुत पढ़ा जा रहा है क्यांेकि यह केवल एक जाति को बढाने वाला साहित्य नही है बल्कि सामाजिक सरोकार, तर्क-वितर्क, मेहनतकश व वंचितों की पीड़ा को व्यक्त करने वाला साहित्य है। दलित साहित्य विद्रोही है लेकिन विध्वंसक नही है। यह न केवल पुस्तकालयों बल्कि सामाजिक कार्यक्रमों तक में पंहुच चुका है जो कि किसी काल्पनिक आस्था की पूजा के बजाय मनुष्य के यथार्थ अस्तित्व को स्वीकार करते हुए सामाजिक सृजनात्मकता को बढ़ाता है।

कथाकार रत्न कुमार सांभरिया ने चेतना व जाग्रति को बढावा देने वाले साहित्य को ही दलित साहित्य बताते हुए कहा कि दलितों की स्थिति आज भी सोचनीय है , जिसे मुख्यधारा में लाने के लिए गैर-दलितों को भी प्रयास करना होगा। आलोचक राजाराम भादू ने विभेद की प्रवृति को रोकने के लिए दलित साहित्य को बढावा देने की बात कहते हुए बताया कि अब दलित साहित्य केवल रोने-धोने का साहित्य नहीं है बल्कि जन भावना का साहित्य है। इसमें बहुजन की पीड़ा और विकास की कथा रेखांकित हो रही है। कवि प्रेमचंद गांधी ने मुल्कराज आनंद की पुस्तक ‘अनटचेबल’ का हवाला देते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में नागार्जुन, राहुल सांस्कृत्यायन, चतुरसेन, कमलेष्वर,निराला के साहित्य से लेकर आज तक दलित चेतना पर सतत् कार्य हो रहा है। अब दलित चेतना के विविध आयाम सामने आ रहे हैं। अंत में सत्र संचालक भंवर मेघवंशी ने सिद्ध, नाथ व भक्ति साहित्य का उदाहरण देते हुए दलितों को समाज की मुख्य धारा में जोडने का आह्वान करते हुए सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया .

गांवों में बसती है फिल्म की आत्मा !

समानान्तर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन मुक्तिबोध मंच पर आयोजित सत्र में ‘‘सिनेमा और भारतीय गाँव ’’पर फिल्मकार अविनाश दास,रामकुमार सिंह, गजेन्द्र श्रोत्रिय जैसे विद्वानों ने अपने विचार प्रकट किये। मंच संचालन कला एवं फिल्म समीक्षक अजित राय ने किया ।

शुरुआत में अनारकली ऑफ आरा फेम निर्देशक रामकुमार सिंह ने ‘‘ सिनेमा और भारतीय गंाव ’ को स्पष्ट करते हुए कहा कि गांवों से ही प्रतिभाएं निकलती हैं। ऐसी कोई भी फिल्म मुश्किल से बन पाती है जिसमें ग्रामीण परिदृष्य का चित्रण नहीं हो। दक्षिण भारतीय फिल्मों या तमिल सिनेमा मे ग्रामीण परिदृष्य, को ज्यों का त्यों पेश किया जाता है जिससे करेक्टर के साथ भावनाएं सुस्पष्ट व अधिक प्रभावी दिखाई देने लगती हैं। भविष्य में फिल्मकार गांवों पर आधारित फिल्में अधिक बनाते नजर आएगें। उन्होंने कहा-’’कहानीकार की कथा का वजूद गांव-गवई का हो मैं आज भी जब कहानी का प्लॉट देखता हूॅ या सोचता हॅू तब गांव सीधे मेरे जहन में आता है।

अविनाश दास ने कहा कि सिनेमा समाज को बदलता है। फिल्मकार गांवों में क्यों नही जाते? हमें गांवों के विकास की सोच के साथ सिनेमा को विकसित करना चाहिए। उन्होंने मात्र सवा दो लाख में बनी झांसी इलाके की एक फिल्म का जिक्र करते हुए कहा कि कहानी अच्छी होनी चाहिए तो कम बजट में भी अच्छी फिल्में बन सकती हैं। आज बेहतर टेक्नोलोजी का विस्तार हेा चुका है। आने वाला समय मल्टी प्लेक्स से निकलकर डिजीटल में प्रवेश कर रही है। स्क्रीनिंग का केनवास बड़ा हो रहा है।

कहानीकार चरण सिंह पथिक द्वारा लिखित फिल्म ’’कसाई’’ के निर्देशक गजेन्द्र श्रोत्रिय ने कहा कि गांवो के परिदृष्य पर फिल्म बनाना आज के जमाने में रिस्क तो है लेकिन हमें ऐसे खतरे दृढ संकल्प के साथ उठाने चाहिए। कथाकार चरण सिंह पथिक ने कहा कि आजकल ग्रामीण परिदृष्य की फिल्मों पर निर्माता-निर्देषक बजट खर्च करने से डरते हैं लेकिन अच्छी पटकथा हो तो वह फिल्म कम बजट में अच्छा मुनाफा दे सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि लगभग हर फिल्म में मौजूद ’’रामूकाका’’ जैसे पात्र गांव में ही मौजूद होते हैं। मंच संचालन कर रहे अजित राय ने भारतीय सिनेमा में गांव के चित्रण को अपरिहार्य मानते हुए इस दिशा में अधिक कार्य करने परबल देते हुए सभी का आभार व्यक्त किया।

(फारूक आफरीदी)

मीडिया प्रभारीसमानांतर साहित्य उत्सव

mob : 94143 35772/ 92143 35772

Leave A Reply

Your email address will not be published.