देश का पहला मतदाता नर्मदा किनारे, मणिबेली में !

क्या है मणिबेली का भूत और भविष्यकाल ?

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मेधा पाटकर  

नर्मदा किनारे बसा हुआ महाराष्ट्र का मणिबेली गांव, देश की मतदाता सूची में पहला गांव और मणिबेली का वलसंग बिज्या वसावे, दामजा गोमता का पोता, देश का इस लोकसभा चुनाव 2019 की सूची का पहला मतदाता। इस हकीकत को लेकर कुछ पत्रकारों ने, वहां पहुंचकर, कुछ मराठी, गुजराती, या अंग्रेजी में लिखी खबरों को पढकर लगा, हमारे सभी देशवासियों तक मणिबेली की पहचान और यादगार पहुंचना जरूरी है, वह भी तत्काल ।

                  मणिबेली महाराष्ट्र का, गुजरात सीमा पर बसा हुआ गांव ! मणिबेली का विस्तार पाँच फलियों का, करीबन 1000 हेक्टर्स का ! तड़वी और वसावा, दो आदिवासी जमात के करीबन 100 परिवार यहां रहते आये और जंगल, जमीन, नर्मदा और नाले या उपनदियों का पानी तथा मछली पर पीढियाँ जीती रही, उन सबकी। मणिबेली में एकेक पहाड़, और फलियों में बचाया जंगल इस बात का गवाह था कि वहां के आदिवासी न बिना कारण जंगल काटते थे, न ही बेचते। उतार वाली खेती के साथ नदी किनारे की प्याज,लसून, राई, मकाई, सब्जियाँ तक पकाने वाली जमीन उन्हें साल भर खिलाती थी, तो उन्हें कही स्थलांतरित मजदूर बनने, गांव छोड़कर जाना नहीं पड़ता था। उन्होने अपनी जरूरत पूर्ति गांव के संसाधनों से करते हुए, बाजार से करीबन पूरी दूरी बनाके रखी थी। अपनी छोटी सी एक पेड़ की लकड़ी की नाव में बैंठकर, नदी पार होकर, फिर कुछ 4/6 कि.मी. चलकर किसी गुजरात के बाजार में पहुंचना या फिर गांव के पीछे कट्टर समर्थक जैसा खड़ा पर्वत चढ़ उतरकर, दो राज्यों के बीच की देवनदी पार करते… 7/8 घंटे चलकर महाराष्ट्र के मोलगी गाँव के बाजार में पहुंचना असंभव नहीं था, लेकिन आसान भी नहीं। अपने आप में स्वयंपूर्ण या कम से कम स्वयं निर्भर था मणिबेली गांव। न बिजली, न सिंचाई; एक दुकान के अलावा न कोई व्यापार की निशानी। इसलिए मछली तक का व्यापार नहीं होता, लेकिन जंगल की जड़ी बूटी से लेकर हर प्राकृतिक संसाधन का उपयोग, सही अर्थ से निरंतरता के सिद्धांत पर करने वाले आदिवासीयों का यह गांव ‘ग्राम स्वराज्य’ का, बिना किसी दिखावे के, एक प्रतीक था।

                  वैसे महाराष्ट्र के सतपुड़ा की कोख में बसे कई सारे आदिवासी गांव, खास करके नर्मदा किनारे के, मणिबेली जैसे ही थे। हर गांव में, फलियावार भी एक या दो बुजुर्ग ‘कारभारी’ का कार्य करते याने कारभार चलाते थे। मणिबेली फिर भी कुछ अलग था, अन्य गांवों से। यहां का दामजा गोमता पूरे जंगल की जड़ीबूटी, जानने, छानने और हर बीमार व्यक्ति को देने वाला वैद्य था। भील आदिवासियों की देवेदानी में गाँवदेव, वाघदेव जैसा प्रकृति से जुडाव था | दामजा गोमता गाँव का पुजारी भी था | मणिबेली के तडवी समाज के पटेल की एक कठोरता थी तो भील वसावा समाज के तीन सगे भाई सिंगा, ढेब्र्या और गिंब्याभाई की शांती और समझदारी अनोखी थी। ढेब्र्या अपनी दो बीबीयों और कई बच्चों के साथ कभी जोर दिखाने वाले व्यक्ति रहते थे लेकिन उससे भी अधिक ताकतवर तीन भाई जालमा, जातरया जेरमा और उनका चचेरा भाई भुत्या मिलकर गांव के किसी भी मुद्दे पर पेश आते थे। नर्मदा किनारे पारंपरिक लकड़ी चक्र याने लकती के आधार पर पानी उठाकर, ठंडी में रबी की फसलों में सब्जी या राई भर-भरकर निकालने वाले पितामह तुल्य गिम्ब्याभाई और थोड़े या अधिक शराबी रहे तो भी नदी किनारे कड़ी मेहनत करने वाले केसुभाई तड़वी!  उन सभी के बच्चे, घर की बहने, एकाध जमाई मिलकर तड़वी-वसावा की एकता अभूत थी।

                  सरदार सरोवर बांध स्थल से निकलकर नर्मदा के दक्षिण किनारे, गुजरात के 3 गांव पार करके, 4 किमी पैदल चलकर हम मणिबेली पहुंचते थे। अकेले चलते,कभी संघर्ष गीत मनभर उभरता तो कभी रणनीति। मणिबेली का नाम जगप्रसिद्ध हुआ, तो सरदार सरोवर को चुनौती देने वाले संघर्ष से ! मणिबेली गांव सहित उस वक्त के धुले जिले के 9 गांवों में जा जाकर गांवस्तरीय समिति और फिर तहसील स्तर की समिति गठित होने के बाद, धुले में कभी तो मुंबई में एकाधबार, महाराष्ट्र के सरदार सरोवर प्रभावित 33 गावों के 33 प्रतिनिधियों का समूह मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव के समक्ष दो या तीन घंटों तक एकेक सवाल उठाता, बहस करता था। बांध स्थल के पास परियोजना की केवडिया कालोनी में, केन्द्र और चार बांध प्रभावित व लाभार्थी राज्यों के उच्च अधिकारियों के साथ चर्चा चली थी, मई 1988 में छः घंटों तक ! उसमें गुजरात के वाहिनी संगठन के कार्यकर्ता भी शामिल हुए थे और घाटी के कुल 300 प्रतिनिधी | चर्चा के बाद देर रात हम केन्द्र के समाज कल्याण सचिव एस.एस. वर्मा जी को सर्किट हाउस में मिलें तो उन्होने साफ कहां ‘‘इन राज्यों के पास तो पुनर्वास का नक्शा तक तैयार नहीं है। कहां है जमीन? प्लान ही नही, तो बांध कैसे?’’ हमने उनके हाथ पत्र रखकर चेतावनी दी कि हमारे सभी सवालों के जवाब और पुनर्वास की पूरी योजना सामने नहीं रखी तो 2 महिने बाद हम सरदार सरोवर बांध का विरोध करेंगे। मणिबेली की ओर से महिलाएँ भी शामिल रहती थी, और गुजराती व भिलारी  दोनो भाषाओं में सवालों की तीक्ष्णता, संगठन की प्रक्रिया, बैठके, प्रबोधन चलते बढती जाती थी। 18 अगस्त 1988 में कुल छः शहरों में, तीनो राज्यों में रैली निकालकर हमने सरदार सरोवर का विरोध जाहिर किया |

                  1985 से चलकर ‘नर्मदा धरणग्रस्त समिति’ ने महाराष्ट्र में जनशक्ति जुटायी । यह नाम भी तय किया गांव प्रतिनिधियों ने और शासन के हर स्तर पर हमने झलकाया। विश्व बैंक का प्रतिनिधी दल एक रोज मणिबेली पहुंचा तब हमारी बैठक काफी ऊंचाई पर वामीपाड़ा में चल रही थी। ‘बहुत सारे लोग नीचे बोट लेकर आये है… उनमें गोरे लोग, अधिकारी और पुलिस भी है’, यह सुनते ही मैं/सब लोगों के साथ दौड़ पड़ी। बहते पानी में दो फलियों को जोड़ने वाला बहता नाला पार करते, सुखदता के साथ चिंता भी मन में बहती रही, जब तक हम पहुँच ही गये। वहां गुजरात के अधिकारी गांववालों से विश्व बैंक के दल के सदस्यों से मुलाकात करवा रहे थे। कुछ देर तक उनके सवाल और अनुवाद सुनते मै हैरान रह गयी और मैने जब अंग्रेजी में सच्चाई बताना और सही अनुवाद करना शुरू किया तब बैंक के और गुजरात के अधिकारी भी कुछ दंग, कुछ दुखी दिखाई दिये। आखिर बैंक के साहूकार भी समझ गये कि विस्थापितों के पुनर्वास क्या उन्हें जानकारी देना और सहभागी करना भी न्यूनतम स्तर पर हैं। गुजरात शासन के दावे झूठे साबित करने का और महाराष्ट्र की मूक बधिरता का यह पहला मौका था शायद, लेकिन बाद में कई सारे मिले ।  मणिबेली से ही शुरूआत हुई जल सत्याग्रह की। बांध तो बनाते गयी सरकार और डूब चढती गई। जब अंदाजा आया कि 1990 के मानसून में अब मणिबेली की खेती ही क्या, घर भी डूब सकते हैं तो अप्रेल में ही हम निकल पडे, मणिबेली सहित महाराष्ट्र से कई सारे गावों के सैकड़ो लोग, रास्ते में धुले, ठाणे सहित कई पडाव पर घाटी में डूब के अत्याचार, अन्याय की बात उठाते, मुंबई पहुँचे| तो खबर आयी कि मणिबेली का रायण का पेड छाट दिया पुलिस ने। जिसके नीचे बैठक करते, रायण के पीले, मीठे फल उठा उठाकर खाते थे हम, हमारे अतिथी भी, उस पर प्यार करने वाले हम हादसा खा गये। इतने में पुलिसों से केसुभाई का मकान घेरा जाने और उनकी बेटी कुंता ने पुलिसों को घंटों तक रोकने की खबर आयी। केसुभाई का तोड़ा गया घर बाद में तो शासन से फिर से बंधवा लिया हमने! लेकिन उस वक्त हम देवरामभाई के साथ उपवास पर उतरे। उस लम्बे उपवास के बाद मुख्यमंत्री शरद पवार जी, संवादशील रहते, हेलिकाप्टर से मृणाल गोरेजी के साथ, बांध स्थल पर पहुंचे थे। और 300 कांग्रेस व राज्य शासनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कई सारे निर्णय, जैसे बिना पुनर्वास डूब न आने देने का, जाहीर हुए थे। उन निर्णयों पर अमल के लिए में भी लड़त जारी रही और है।

जल सत्याग्रह

मणिबेली हमारे सत्याग्रह का पहला स्थल रहा। उसके पहले दिसंबर-जनवरी 1990-1991 तक मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात से 5000 लोग निकलकर गुजरात की सीमा पर काली फीत से हाथ बांधकर सीमा पार करने वाले एक एक अहिंसक समूह पर लाठियाँ बरसी, गिरफ्तारियाँ हुई कार्यकर्ताओं की और आदिवासी, किसान-मजदूरों की | 21 दिन का उपवास हुआ था| बाबा आमटे जी भी 1 किमी दूर पर अपनी गाडी के साथ डटे थे| देश के कई सारे कार्यकर्त्ता, संगठन, माध्यमकर्ताओं की सहभागिता थी | विश्व बैंक से उसी दौरान पुनर्विचार आयोग गठित हो चुका था | लेकिन बांध पर कार्य जारी था | 1991 से हर वर्षाकाल में ‘डूबेगे पर हटेंगे नही’ के संकल्प के साथ वही डेरा रहा। देशभर के कई सारे नेता सर्वोदयी से वामपंथीयों तक वहां पहुंचते रहें। संवेदनशील पत्रकारों का समूह हर मुख्य कार्यक्रम में उपस्थित रहता था। शूलपाणेश्वर का मंदिर मणिबेली में चैत्र/जनवरी में हजारों यात्रिकों को खींच लाता। वे सब मंदिर के साथ, हमारे कार्यतीर्थ का, मंदिर के बाजू में ही गांव गांव के संसाधन- बांस की ताटी, साग की लकडी, गांव में ही बनाये कवेलू, आदि जुटाकर बनाये 3/4 कमरो के ‘सत्याग्रह स्थल’ का, दर्शन भी जरूरी लेने आते हमने उसका नाम रखा था, ‘नर्मदाई’ याने सुख देनेवाली। इतना सहज-सुंदर, सौम्य और अ-हिंसक नाम और शालीन, फिर भी शासन थरथर कापती थी वहां के संघर्ष से । गुजरात से आये भक्तगण भी गुजरात में हमारे खिलाफ फैलाये दहशतवाद से दूर हटते, जब वे प्रत्यक्ष में देखते, हमारी ‘जायदाद’ और जीवन क्या, कार्यप्रणाली भी। मणिबेली में पुलिसों का डेरा रहा 1993 में, जब गांव के 13 मकान डूबने के बाद हमने ‘समर्पित दल’ घोषित करके,परियोजना पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो जल समाधि लेने की खुली चेतावनी देकर हम भूमिगत हो गये थे । 17 जुलाई से हमें ढूढ न पाने वाली पुलिस ने मणिबेली के खेत-खेत ढूंढे कुछ बरबाद किये परिवारों को हैरान भी किया… आखिर पुनर्विचार के लिए केन्द्रीय उच्चाधिकार समिति देशभर के माध्यम से घोषित होने के बाद ही हमने हमारा निर्णय वापस लिया । देशभर के 700 पत्रकार उपस्थित थे ही, लेकिन घाटी के करीबन 800 लोग, जो निमाड़ से और अन्य संगठनों, स्थानों से पधारे थे, बडोदा की जेल में थे… और हमारी समाधि के बाद दूसरा दल भी अरुंधती धुरु जैसी कटिबद्ध कार्यकर्ता के साथ तैयार था। इस स्थिति में ‘जलसमाधि’’ से हादसा खाई गुजरात शासन ने एक ऐसा शासकीय आदेश घोषित किया था कि हम मणिबेली/केवडिया जाने वाले रास्ते पर न चल सकते, न वाहन में सफर कर सकते, न हि कुछ… न हि कुछ! बडोदा  में पुलिस ने ही पहुंचा दिया जब हमारी घोषणा स्वामी अग्निवेश जी और सैकडों की उपस्थिति में होने के बाद मुक्त होकर हम पहले पहुंचे थे, मणिबेली में ही !

                  मणिबेली सत्याग्रह की पहली वहली अत्याचार की घटना भी धक्कादायक थी। सत्याग्रह की झोपड़ी सी खड़ी करते, मात्र एक 11 लोगों की टुकड़ी वहां बैठने/रहने के लिए गांव में ही रैली निकालकर निकली तो जबरदस्त लाठी चार्ज, धुले के आज के युवा संपादक निखिल सूर्यवंशी, निमाड़ के बुजुर्ग किसान सीताराम भाई, मुंबई की पर्यावरणवादी मोना पत्राव आदि की संमिश्र सत्याग्रही दल पर होकर उनके नाक से खून तक बहाया गया था। लेकिन वही हर साल सत्याग्रह 1991 से 1993 तक चला… और वहां डूब आने पर सैकड़ो पुलिसों को घेरने की कार्यवाही के साथ चला। कभी बड़ा मशाल जुलूस, कभी कुछ… डूब से चुनौती लेने देने वाले इन कार्यक्रमों के चलते अमृतसर सुवर्णमंदिर जैसे, शूलपाणीश्वर मंदिर भी सैकड़ो पुलिसों का पड़ाव बना रहा। महाराष्ट्र के साथ निमाड़, मध्यप्रदेश के मैदानी किसान भाई बहन भी सारियां लगाकर सैकड़ो में सत्याग्रही बनकर रहते थे| चातुर्मास के चलते काशीमुनि जैसे संत भी आन्दोलन के सहयोगी बन जाते थे| उसी में पुलिसों से सेमल्दा गाँव की दो आदिवासी युवतियों से बेइज्जती की घटना का भी हमें पीछा करना पड़ा था……|  हम भूमिगत रहते हुए, महेश शर्मा जैसा कार्यकर्ता रोज सुबह आदिवासी बनकर पैदल चलकर पहुंचता था केवडिया और उस वक्त माध्यमों की भरमार आज जैसी न होते हुए भी सबदूर खबर पहुंचती थी। एक दिन कई मीटिंग्स हमारे साथ करके तैयार हो चुकी मणिबेली की महिलाओं ने – कविताबेन, जड़ीबेन,कागडीबाई, खात्रीडायी,… सभी ने मिलकर अहिंसक हल्लाबोल के द्वारा पुलिसों का सामान उनके समक्ष मंदिर से बाहर नीचे फेक कर उन्हें भगा दिया था। उस वक्त माणिबेली के40 पुरूष धुले या तलोदा जेल में थे… और गांव सफल संघर्ष की चोटी पर पंहुचा दिया था, महिलाओं ने ही।

                  और एक हकीकत घटी जब पुलिस दल को छोड़कर, शासनकर्ताओं ने गांव के विभिन्न हिस्सों में आग लगायी थी। उन्हें बस मणिबेली गांव खाली करवाना था। उस समय भी मणिबेली की ये महिलाएँ गांवभर सैरवैर होकर पुलिसों का सामना करती रही और आखिर पुलिसों की पीछे हाट हुई। वामीपाडा की भील महिलाएं और काफी संस्कृतायन की प्रक्रिया से निकले, हिंदु धर्म देवता मानने वाले तड़वी समाज की महिलाएँ मिलजुलकर यह अहिंसक युद्व चलाती हुई आज भी हमारी नजर में हैं। एक बार जीवनशाला के बच्चों ने भी कमाल की थी। महाराष्ट्र गुजरात की सीमा ‘देवनदी’ पार करके घुसते पुलिसों को रोकने के संग्राम में मुझे वही उपवास पर उतरना पड़ा था। ठंड की कड़ी रात में आगठी जलाकर मै नदी पात्र  के किनारे सोयी थी, उबड़खाबड़ जमीन पर, जबकि अंधेरी रात में नींद खुली तो देखा, अक्षरश: वानरसेना बनकर 20/50 बच्चें आए थे। उनके नन्हे नन्हे हाथों से पुलिसों ने बनाया मिटटी का रास्ता तोड़कर वे मिटटी के ढेकले उठा उठाकर पुलिस की गाड़ियां दूसरे दिन सुबह नही आये, इसलिए अपनी बालशक्ति लगाये थे। उस वक्त आज की तरह सेल्फी अन फोटो… व्हाटसअप के हथियार या माध्यम नही थे वरना आज पेश करते… यादगार जीवित रखते! आज माणिबेली तो गवाह है ही!

                 शासन पुलिसी दबाव दमन सब हथकंडे अपनाने के बाद एक दिन चुनीकाका वैध जी को माणिबेली में सैकड़ो पुलिसों को लेकर आयी| उनका कहना था, गाँव के 11 परिवारों ने हमें लिखकर दिया है कि वे परवेरा वसाहट (गुजरात) में स्थलांतरित होना चाहते है| हमें अंदाजा था ही| हमने निर्णय लिया, ‘लोग विरुद्ध लोग’  ऐसी स्थिति पैदा न करने देने का| हम उनके घरों के कवेलू, हमारे दिल के टुकड़े जैसे उतारते देखते रहे| गांववासियों में कुछ मदद की भी, पर मनमुटाव और दर्द के साथ| रमण दला, जो कि कुछ समय तक माणिबेली के, सत्याग्रही युवाओं को प्रोढ़ शिक्षा देते थे क्योंकि कुछ थोड़े (3/4 थी तक) पढ़े हुए वे ही एक थे| उनका भी हट जाना दर्दनाक था| पर हमने सहन किया|पुलिसों की गाड़ियाँ रोकने का कुछ छोटा सा प्रयास भी करना हुआ तो मेरे साथ हमारी साथी नंदिनी को भी खदेड़ने का पुलिस गाड़ी में डालकर देय हटाने का काम पुलिसों ने किया ही! माणिबेली के उन 11 परिवारों के बाद एक भी परिवार, बिना वैकल्पिक जमीन और पुनर्वास के आज तक नहीं हटा| उस वक्त पुलिस बल पर उठे वे परिवार भी बाद में गुजरात बसाहटो की समस्याएँ लेकर आज तक हमारे साथ ही जुड़े है…….. महाराष्ट्र शासन को बारबार दस्तक देकर, गुजरात से हक़ दिलाने के लिए हम मजबूर करते रहे है|

                  मणिबेली की 1993 की पहली बड़ी डूब और उसका लोगों ने किया सामना उस गांव की अपूर्व ताकत का दर्शन था। 22 दिन की नन्ही बच्ची को लेकर हिरूबेन,सरपंच रहे नारायण भाई की पत्नी और सभी घर घर के परिवारजन, घर, मवेशी भी डूबते हुए, और पानी चढते हुए भी बैठे रहे। मणिलाल काका-जडीबेन की भैसे डूब चुकी… उनके बच्चों जैसी थी जो। नारायण भाई की एकमात्र दुकान, मॅचबॉक्स तक न उठाते, डूब गयी। पूरा तड़वी पाडा डूबा तो 13 परिवारों के बूढे, बच्चे, बहने सभी हो गये बेघर। इस स्थिति में सभी तड़वी परिवारों को सहारा दिया, भील-वसावा परिवारों ने। कुछ दिनों तक, उनके घर खड़े होने तक खाना खिलाया, सुलाया भी। यह जातिवाद और वर्ग भेद तोड़ने का मौका आंदोलन के लिए बड़ा था। उसका सम्मान भरपूर किया हम सबने, समर्थकों ने, पत्रकारों ने भी। लेकिन मणिबेली के संसू नुरया याने ढोरचार से शुरू होकर हमारी मांगों में भी ‘पुनर्वास गैरबराबरी कम करने की नीति में ताकत हो’, यह बात सम्मिलित हुई थी। मणिबेली में भूमीहीन यही एक परिवार था। हर गांव में ऐसे दो/चार ढोरचार थे| गाव के ढोर चराने के बदले उन्हें घर घर से रोटी मिलती थी। घर के इर्दगिर्द में कुछ गुंठा(आर) जमीन पर बीज बोते थे, वही उनकी खेती! ‘ढोरचार को पहले जमीन दो फिर हमारी बात करो’ इस नारे के साथ मुद्दा जोर पकड़ा और आखिर हर भूमीहीन को भी 1 हेक्टर देना महाराष्ट्र शासन से मंजूर करवाया। बल्कि मध्य प्रदेश शासन ने नही दी जमीन भूमीहीनों को फिर भी मच्छीमारो को सहकारी समितियों द्वारा मत्स्य व्यवसाय का, कुम्हारों को जमीन का, नाविकों को घाट पर पटटे का और मजदूरों को विशेष अनुदान का हक भी हमने 2017 में संघर्ष से ही पाया।

 

दुनिया के मंच पर मणिबेली

                  मणिबेली में 1991/92 में, आंतरराष्ट्रीय स्तर की, विश्वबैंक से नियुक्त मोर्स समिति का पधारना एक विशेष घटना थी। यूएनडीपी जैसी वैश्विक संस्था के उपाध्यक्ष रहे ब्रॅडफोर्ड मोर्स इसके अध्यक्ष तो कॅनडा के न्यायाधीश थॉमस बर्जर उपाध्यक्ष। समिति के अन्य सदस्य थे, ब्रिटन के अंथ्रपोलोजिस्ट हयू ब्रांडी और अमरीका के पर्यावरणविद गॅम्बलर। समिति का पहला दौरा था, मणिबेली में। वृध्दत्व में भी अपना गांधीवाद और हमारे जैसे कार्य और कार्यकर्ताओं के लिए साधुवाद सुरक्षित रखने वाले सिध्दराज जी ढढढ़ा,हमारी वर्षो की जनसहयोगी साथी परवीन बहन, मेरी मा इन्दूताई और कई कई साथी समर्थक, बरसात में बसें बंद रहने से या गुजरात शासन से रोकी जाने से, करीबन 10 किमी चलकर नदी किनारे पहुंचे थे। बोट से पार करके वे मणिबेली में शामिल हुए थे, लोगों के सवाल जवाब मोर्स समिति को और सारे सहयोगीयों को हमारी संगठन और प्रबोधन की ताकत का एहसास निश्चित ही देकर गये थे। मोर्स समिति की रिपोर्ट(1993) तो एक दुनिया के विकास मॉडल और गुजरात मॉडल पर कडी समीक्षा और विश्व बैंक पर भी सटीक टिप्पणी है। बडे बांधों की पोलखोल भी। उससे विश्व बैंक ने सरदार सरोवर को एक प्रकार से विनाशकारी और अनायोजित घोषित करते हुए अपनी आर्थिक सहायता आधे पर रोक दी। मणिबेली नहीं भूल सकते थे जाने माने विषेशज्ञ भी।

              मणिबेली के और नर्मदा घाटी के इस संघर्ष की खबर और चर्चा दुनिया में नहीं होती तो ही नवल ! 1998 में विश्व बैंक की 50 साल पूर्ति के मौके पर उनकी साहूकारी से देश देश में हुई घुस पैठ, विस्थापन, विनाश, कानून-नीति में बदलाव आदि मुद्दों को लेकर चेतावनी कार्यक्रम हुआ था मेड्रिड, स्पेन में | दुनिया के 2000 संगठनो ने मिलकर जो मेमोरेंडम – आवेदन जाहीर किया था, मानो एक संकल्प पत्र, उसका नाम था, मणिबेली डिक्लेरेशन याने घोषणा !

इसी का आधार लेकर मनमोहन सिंह जी “ हमारे देश के चंद लोग विश्व बैंक का विरोध कर रहे है…., लेकिन हम साथ है बैंक के…….” यह बयान दुनिया के हजारों के प्रदर्शन के जवाब में दे रहे थे | तो माणिबेली घोषणा पत्र हाथ में लेकर मुझे अवकाश मिला था, बाहर इकट्ठे हुए दुनिया भर की सशक्त जनशक्ति को संबोधित करने का | यह भी मणिबेली का सम्मान था | देश के नागरिकों को क्या, माणिबेली के गाँववासी आदिवासियों को भी उससे अधिक मोल है, अपनी धरती और आसमान का !

                       वास्तव, वह भी महाकाय परियोजना का कानूनी और मैदानी लड़त का, शासनकर्ताओं के झूठे दावों की चुनौती का इतना जटिल की आदिवासीयों की एकता,समरसता, जीवरता और हिम्मत आंदोलनकारी मार्ग और मार्गदर्शकों पर अटूट विश्वास आदि सबके बावजूद मंजिल नहीं हासिल होती है, आसानी से। मणिबेली तो शासनकर्ताओं ने आधी डूबाकर छोडी है| बसाये हुए परिवारो को कई जगह बिखेरकर छोडा है। जैसे गुजरात के वडगाम और गधेर गाँव को भी! और तो और, मणिबेली के वलसंग को मतदाता के रूप में ही नहीं मतदान की राजनीति में याद करते हुए कहां जाता है, महाराष्ट्र में डूब गया तो गुजरात की सेवाओं का सहारा मिला। वाह रे वा। गुजरात में, गुजराज की हठधर्मिता और कच्छ सौराष्ट्र के सूखे की प्राथमिकता का आधार दिखाकर वड़संग का उसके पिता का दादा दादी का घर डूबाया, खेत डूबोया, गांव जंगल का विनाश लाया। इस पर कुछ नही सौचेगे माध्यमकर्ता? और तो और जो नई पीढी उभरी है मणिबेली से और पुरानी भी आज तक जिद लेकर, डटकर हक मांग रही है, उन्हें नहीं देखेगे आम नागरिक? राजनेताओं में नरेन्द्र मोदी सरकार ने जबरन सरदार सरोवर के गेटस बंद किये, मात्र नर्मदा में बाढ की डूब न आने से कुछ बची है घाटी नहि तो लुप्त हो जाती। मणिबेली जिंदा है तो भविष्य भी क्षितिज पर है ही।

जीवनशाला से निर्माण

मणिबेली का यह लम्बा संघर्ष का दौर रहा, वैसे ही जीवन शाला के रूप में निर्माण का भी। चिमलखेड़ी में शुरू हुई पहली जीवनशाला, वहाँ डूब आयी तब बच्चों ने छत पर चढकर, पुलिसों ने उन्हे खदेड़कर, गिरफ्तारी में लेकर भी बरबाद हुई… तब संघर्ष का एक और कारण बनी। बच्चों ने पुलिसों की ही बार्ज पर चढकर, केवडिया तक और वहां से नंदुरबार जिले के अक्कलकुआ तहसील तक दरमजल करते हुए, तहसीलदार कचहरी पर ही पूरे दो महिने शाला चलायी। आखिर शासन को झुकाया और मणिबेली में शाला बनवाकर ली। लेकिन मणिबेली की शाला फिर डूबी… गांव ने फिर खड़े किये कुछ कमरे| बच्चों ने शिक्षकों ने बहुत कुछ सहने के बाद फिर शासन ने बांध दी पत्रे की शाला, जिसे देखकर आज भी हैरान होते हैं कलेक्टर भी… पर कुछ बच्चे, युवा पेंटर्स ने सजायी यह शाला आज भी न केवल 100 से अधिक बच्चों की शिक्षा का, बल्कि इससे 25 सालों में निकल चुके पहली शिक्षित पीढी के सैकडो बच्चों के शिक्षा और विकास का केन्द्र बनी हुई है। इस शाला की पहली बॅच का विधार्थी संघर्ष में शामिल और आज सहकारी समितियों का मत्स्य व्यवसाय कारोबार सम्हालने वाला सियाराम पाडवी कार्यरत है। दिनेश दामण और नरपत वलसंग वसावे मणिबेली का केज कल्चर का मत्स्य व्यवसाय सम्हल रहे है। आंदोलन के द्वारा पाया यह हक उनकी जमीने डूबने पर नवरोजगार का साधन है।

आज भी जारी है लड़ाई और चुनौती भी !

 वलसंग बिज्या के परिवार का सबसे बुजुर्ग याने आदिवासी भाषा में ‘डाया’ व्यक्ति दामजा गोमता वसावे। पूरे बाल चांदी जैसे चमकते हुए दामजाभाई शांति से पेश आने वालों में से एक थे। फिर भी मीटिंग में उनका प्रभाव था जरूर। उनकी बडवा या वैदू की भूमिका भी थी इसका आधार। बिज्या दामजा उनका बड़ा बेटा, वह भी बुढापे की तरफ झुका हुआ। बिज्याभाई की पत्नी खात्री बाई सतत संघर्ष के लिए तैयार। गुजरात के नसवाडी में हमने निकाली थी आदिवासी महिला रैली| गुजरात के नर्मदा किनारे के अंत्रास गांव की,अवैध वृक्षकटाई रोकने वाली महिला बुधीबेन पर पुलिसों से किये गये बलात्कार के खिलाफ। उसी में पत्थर फेक होकर खात्रीबाई बेसुध हुई थी। फिर भी बिज्या का परिवार और वलसंग ने भी, आन्दोलन पर कभी कोई सवाल नही उठाया। छोटा भाई नरपत जीवनशाला से निकला और वलसंग खेती, मछली दोनो में लगा रहा है आज तक। बिज्याभाई याने पिता की पात्रता पर 5 एकड़ जमीन मिली लेकिन वलसंग को अभी भी 31/2 ऐकड़ आवंटित हुई तो डेढ़ एकड़ देना अभी भी बाकी है। नरपत तो आज शादीशुदा होकर भी, कम उम्र के कारन से अघोषित है और रहेगा| उसे बचे हुए गाँव में डटकर खेती, मछली, जंगल पर जीना होगा|

                  मणिबेली के लोगो में गुजरात जाने वालों को सताती हैं गुजरात शासन की दादागिरी आज भी। मालू पुनर्वसाहट में जमीन स्वीकारने वाले कुछ 10 परिवारों को सीमांकन करके कब्जा देते देते कुछ साल चले गये। महाराष्ट्र के जिलाधिकारी भी हमारी तरफ से पूरी जानकारी पाने के बाद गुजरात में बसाये जाने वाले मणिबेली के लोगो की और अन्य वसाहटों की समस्याएँ उठाये| बैठके हुई पर गुजराती अधिकारी विस्थापितों से चर्चा या सुनवाई के भी खिलाफ। गुजरात से महाराष्ट्र के विस्थापितों की अनदेखी ही नही,राज्य शासन की भी अवमानना और पुनर्वास के लिए उन्होंने ही अर्थसहाय देना बंधनकारक होकर भी न देने की हिम्मत कहां से आती है? केन्द्र शासन और गुजरात, महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश में भी एक ही पार्टी, भाजपा सत्ता में आने से कई गुना बढी है ।

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