कुसुमार्चन’ पर परिसंवाद सम्पन्न !

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– फारूक आफरीदी

जयपुर : शब्द संसार और डॉ राधाकृष्ण राज्य पुस्तकालय के तत्वावधान में सोमवार को यहाँ मूर्धन्य साहित्यकार डॉ नरेन्द्र शर्मा कुसुम पर केन्द्रित ग्रन्थ ‘कुसुमार्चन’ पर परिसंवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध भाषाविद देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने की। मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति विनोद शंकर दवे, विशिष्ट अतिथि प्रसिद्द शायरऔर गीतकार लोकेश कुमार सिंह साहिल थे। कार्यक्रम का संयोजन शब्द संसार के अध्यक्ष श्रीकृष्ण शर्मा ने किया।

मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति विनोद शंकर दवे ने कहा कि संसार में उत्कृष्ट साहित्य सदैव कालजयी रहता है चाहे वह किसी भी देश या भाषा में रचा गया हो। हमें ऐसे साहित्य को अनुवाद के जरिए भी पढ़ना चाहिए। उन्होंने ‘कुसुमार्चन’ का जिक्र करते हुए कहा कि इसके माध्यम से डॉ नरेन्द्र शर्मा कुसुम के विराट व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी मिलती है। उन्होंने डॉ शर्मा द्वारा संसार के प्रसिद्ध विदेशी कवियों की रचनाओं के अनुवाद की सराहना करते हुए कहा कि इस दिशा में निरंतर काम करने की जरुरत है ताकि हमारा समाज उससे लाभान्वित हो। उन्होंने डॉ शर्मा को बधाई देते हुए कहा कि इन्होने साहित्य की लगभग हर विधा में सृजन कर समाज को बहुत समृद्ध किया है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्द भाषाविद देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने कहा कि डॉ कुसुम किसी खेमे से नहीं बंधे और वे अजातशत्रु साहित्यकार हैं। उन्होंने तीन भाषाओँ में समान रूप से सृजन और समीक्षात्मक लेखन किया। उन्होंने इनके पद्य लेखन को रेखांकित करते हुए कहा कि पद्य की कविता लोक कंठों में समां जाती है और दीर्घजीवी होती है ।

कार्यक्रम के संयोजक श्रीकृष्ण शर्मा ने ‘कुसुमार्चन’ ग्रन्थ के महत्व की चर्चा करते हुए कहा कि आज हमारा युवा अपने आपको दिग्भ्रमित महसूस कर रहा है और उसे सही की तलाश है ताकि वह अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर सके। अच्छा साहित्य ही उसका सही मार्गदर्शक हो सकता है । अच्छा साहित्य वही हो सकता है जो समाज को दिशा दे और राष्ट्र के निर्माण में सहायक सिद्ध हो।इसके लिए जरुरी है कि व्यक्ति खूब पढता हो, परामर्श दे सके और अच्छा लिखने वाला हो। समाज कल्याण, परिवार कल्याण, संविधान की रक्षा करने वाला हो जिसका चिंतन सामाजिक और आध्यात्मिक हो। ये सभी गुण डॉ शर्मा में विद्यमान हैं जिन्होंने जीवन भर युवाओं का मार्ग प्रशस्त किया। सौभाग्य से डॉ कृष्णा रावत के कोशल संपादन में उनके व्यक्तिव और कृतित्व को ‘कुसुमार्चन’ ग्रब्थ के रूप में सामने लाने का प्रयास किया है । इस ग्रन्थ में डॉ शर्मा पर 70 विद्वानों के विचार समाहित किए गए हैं। कार्यक्रम का शुभारम्भ गीतकार लोकेशकुमार सिंह साहिल की सरस्वती वंदना से हुआ।

प्रमुख वक्ता डॉ अमला बत्रा ने कहा कि कलम का काम सिर्फ शब्द उकेरना ही नहीं होता बल्कि शब्द शक्ति की पहचान और उसकी अनुभूति कराना भी है। यह कामवही कर सकता है जिसका मौलिक चिं तन हो और ज्ञान में रमता हो। जिसके भीतर जीवन को भीतर से समझने का दृष्टिकोण हो । कहा जा सकता है की डॉ नरेंद्र शर्मा कुसुम ने एक शिक्षक और साहित्यकार के नाते अपनी आन्तरिक शक्ति और सामर्थ्य से से कई लोगों के जीवन को निखारा है।

राजस्थान लेखिका संस्थान की अध्यक्ष और अनुकृति की संपादक डॉ जयश्री शर्मा ने कहा कि डॉ शर्मा ने संस्कृत, अंग्रेजी और हिन्दी के अध्येता के नाते साहित्य की जो सेवा की है वह अतुलनीय है। उन्होंने संस्कारशील साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से समाज में संस्कारों का निरूपण किया है।इनमें सुमधुर काव्यपाठकी अद्भुत क्षमता है। आपने हिन्दी अंग्रेजी की अपनी 21 कृतियों से सरस्वती के भंडार को समृद्ध किया है । एक ओजस्वी वक्ता, प्रखर कवि और श्रेष्ठ आलोचक के रूप में आपकी सेवाओं ने चिंतन को नई दिशा दी है।आपने युवा पीढ़ी को वैज्ञानिक सोच और कौशल से व्यवहार में प्रामाणिकता पर बल देते हुए भौतिक और आध्यात्मिक दोनों की और ध्यान देकर जीवन में आगे बढ़ने का सन्देश दिया है। इसव के बहुचर्चित कवियों के काव्यानुवाद का दुरूह और कठिन कार्य कर हिन्दी साहित्य की निधि को संपन्न किया है।

वरिष्ठ शायर और गीतकार लोकेशकुमार सिंह साहिल ने कहा कि हमें यह याद रखना चाहिए कि साहित्य में रचना को वक्त की छलनी अपनी तरह से छानती है। आज हम मूर्ति भंजक दौर में जी रहे है जिसमें जीवित और दिवंगतों की मूर्तियाँ टूट रही हैं। गाँधी और नेहरु तक को डेमेज किया जा रहा है। हम अपने संस्कार भूलते जा रहे हैं। गाँधी महामानव थे और नेहरू अगर राजनीती में न होते तो नोबेल लेखक होते। साहित्य में सनद की कीमत होनी चाहिए। क्रिएशन और क्रिटिसिज्म अलग अलग चीजें हैं। डॉ कुसुम के साहित्यिक अवदान की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इनके व्यक्तित्व की कई छवियां हैं और इनका व्यापक ‘शागिर्द कुल’ है जो इनके प्रामाणिक लेखन का परिणाम है। इनकी रचनाएं समय और काल की परिधि को लांघ कर इन्हें पहचान दिलाती रहेंगी।उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अतुकांत कविता का दौर है किन्तु अंततः छन्द बद्ध कविता ही जीवित रहेगी। डॉ कुसुम छन्द गीत के आदमी हैं। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ मथुरेश नंदन ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अंत में डॉ नरेंद्र शर्मा कुसुम ने अपनी एक कविता के साथ सभी विद्वानों और अतिथितियों का ह्रदय से आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर डॉ अमला बत्रा, पंचशील जैन, डॉ सुषमा शर्मा,डॉ मथुरेश नंदन कुलश्रेष्ठ, डॉ कृष्णा रावत, बाबूलाल खांडा,फारूक आफरीदी, अरुणकुमार ओझा, हर्ष, जयश्री शर्मा,वीना चौहान, रेनू शर्मा शब्द मुखर, करुणा श्रीवास्तव,वीरबाला भावसार,नवल पांडे,सत्यनारायण व्यास, कृष्णवीर द्रोण, महेन्द्र जैन, अशोक राही,माधुरी शास्त्री, आर. के. शर्मा आदि बड़ी संख्या में साहित्यकार, रंगकर्मी एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।

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