समकालीन साहित्य में बहुजन चेतना पर सार्थक सत्र का आयोजन

समकालीन साहित्य में बहुजन चेतना के स्तर पर नई अवधारणा विकसितः डॉ. भादू

611

जयपुर 16 दिसम्बर। बहुजन साहित्य महोत्सव के पहले दिन उद्घाटन के बाद ‘समकालीन साहित्य में बहुजन चेतना’ विषय पर एक सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र में सुप्रसिद्व आलोचक एवं विचारक डॉ. राजाराम भादू ने कहा कि यह महोत्सव एक युगान्तरकारी घटना है जिसमें बहुजन समाज के प्रति प्रतिबद्धता दर्शायी गई है। इसकी शुरूआत राजस्थान से हुई जो अपने आप में महत्वपूर्ण है। समकालीन साहित्य में बहुजन चेतना के स्तर पर नई अवधारणा विकसित हो रही है। उन्होंने कहा कि जो भी संघर्ष का साहित्य है वह बहुजन के तबके का साहित्य है और वह अपने आप में लोकतांत्रिक है जो मूल्यों को लेकर चलता है। उन्होने कहा कि भारत में बहुजन चेतना नई चीज नहीं है। अब तक पीडा का या वंचना का जो इतिहास लिखा गया उसकी उन्नत अवस्था पर हमारा ध्यान नहीं गया।

डॉ. भादू ने कहा कि बुद्ध और महावीर ने हमें चेतना के विचार दिये। वे दार्शनिक धाराएॅं हैं। आज से 10 साल पहले तक ज्ञान और संसाधनों पर खास तबकों का कब्जा रहा है। आमजन त्रासदी झेलता रहा है। कबीर रविदास मीरा बाई का इतिहास विद्रोह से भरा हुआ है। उनकी बिखरी हुई रचनाएं हमारी बहुजन चेतना का निर्माण करती है। उन्होेंनेे कहा है कि आजादी के आंदोलन का नेतृत्व भले ही महात्मा गांधी ने किया हो लेकिन उसमें बहुजन जातियां शामिल रही हैैं और उसी से स्वाधीनता संभव हुई। देश में कई जगह आदिवासी आंदोलन, जलियॉवाला काँड बिजौलिया, किसान आंदोलन बहुजन की अस्मिता के आंदोलन रहे हैं। आज बहुजन सबसे ज्यादा खराब स्थिति में जी रहे हैं। समाज को आपस में बाटने वाली शक्तियॉ कैसे जहर फैला रही है और राजनीति कर रही है यह किसी से छुपा नही है। उन्होंने राजसमंद में हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि हमें शत्रु की पहचान करनी है। हम सब एक हैं और पीडित के साथ हैं। उन्होेंने कहा कि दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श और स्त्री विमर्श से बहुजन साहित्य समृद्व हुआ है और इस लेखन को कमतर करके नहीं आंका जा सकता। हम आगे बढे हैं किन्तु हम इसे एक बडे केनवास पर लाएं और बहुजन आंदोलन के साथ खडे होकर अभिव्यक्ति दें तो ये और मजबूत होगा।

प्रोफेसर एस. के .मीना ने आदिवासी विमर्श की चर्चा करते हुए कहा कि 1970 से 1980 के आस-पास भारतीय साहित्य मेें दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श हुआ जिसमें जो देखा गया, भोगा गया या सहा गया उस साहित्य को लिखा गया मेरे विचार से इसमें नकारात्मक पक्ष की चर्चा होती रही जबकि हमें सकारात्मक पक्ष को उजागर करने की आवश्यकता है। हमें आत्मप्रवंचना से बचना होगा। आदिवासी साहित्य की इस कारण आलोचना भी हुई किन्तु उसके बाद जो उपन्यास, कहानी और कविता लिखी गई उसमें इन चीजों से बचा गया है। राजस्थान और झारखण्ड में साहित्यकारों ने आदिवासियों की अस्मिता से जुडे सवाल और जल, जंगल एवं जमीन के सवालों को मुखरता से उठाया। उन्होंने कहा कि साहित्य में राजनीति होने से साहित्य को बांट दिया गया है। अगर वंचित वर्ग के समस्त साहित्य को शामिल कर लिया जाये तो बहुजन साहित्य समृद्व होगा। उन्होंने कहा कि बहुजन के लिए लिखा गया साहित्य मनोरंजन के लिए नहीं हो सकता और जिसमें उत्सव की आवाजें होगी वह साहित्य नहीं हो सकता।

गुजराती दलित साहित्य अकादमी के महासचिव हरीश मंगलम ने कहा कि बहुजन लोक व्यापी है और वह एकंागी नहीं है। बहुजन साहित्य दिमाग को सोचने की शक्ति देता है। जाति या उपजाति इसका उद्देश्य नहीं है बल्कि यह आंदोलन का प्रतीक है। ऊंच नीच, अमानवीयता आदि एक प्रवृति है। साहित्य तो लोगों को प्रबुद्ध करता है। वह अपमान के विरूद्व लडाई लडने की शक्ति देता है। उन्होंने कहा कि गौतम बुद्ध ने वर्ण व्यवस्था का विरोध किया और चेतना जगाई। इससे दलित साहित्य में इनका प्रतिकार हुआ है। अगर प्रतिकार, विद्रोह और प्रतिरोध नहीं है तो वह बहुजन साहित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि दलित साहित्य उन लोगों को कभी स्वीकार नहीं होगा जो ललित साहित्य लिखते हैं। सच तो यही है कि बहुजन साहित्य ही मुख्य धारा का साहित्य है। बहुजन साहित्यकार ललित साहित्य से गुमराह ना हांे। दलित साहित्य को गुमराह करने की सोची समझी रणनीति से बहुजन साहित्य को सचेत रहना होगा।

गुजराती दलित साहित्य अकादमी के अध्यक्ष प्रवीण गढवी ने सदभाव और सौहार्द की उभरती नई चुनौतियॉ विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। वरिष्ठ कभी कैलाश मनहर ने बहुजन समाज की सामाजिक अवस्था में आये परिवर्तनों का जिक्र करते हुए कहा कि बहुजनों को अपने ब्राहा्रणीकरण से बचना होगा। युवा कवि प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि बहुजन समाज को जातिगत संगठनों की बजाय बडे सामाजिक और वैचारिक संगठन बनाकर अम्बेडकर से लेकर गांधी और मार्कस को साथ लेकर आगे बढना पडेगा। जाति संगठन हमेशा पीछे ले जाते हैं। हमें सभी वंचित वर्गो को एक साथ मिलकर अपने अधिकारोें की लडाई लडनी होगी। कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्त्ता भवर मेघवंशी ने किया।

सफाई, कर्मियों की वर्तमान स्थिति, एवं ,घूमन्तु-विमुक्त जातियों के मानवाधिकार और आर्थिक तथा सामाजिक सरोकार, विषय पर दो सत्र आयोजित हुये,पहले दिन दूसरा सत्र ‘सफाई कर्मियों की वर्तमान स्थिति’ एवं ‘घूमन्तु-विमुक्त जातियों के मानवाधिकार और आर्थिक तथा सामाजिक सरोकार’ विषय पर केन्द्रित रहा। इसमें राजस्थान सफाई कर्मचारी आयोग के चैयरमैन गोपाल पचेरवाल, मानवाधिकार आयोग के सदस्य आर.के. आकोदिया, घुमन्तू एवं विमुक्त जातिया आयोग के पूर्व चैयरमैन गोपाल केसावत, विधि विशेषज्ञ एन.एल.गुर्जर, मुम्बई विद्यापीठ के रतिलाल रोहित ने भागीदारी निभाई। कार्यक्रम का संचालन नवीन नारायण ने किया।

(इंजी.राजकुमार मल्हौत्रा)
मुख्य संयोजक

Leave A Reply

Your email address will not be published.