स्वच्छ भारत की असली कीमत !

-धम्म दर्शन निगम और शीवा दुबे

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सरकारी और गैर सरकारी संस्थायें अपनी जातिवादी और सामंती मानसिकता के कारण सफाई कर्मचारियों को मैनहोल और सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए लगातार सुरक्षा उपकरण से वंचित रख रहीं हैं और जानबूझकर गरीब और उपेक्षित सफाई कर्मचारियों को ज़हरीली गैसों के गहरे गड्ढों में मरने के लिए धकेल रहीं हैं| यह संस्थाएं “निचली जाति” के सफाई कर्मचारियों के जीवन की कोई कीमत नहीं आंकती.यह संस्थाएं सफाई के काम को इस लायक भी नहीं समझतीं कि इसके सुरक्षित और मशीनीकरण के लिए कुछ सौ रूपये खर्च किये जाएँ और सफाई कर्मचारियों की जान बचाई जाए.

ये मौतें, लापरवाही के चलते मौतें नहीं कहलायी जा सकतीं| ये सफाई कर्मचारी खौफ़नाक रूप से मारे जा रहें हैं.ये दिन-दहाड़े हत्त्यायें हैं.इस महीनें पिछले सिर्फ 14 दिनों में 9 सफाई कर्मचारियों की सेप्टिक टैंक और मैनहोल में हत्या हो चुकी है.पहली घटना लुधियाना[ http://indianexpress.com/article/cities/ludhiana/two-die-cleaning-sewer-line-three-serious-in-ludhiana-4976124/ ] में 9 दिसम्बर को हुई जिसमें 2 सफाई कर्मचारी होटेल ग्रांड मरीन की सीवर लाइन की सफाई करते वक़्त मरे| दूसरी घटना गुजरात के सुरेंदरनगर[ http://indianexpress.com/article/india/two-sanitation-workers-died-in-thangadh-demand-for-fir-against-cm-vijay-rupani-for-failing-to-stop-manual-scavenging/ ] में 11 दिसम्बर को हुई जिसमें दोबारा 2 सफाई कर्मचारी मारे गए| यह घटना सुरेंदरनगर डिस्ट्रिक्ट के थानगढ़ निगम की एक सीवर लाइन में हुई थी.तीसरी घटना हैदराबाद[ https://www.deccanchronicle.com/nation/in-other-news/191217/hyderabad-two-workers-die-cleaning-manhole.html ] में 19 दिसम्बर को हुई जिसमें फिर से 2 सफाई कर्मचारी मारे गए| इस घटना में सफाई कर्मचारी बायो केमिकल सिंथेटिक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी (दवाई बनाने वाली कम्पनी) द्वारा इसके मैनहोल की सफाई के लिए बुलाये गए थे और चौथी घटना चेन्नई[ https://timesofindia.indiatimes.com/videos/city/chennai/Three-men-die-while-cleaning-septic-tank-in-Chennai/videoshow/62204112.cms ] में 22 दिसम्बर को हुई जिसमें 3 सफाई कर्मचारी मारे गए. इस घटना में सफाई कर्मचारियों को काम देने वाला एक सोने के आभूषण की दुकान का मालिक है.विडियो रिपोर्ट एक बड़ी ईमारत दिखाती हैजहाँ ये आभूषण बनाये जाते हैं, और ये दावा करती है कि इसके सेप्टिक टैंक में मानव मल के साथ-साथ वो जेहरीले रसायन भी छोडे जाते हैं जो आभूषण बनाने में इस्तेमाल होते हैं.

ये घटनाओं और इस साल की पिछली सीवर हत्त्यायें एक चलन दर्शातीं हैं, ये चलन कि बड़े-बड़े दफ्तर, संगठन, होटल, कम्पनी, हॉस्पिटल, शॉपिंग मॉल, कमर्शियल और इंडस्ट्रियल जगहों, और तो और सरकारी जगहों पर भी आज भी मैनहोल और सेप्टिक टैंक को बिना सुरक्षा उपकरणों के, जो कि कानून ने जरूरी बताएं है, हाथ से (मैन्युअली) साफ करवाया जाता है| इन सभी जगहों पर सफाई कर्मचारियों से अपने मैनहोल और सेप्टिक टैंक साफ़ कराने वाले ये लोग जो फैसले लेने वाले स्तर पर काम करते हैं, अशिक्षित और अनभिग्य लोग नहीं हैं. तब यह सवाल और जरूरी हो जाता है कि ये बड़े-बड़े लोग सफाई कर्मचारियों की मैनहोल और सेप्टिक टैंक में लगातार हो रहीं मृत्यु की समस्या से अपने आप को एकदम अलग और अनभिग्य कैसे रख पाते हैं? एक और ज्यादा उपयुक्त सम्भावना यह भी हो सकती है कि अनभिग्य होने का बस ये लोग ढोंग कर रहे हैं, असलियत में इन्हें गरीब सफाई कर्मचारियों की ज़िन्दगी की कोई चिंता नहीं है| इस साल जून में एक खबर प्रकाशित हुई है कि हैदराबाद में डिप्टी जनरल मेनेजर और जनरल मेनेजर के स्तर के सरकारी अधिकारी ही मैला प्रथा को मंजूरी दे रहें हैं.[ https://www.thenewsminute.com/article/3-men-sent-clean-sewer-hyderabad-official-justifies-saying-it-must-be-small-manhole-64162 ] दीपू चौधरी को, जो पटना में इसी साल मई में आख़िरकार मैनहोल की सफाई में अपने एक और साथी के साथ मारा गया, एक सेनेटरी इंस्पेक्टर ने कहा था कि “अन्दर जाओ, या अपनी नौकरी गंवाओ” [ https://www.telegraphindia.com/1170504/jsp/bihar/story_149607.jsp ]

लगभग हर दूसरे दिन ऐसी हत्त्यायों की खबर आती है,लेकिन फिर भी ये सरकारी-गैरसरकारी अधिकारी, बड़े-बड़े ऑफिस-कम्पनी को सँभालने वाले लोग सफाई कर्मचारियों के जीवन पर मंडराते इस खतरे से अनभिग्य रहना पसंद करते हैं.ये पसंद करते हैं सफाई कर्मचारियों के जीने के अधिकार की अवहेलना करना.ये सफाई कर्मचारियों के मौलिक अधिकार, ‘जीने का अधिकार’ का उल्लंघन करते हैं,जो कि भारत के कानून के अनुच्छेद 21 में दिया गया है.ये सफाई कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण ना उपलब्ध करा कर,‘हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013’ का भी उल्लंघन करते हैं,ये लोग सिर्फ सफाई कर्मचारियों को उनकी सुरक्षा से वंचित ही नहीं कर रहे, बल्कि उन्हें जान-बूझकर मार रहे हैं.ये मौतें सरकारी संस्थायों/जगहों पर भी हो रही हैं.इसी साल 14 अप्रैल को, जो भारत के संविधान निर्माता डॉ भीम राव अम्बेडकर का जन्म दिवस है, जिन्होंने जाति-व्यवस्था का बहुत बहादुरी से विरोध किया, सरकार द्वारा संचालित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पर बिना सुरक्षा के काम करते हुए 2 सफाई कर्मचारी मारे गये.सरकार, जो जिम्मेदार है कि इसके नागरिकों को सारी सुरक्षा प्रदान करने की, खुद कानून का उल्लंघन कर रही है.

एक और महत्वपूर्ण विषय यहाँ देखने लायक है इन सफाई कर्मचारियों की उम्र.ये सभी काफी कम उम्र में मर रहें हैं.इन सभी के सामने जीने के लिए पूरी उम्र थी, लेकिन ये सिर्फ अपनी रोज़ी-रोटी कमाने की कोशिश में ही मर रहे हैं,कौन जिम्मेदार है इन मृत्युओं के लिए? नहीं, सही सवाल ये है – कौन जिम्मेदार नहीं है इन मृत्युओं के लिये? क्या ये हमारी सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि भारत के इन जवान नागरिकों कि जिंदगियों को बचाया जाए? जीवन बीमा, मेडिकल बीमा, और दूसरी सुविधाएँ इन सफाई कर्मचारियों को क्यों नहीं दीं जाती हैं जब यही सब वैज्ञानक, विधालय, और विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, नौकरशाह, एम.एल.ए., एम.पी., मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को दीं जाती हैं? क्या ये पेशेवर और ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठे लोग एक भी दिन उनके ऑफिस में बैठ पाएंगे अगर सफाई कर्मचारी एक भी दिन वहां सफाई करने ना जाए? क्या वे अपना काम कर पाएंगे? बिना सफाई कर्मचारियों के क्या ये देश और यहाँ के लोग जीवित भी रह पाएंगे?

ऐसा नहीं है कि सरकारी और गैर सरकारी संस्थायों के पास इतने पैसे नहीं है कि सफाई कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण ना दिला सकें. तब फिर वो ऐसा क्यों नहीं करते? क्योंकि उनके धर्म ने उन्हें ये सिखाया है कि वो कुछ भी ना करें.उनका विश्वास इन धर्म की किताबों में इतना गहरा कराया जाता है कि वो बिलकुल भी चिंता करना छोड़ देते है चाहे कोई अपना “कर्म” करते करते मर भी जाए. भगवद गीता के अध्याय 3 का पद्य 35 कहता है कि “अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है. अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है”[ http://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/geeta/Chapter3_25-35.htm ] इस पद्य ने 2 उद्देश्य पूरे करे. पहला,वो लोग जो सत्ता में हैं (जाति के पदक्रम में ऊपर हैं) बिलकुल भी चिंता नहीं करते अगर कोई तथाकथित नीची जाति वाला “उसका कर्म” करते करते मर भी जाए.इन सत्ताधारी और विशेषाधिकार प्राप्त जाति के लोगों के लिए यह मौत समाज की सेवा में और उसके कर्म की मौत है, इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर कोई मरता भी है तो.

दूसरा, पीड़ित जाति के लोगों ने अपमानजनक और खतरे वाले काम को भी धार्मिक रूप से उनसका कर्त्तव्य समझा.इसी वजह से सफाई कर्मचारियों की हर दूसरे-तीसरे दिन आती मैनहोल और सेप्टिक टैंक में हुई मौतों की आती खबर भी उन्हें दोबारा मैला प्रथा में लिप्त होने से नहीं रोक पाती.अगर सफाई कर्मचारियों से पूछा जाए तो वो बहुत आसानी से बोलते है कि “ये उनका काम है” और “अगर वो नहीं करेंगे,तो कौन करेगा इसे?” सफाई कर्मचारियों से ने ये अपने दिल और दिमाग में धारण कर लिया है कि सफाई का काम सिर्फ उनका ही काम है, उनका कर्त्तव्य है, उनके जीने का उद्देश्य है और ये सब होने में धर्म ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. कर्म के नाम पर, पीड़ित जाति के लोगों को एक इन्सान के रूप में तरक्की करने से रोका गया है, एक ऐसे जैविक दिमाग के रूप में तरक्की करने से रोका गया है, जो खुद के सुधार और गरिमामय जीवन के लिए सोच सके.इसके बजाय धर्म ने इन्हें एक ऐसे दस्ते के रूप में तैयार किया है जो यथास्थिति बचाए रखने के लिए खुद भी मरनेआत्महत्या करने के लिए तैयार हैं. जातिव्यवस्था और धर्म ने पीड़ित जाति के लोगों को ऐसा बना दिया है कि वो धर्म के नाम पर खुद भी मरने को तैयार हैं.

अगर ये पीड़ित जातियां सफाई का काम छोड़ती है तो धर्म के ठेकेदारों को लगता है कि ये उनके धर्म को कमजोर करने की कोशिश है. कर्म और धर्म के सिद्धांत ने भारत से नैतिकता और मानवता को मार चुके हैं.हिन्दू धार्मिक किताबें,जो यहाँ लोग बहुमत में पालन करते हैं, मानवता से ज्यादा कर्म में विश्वास दिलातीं हैं.तथाकथित ऊँची जाति वाले लोग पीड़ित जातियों से आने वाले लोगों को -सफाई कर्मचारियों को – इन्सान भी नहीं समझते, उनके जीने के अधिकार को भी सम्मान नहीं देते.विशेषाधिकार प्राप्त जातियों को फर्क नहीं पड़ता अगर पीड़ित जातियों के कुछ लोग उनके लिए काम करते हुए मर भी जाए.मानव अधिकार और न्याय जैसे विचार हमारी जनसँख्या की इस “विशेषाधिकार” प्राप्त नस्ल की कल्पना से भी बाहर हैं.ये स्पष्ट है कि विशेषाधिकार प्राप्त जातियां ‘जाति’ को एक समस्या के रूप में देखती ही नहीं हैं और जो लोग जाति की बुराइयों की बात करते हैं उन्हें ही ये धर्म और कर्म वाले लोग जातिवादी घोषित कर देते हैं.हम एक शर्मनाक समय में जी रहे हैं.वे इस लेख को आज पढेंगे और कल भूल जायेंगे और अगली बार,उनका मैनहोल और सेप्टिक टैंक साफ कराने के लिए पंप मशीन को बुलाने के बदले वो किसी सस्ते सफाई कर्मचारी को ढूंड रहे होंगे| और हम फिर से कुछ और सफाई कर्मचारियों की मृत्यु की खबर पढ़ रहे होंगे.

बाबूराव बगुल ने पीड़ित जातियों से सही ही कहा था,
“या तो देश छोड़ दो, या युद्ध करो”
तुम जो गलती कर चुके हो
[ Dangle, Arjun (ed.). 2009. Poisoned Bread: Translations from the Modern Marathi Dalit Literature. New Delhi: Orient Blackswan Private Limited.]

वो जो परदेस चले जाते हैं
विदेशी ज़बान और भेस अपनाते हैं
और इस देश को भूल जाते हैं
-उनको मेरा सलाम|
और वो जो नहीं भूलते
और सदियों तक पिटने पर भी नहीं बदले
-ऐसे पाखंडियों से मैं पूछता हूँ:
तुम क्या कहोगे अगर तुमसे किसी ने पूछा –
छुआछूत क्या है?
क्या ये भगवान की तरह अनंत है?
अछूत कैसा होता है? वो कैसा दिखता है?
क्या वो एकदम कुष्ठ रोग की छवि सा दिखता है?
या पैगम्बर के दुश्मन जैसा?
क्या वो धर्म विरोधी सा दिखता है, एक पापी, एक चरित्रहीन, या एक नास्तिक?
मझे बताओ,
तुम्हारा क्या जवाब होगा?
क्या तुम बिना झिझक के जवाब दोगे:
‘अछूत – वो मैं हूँ?’
इसलिए मैं कहता हूँ-
तुम जो इस देश में पैदा होने की गलती कर चुके हो
अब इसे तुरंत सुधारो: या तो देश छोड़ दो,
या युद्ध करो!
-बाबूराव बगुल
(अंगेजी से हिंदी में अनुवाद धम्म दर्शन निगम और शीवा दुबे के द्वारा)

{ धम्म दर्शन निगम सफाई कर्मचारी आंदोलन के साथ काम करते हैं और शीवा दुबे युनिवर्सिटी ऑफ मयामी में पढ़ती हैं }
फोटो – नेशनल दस्तक से साभार

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