बहुसंख्यक श्रमिकों की मान्यता के साथ सेंचुरी मिल्स अपना वादा पूरा करें !

सेंचुरी मिल्स (यार्न और डेनिम, ग्राम सत्राटी, जिला खरगोन, मध्य प्रदेश) के श्रमिकों का संघर्ष जारी !

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सेंचुरी मिल्स (यार्न और डेनिम, ग्राम सत्राटी, जिला खरगोन, मध्य प्रदेश) के श्रमिकों का संघर्ष अब चोटी पर पहुंच चुका है । 1000 से अधिक श्रमिक व कर्मचारी, जिन दो मीलों से रोजगार पा रहे थे, उन मिल्स को बिरला ने मनमाने तरीके से बेचना चाहा जो कि अब नाकाम हो गया हैं | मगर अभी भी ट्रिब्यूनल के फैसले के विरुद्ध बिरला ने मजदूरों को रोजगार न देते हुए कंपनी के गेट्स बंद करके रखे हैं | औधोगिक न्यायाधिकरण के आदेश से सेंचुरी ही मालिक होते हुये श्रमिक और कर्मचारियों  को वेतन भुगतान जारी है | रोजगार का अधिकार मांगने वाले सेकड़ों श्रमिक और परिवारों से महिलाएं कंपनी की मनमानी के विरुद्ध अक्टूबर 2017 से मिल्स के गेट के बाहर सत्याग्रह चला रहे हैं | इस सत्याग्रह के साथ 61/2 महिनों की तनख्वाह व 2012 से प्रलंबित बकाया राशि लेने के लिए  रोज पांच श्रमिकों के क्रमिक अनशन को भी आज 187 दिन पूरे हो चुके हैं | सेंचुरी और वेयरिट ग्लोबल लिमिटेड के बीच हुए बिजनेस ट्रांसफर एग्रीमेंट, औद्योगिक विवाद न्यायाधिकरण का फैसला 28-11-2017 और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का फैसला 06-04 2018 के अनुसार संदेहास्पद एवं फर्जी साबित हुआ हैं।  इसके बाद कई बार बिरला मैनेजमेंट और श्रमिकों के प्रतिनिधि के रूप में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर जी तथा श्रमिकों के साथ, पूर्व से बने कुल श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियोंकी उपस्थिति में  बीच समझौते के लिए संवाद होता रहा | इस बातचीत में बिरला मैनेजमेंट (सेंचुरी) ने 2 प्रस्ताव रखे | पहला कि हम आपको मिल्स बंद करने से रोजगार के बदले भरपाई के रूप में नौकरी किए वर्षों का, प्रतिवर्ष 35 दिन का वेतन और निवृत्ति वर्ष तक बचे सालों का प्रतिवर्ष 25 दिनों का वेतन,VRS/VSS के रूप में अदा करने को तैयार है। दूसरा विकल्प था, मात्र रुपए में मिल्स की पूरी संपदा, बिना किसी पूर्व के कर्ज के (past liabilities), श्रमिकों की सहकारी समिति या अन्य  संस्था को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव |  इन दोनों पर गहरे अध्ययन और आयोजन के बाद श्रमिकों ने मन बना ही लिया कि अगर सेंचुरी मिल्स नहीं चलती है तो हम दूसरा विकल्प, मिल्स लेकर स्वयं, सहयोगीयों के साथ चलाना ही मंजूर करेंगे |

सेंचुरी के करीबन 90% श्रमिक जबकि स्वयं मिल्स चलाकर रोजगार के पक्ष में नोटराइज शपथ पत्रों द्वारा अपनी राय दे चुके थे, यहां पूर्व में कार्य करने वाले 4 श्रमिक संगठन, AITUC, INTUC, बीएमएस की स्थानीय इकाईयां एवं सेंचुरी एकता परिषद् ने, आपस में गठबंधन करके VRS याने नगद राशि के ही रूप में भरपाई के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। यूनियंस के इस अडंगा डालने से संतप्त  श्रमिकों ने अब चारों श्रमिक संगठनों से इस्तीफा देकर अपनी स्वतंत्र ताकत जुटाई और औद्योगिक न्यायाधिकरण के समक्ष चल रहे रेफरेंस प्रकरणों में उनका स्वतंत्र स्थान का अधिकार औधोगिक न्यायाधिकरण ने आदेश से मंजूर 4.12.2018 को किया | बहुसंख्यक श्रमिक मिल्स चलाने के अपने चुने हुए विकल्प पर, श्रमिकों के  प्रतिनिधि व मेधा पाटकर जी को औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 36 के तहत (केंद्रीय अधिनियम 36 के अनुसार) औधोगिक न्यायाधिकरण  के समक्ष अपने प्रतिनिधित्व व पैरवी करते हुए, देश भर के समर्थकों के सहयोग के साथ, अडिग है। श्रमिकों ने अपने अपने नॉटराइज्ड  शपथ पत्रों के द्वारा यह साबित किया है कि हम नगद राशि के बिल्कुल ही पक्ष में नहीं है | श्रमिक संगठन जबकि बार बार पर्चे, व्हाट्सएप या अन्य माध्यमों से श्रमिकों को यह कहना, मनाना या धमकाते रहे हैं कि यह दोनों मिल्स जबकि बिरला कंपनी मुनाफे के बिना, नुकसानी के कारण, नहीं चला पाई तो आप क्या चला पाएंगे ? श्रमिकों ने अपनी एकता और संगठित शक्ति बरकरार रखते हुये, कई विशेषज्ञों की जांच पड़ताल के बाद यह भरोसा पाया है कि ये मिल्स चलने की स्थिति में है | इसी बीच अब श्रमिकों को एक और विशेष समर्थन, जो वरिष्ठ और अनुभवी टैक्सटाइल्स के ज्ञातज्ञ रहे हैं, उनसे भी प्राप्त हुआ है। 

अवधेश शर्मा , जो टैक्सटाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के जाँवाइंट जनरल सेक्रेटरी है, उन्होंने कहा “

अभी  कुछ  वर्षों  में  मेहनत   करके  रोटी  कमाना , लोगों  को  समझ नहीं  आ  रहा है।  बिना मेहनत  के बेईमानी , धूर्तता, चोरी, डकैती  से  कमाकर  ऐश  की  जिंदगी  जीनेवाले  को  अच्छा  समझा  जाने  लगा है। इसका  सबसे  बड़ा  असर,  जीवन  के  लिए  सबसे  प्रमुख  “रोटी – कपड़ा – मकान” में से एक भारत  की   GDP  में  बड़ा  योगदान   देने वाली, निर्यात (EXPORT)  में  बहुत  बड़ा  सहयोग  करने वाली,  भारत  के  सबसे  पुरानी, द्वितीय सबसे  अधिक  नौकरी  देने वाली, जमीन और कृषि पर आधारित  “Indian Textile Industry”  पर  पड़ा  है।   इस  उद्योग  की  कमी  सिर्फ  इतनी  है  की  यहाँ  मेहनत  करनी  पड़ती  है।

अभी  हाल  में  ,  मध्य प्रदेश  की  Century Denim Mills, कसरावद  भी  इसी  का  शिकार  हो  गयी  है।   अब  तो  आलम यह है  की   कुछ  लोग  तो  ये  चाहते  हैकी  मिल को  चलाने  से  कोई  फायदा  नहीं, VRS में  नकद  रुपया  मिल  जाये  तो  मेहनत  भी  नहीं  करनी  पड़ेगी।

मेरा  निवेदन  है  की  अपनी  सोच  बदलें , मेहनत  करके  कमाने  में  विश्वास  करे और  दूसरों  को  भी  मेहनत  करके  कमाने  खाने  को  प्रेरित  करें।जो  लोग  उस  मिल  से  सम्बन्धित  हों  तो  उन  लोगों  को  समझायें।  मिल  दोबारा  चालू  हो  सकती  है  बस   वो  लोग  विरोध  न करे I “

-(नर्मदा बचाओ आन्दोलन,National Alliance of People’s Movements)

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