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कला एवम् साहित्य

सबसे बड़े दलित साहित्यकार तो रवींद्रनाथ टैगोर है !

( पलाश विश्वास )दुनिया के सबसे बड़े दलित साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर जो जन्म से अछूत पिराली ब्राह्मण थे और इसी अस्पृष्यता के दंश से बचने उनका परिवार कोलकाता चला आया। प्रिंस द्वारका नाथ ठाकुर के लन्दन शेयर बाज़ार में स्टॉक और टैगोर

‘कितनी कठपुतलियां’ लिखकर स्व. प्रभाष जोशी के स्वप्न को पूरा करने की कोशिश की- मेघवंशी

देसूरी ( प्रमोद पाल सिंह ) चर्चित पुस्तक 'कितनी कठपुतलियां' के लेखक एवं बहुजन चिंतक भंवर मेघवंशी ने देसूरी पहुंचने पर कहा कि किताबों के काले शब्द क्रांति,व्यवस्था एवं परिवर्तन के वो हथियार हैं जो कभी असफल नही होते। किताबों ने हमें अपने

इस उपन्यास पर फिल्म बननी चाहिए

भंवर मेघवंशी का हाल ही में प्रकशित हुआ उपन्यास "कितनी कठपुतलियां" अपने आपमें एक मिसाल है, जिसमें उन्होंने जीती जागती घटनाओ का बखूबी चित्रण किया है. जिसे अपनी  नज़रों से देखा और महसूस किया। यह उपन्यास सामाजिक कार्यकर्ता और रंगकर्मी शंकर

यह कठपुतलियों के बोलने का समय है।

(डाॅ. रेणु व्यास )‘ये दुनिया है रंगमंच, हम हैं इसकी कठपुतलियाँ’ अगर इतना सा ही सच होता तो दुनिया-भर में कुछ ताक़तवर कठपुतलियाँ बाकी सभी को अपने इशारों पर न नचातीं। यानी शेक्सपियर को कहना चाहिए था - ये दुनिया अगर ‘रंगमंच’ है तो कुछ नचाने

रामदेव पीर की आध्यात्मिक धारा से अवगत कराती है यह किताब !

( पूरा राम ) डॉ कुसुम मेघवाल की 'मेघवाल बाबा रामदेव' पढ़ ही रहा था कि भंवर मेघवंशी की दो पुस्तकें 'कितनी कठपुतलियाँ' और 'महान समाज प्रचेता  रामदेव पीर' हस्तगत हुई . रामदेव जी के जीवन के संदर्भ में और जानने की उत्कंठा में इस पुस्तक को

अपनी ही मिट्टी के लाल से परिचित करवाता है यह उपन्यास

( डॉ. गोविंद मेघवंशी ) सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक भंवर  मेघवंशी ने द्वारा लिखित कितनी कठपुतलियां उपन्यास इन दिनों पढ़ने का अवसर मिला . इसे लिखकर लेखक ने हमें शंकर सिंह जैसे ज़मीन से जुड़े एक आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता से अपरिचित होने से

चार दशक के अदम्य संघर्ष की कहानी है “कितनी कठपुतलियाँ”

( एस आर मेहरा ) “कितनी कठपुतलियाँ"में कठपुतलियाँ भले ही अनगिनत हों पर नायक शंकर सिंह जैसा वास्तविक और संघर्ष करने वाला हो और लेखक भंवर मेघवंशी जैसा बेबाक,निर्भिक,स्वतंत्र और जमीनीं स्तर का संजीदगी से भरा हो तो इन्हीं अनगिनत

कहां है संस्कृति के रक्षक ?

 ( डॉ. संदीप कुमार मेघवाल, स्वतंत्र कलाकार, उदयपुर ) संज्ञान में आया कि सरकार के पास कला और कलाकारों के संरक्षण के लिए कोई बजट नहीं है। बहुत दुर्भाग्यपूर्ण मामला है कि ललित कला अकादमी को संस्थान में कार्यरत कर्मचारियों को वेतन

अरुणा पार्टी के संघर्षों का जीवंत दस्तावेज़ है – कितनी कठपुतलियाँ

- शालिनी शालू 'नज़ीर'   यह पुस्तक कोरी कल्पनाओं का आधार मात्र न होकर शंकर सिंह के व्यक्तिगत जीवन और मजदूर किसान शक्ति संगठन के कार्यकर्ता के रूप आई सभी छोटी बड़ी घटनाओं का वास्तविक वर्णन है। इस पुस्तक के माध्यम से समाज और कानून का कोरा

गीताप्रेस, गोरखपुर : जिसने संकट का सामना करते हुए पूरे भारत का धार्मिक पासा ही पलट दिया !

- डॉ. एम एल परिहार सिर्फ किताबों से सामाजिक,वैचारिक व सांस्कृतिक कायापलट की जा सकती है यह साबित कर दिखाया गीता प्रेस गोरखपुर ने. भारत के सबसे पुराने व बड़े इस संस्थान की स्थापना 1923 में जयदयाल गोयनका ने की थी. इसके संस्थापक संपादक