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कला एवम् साहित्य

क्या आप सत्यनारायण सोनी को जानते हैं ?

-सतीश छिम्पा " जिस तरह हिंदी में 'कॉमरेड का कोट' कहानी से अचानक ही सृंजय का जोरदार उभार और चर्चा का तूफानी दौर चला। 'पीली छतरी वाली लड़की' से उदयप्रकाश विख्यात हुए- सत्यनारायण सोनी ने 'घमसाण' कहानी संग्रह से राजस्थानी कहानी में ऐसा

सादगी के भीतर प्रतिरोध एवं विकल्प के कथाकार थे स्वयं प्रकाश – डॉ शम्भु गुप्त

अलवर।  स्वयं प्रकाश समाज की उदासीनता के बीच जीवन के सार्थक स्पंदन तथा लोक के सत्य के चितेरे कथाकार थे। सादगी और साधारणता का उनका गुण था। सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ शम्भु गुप्त ने अलवर में जनवादी लेखक संघ द्वारा आयोजित गोष्ठी में कहा कि स्वयं

दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़बाँ और !

-राजेश चौधरी, चित्तौड़गढ़हिन्दी पट्टी में दलित आत्मवृत्त-लेखन महाराष्ट्र की तुलना में देर से शुरू हुआ और अब भी संख्यात्मक दृष्टि से कम है। भँवर मेघवंशी का आत्मवृत्त पिछले दिनों प्रकाशित हुआ है, जो कि इस अभाव की एक हद तक पूर्ति करता है। इसे

कारसेवक की किताब पर संघ ख़ामोश क्यों है ?

(लखन सालवी )दलित चिंतक भंवर मेघवंशी की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘‘मैं एक कारसेवक था’’ को 1 दिसम्बर की रात को पढ़ना आरम्भ किया और 2 दिसम्बर को सुबह 11 बजे इसका आखिरी पन्ना पढ़ा।यह जबरस्त पुस्तक है, जिसमें संघ के एक स्वयंसेवक की कहानी है। वो

साहस के पहाड़ पर खड़ा एक कारसेवक !

( उम्मेद सिंह )आज राजस्थान में ही नहीं वरन् देशभर में दलित आयोजन, आन्दोलन, सम्मेलन व सेमीनार में अनिवार्य नाम बन चुके भँवर मेघवंशी अपनी नई किताब ‘मैं एक कारसेवक था ‘ में संघर्ष के पहाड़ पर खड़े एक कारसेवक नज़र आते है। पुस्तक उनकी आत्मकथा

संघ के एक स्वयंसेवक द्वारा ‘मैं एक कारसेवक था’ की समीक्षा !

(कमल रामवानी 'सारांश') मेरा सौभाग्य रहा है कि पिछले 3 महीने में जो मैंने किताबें पढ़ी है उनके लेखक व्यक्तिगत रूप

राजस्थानी भाषा की पहली दलित आत्मकथा “च मानी चमार” !

(दुलाराम सहारण) भारतीय समाज व्यवस्था में भले ही हम जाति-विहीन समाज के कितने ही दावे कर लें पर जाति जमीनी हकीकत है। मानव निर्मित समाज में जाति देह पर चमड़ी की तरह चिपकी है। धर्म बदलो पर जाति नहीं बदलती,गांव, शहर बदल लें, जाति नहीं

‘मैं एक कारसेवक था’ पुस्तक पढ़ते हुए एक दर्द भरी आहट सुनाई देती है !

(रेणुका पामेचा) भँवर मेघवंशी द्वारा लिखित यह आत्मकथा एक संगठन के अन्दर की दोगली नीति को इतने स्व अनुभव से सामने लाती है कि लगता है जैसे आज भी वही घटित हो रहा है. एक युवा बाहरी तामझाम व बड़े-बड़े नारे देखकर कितनी निष्ठा से राष्ट्रीय

कम्यूनल हिप्पोक्रेसी को बेनकाब करती रचना ‘मैं एक कारसेवक था’

( बी.एल. पारस )निब्बाण प्रकाशन और बोधि फाउंडेशन द्वारा जुन 2019 में आयोजित प्रथम राजस्थानी दलित साहित्य सम्मेलन में एक सत्र में दलित आत्मकथाओं के संदर्भ में चर्चा करते हुए मैंने कहा था कि आत्मकथाओं के बिना दलित साहित्य अधूरा है । कारण- 

जयपुर में हुआ जन साहित्य पर्व का आगाज़,जलियाँवाला बाग की शहादत को है समर्पित !

( Jaipur ,15 November 2019) जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच द्वारा तीन दिवसीय जन साहित्य पर्व की शुरुआत आज देराश्री शिक्षक सदन ,राजस्थान विश्वविद्यालय में हुयी . इस बार का आयोजन जलियांवाला बाग की शहादत को समर्पित किया गया है और आयोजन