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कला एवम् साहित्य

अपनी ही मिट्टी के लाल से परिचित करवाता है यह उपन्यास

( डॉ. गोविंद मेघवंशी ) सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक भंवर  मेघवंशी ने द्वारा लिखित कितनी कठपुतलियां उपन्यास इन दिनों पढ़ने का अवसर मिला . इसे लिखकर लेखक ने हमें शंकर सिंह जैसे ज़मीन से जुड़े एक आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता से अपरिचित होने से

चार दशक के अदम्य संघर्ष की कहानी है “कितनी कठपुतलियाँ”

( एस आर मेहरा ) “कितनी कठपुतलियाँ"में कठपुतलियाँ भले ही अनगिनत हों पर नायक शंकर सिंह जैसा वास्तविक और संघर्ष करने वाला हो और लेखक भंवर मेघवंशी जैसा बेबाक,निर्भिक,स्वतंत्र और जमीनीं स्तर का संजीदगी से भरा हो तो इन्हीं अनगिनत

कहां है संस्कृति के रक्षक ?

 ( डॉ. संदीप कुमार मेघवाल, स्वतंत्र कलाकार, उदयपुर ) संज्ञान में आया कि सरकार के पास कला और कलाकारों के संरक्षण के लिए कोई बजट नहीं है। बहुत दुर्भाग्यपूर्ण मामला है कि ललित कला अकादमी को संस्थान में कार्यरत कर्मचारियों को वेतन

अरुणा पार्टी के संघर्षों का जीवंत दस्तावेज़ है – कितनी कठपुतलियाँ

- शालिनी शालू 'नज़ीर'   यह पुस्तक कोरी कल्पनाओं का आधार मात्र न होकर शंकर सिंह के व्यक्तिगत जीवन और मजदूर किसान शक्ति संगठन के कार्यकर्ता के रूप आई सभी छोटी बड़ी घटनाओं का वास्तविक वर्णन है। इस पुस्तक के माध्यम से समाज और कानून का कोरा

गीताप्रेस, गोरखपुर : जिसने संकट का सामना करते हुए पूरे भारत का धार्मिक पासा ही पलट दिया !

- डॉ. एम एल परिहार सिर्फ किताबों से सामाजिक,वैचारिक व सांस्कृतिक कायापलट की जा सकती है यह साबित कर दिखाया गीता प्रेस गोरखपुर ने. भारत के सबसे पुराने व बड़े इस संस्थान की स्थापना 1923 में जयदयाल गोयनका ने की थी. इसके संस्थापक संपादक

‘स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान’ सुधीर विद्यार्थी को !

चित्तौड़गढ़। सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना के जन्म शताब्दी वर्ष में साहित्य संस्कृति के संस्थान संभावना द्वारा 'स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान' की घोषणा कर दी गई है। संभावना के अध्यक्ष डॉ के सी

डॉ. आंबेडकर : पुलिस, जासूस, और अखबारों की नजर से

( अनिरुद्ध कुमार )मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही सरकारी आदेशों, परिपत्रों, पुलिस और जासूसी संस्थाओं की रिर्पोटों की इतिहास लेखन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इतिहास लेखन या उनके पुनर्लेखन में इन हजारों वर्षों से ये स्रोत ऐतिहासिक

रेत : उपेक्षित वर्ग की यथार्थपरक दास्तान

( डॉ रामानंद कुलदीप ) आधुनिक हिंदी साहित्य के नामचीन रचनाकार हैं भगवानदास मोरवाल । निपट ग्रामीण परिवेश के माहौल में पले-बढ़े होने के बावजूद बिना किसी विरासतीय बपौती के साहित्यिक जगत में जो वजूद आपने स्थापित किया है, वह न केवल सराहनीय है

पाताल लोक – हाशिये के लोगों की अंधकारमय जीवन की गाथा!

परिचय -कहानी की शुरुआत तथाकथित पुराणों में वर्णित तीन लोको के वर्णन के साथ शुरू होती है पहला लोक- स्वर्गलोक जिसमें देवता निवास करते है, दूसरा लोक- धरती लोक जिसमें आदमी रहते है तीसरा व सबसे नीचे वाला लोक - 'पाताल लोक' जिसमें

क्या लोग बुद्ध, फूले या बाबा साहब की किताबों से डरे हुए हैं !

(संजय श्रमण )यह दिवस पुस्तकों के लिए नहीं है ताकि वे विश्व को पा सकें, बल्कि विश्व के लिए है ताकि वह पुस्तकों को पा सके। जब ज्योतिबा फूले ने किताबों से दोस्ती की तो उनके भीतर ज्योति उमगने लगी, उनका दीपक जलने लगा था। जब बाबा साहब ने पहली