Browsing Category

नज़रिया

गाली को मिशन न बना,जाने दे !

(भंवर मेघवंशी )सोशल मीडिया एक दिन इस देश में गृह युद्ध करवा कर मानेगा,यह तय हो चुका है।इस आग में  घी डालने का काम गालीबाज मिशनरी कर रहे हैं,जिनको अपने अवगुण नहीं दिखते,अपने भीतर की बुराइयां नहीं नजर आती,वे अपनी कमजोरियों को दूसरों पर थोप

आज अंबेडकर को खुद अपने ही भक्तों से लड़ना पड़ेगा !

(डॉ.एम.एल.परिहार)बहुत कड़वा सच है यह लेकिन वास्तविकता को नकार नहीं सकते. दरअसल हमने अंबेडकर को अपने अपने हिसाब से गढ लिया है, अपने अपने सांचे में ढाल दिया है . जिसमें हमारा स्वार्थ सधता है उसी अंबेडकर को याद करते हैं. बाबासाहेब अंबेडकर ने

यह कैसा आंबेडकरवाद है ?

(वीरेंद्र यादव)यह कैसा आंबेडकरवाद है ,जो गांधी और गोडसे को एक ही पंक्ति में खड़ा करता है? यह आत्मघाती है और दलित विमर्श के प्रति विकर्षण पैदा करने वाला है। विनम्र निवेदन है कि इससे बचिए और संघ को गांधी के समतुल्य बताने और बनाने से बाज

ग्रेटा थंबर्ग की पर्यावरणीय चिन्ता !!

( स्कन्द शुक्ला )जब स्वीडन की वह किशोरी ग्रेटा थन्बर्ग एक यॉट पर बैठकर सागर पार गयी , तो अचम्भे और अविश्वास के स्वर गूँजने ही थे। ग्रेटा थन्बर्ग का नाम बहुख्यात हो चुका है। वे अभी वयस्क तो नहीं हुई हैं , पर उन्होंने संसार-भर में पर्यावरण

यदि हम उन्हें सिर्फ कोसते रहेंगे,तो वे दसों दिशाओं शासक होंगे,और हम सिर्फ मजदूर !

(डॉ.एम.एल. परिहार )आज बहुजन समाज भारी संकट के दौर में हैं. न सरकारी नौकरी, न खेती ,न व्यापार और न राजनीतिक सत्ता. ऐसे मुश्किल समय में भी यदि हम किसी प्लानिंग के साथ आगे बढने की बजाय सिर्फ दूसरी जातियों को कोसते रहेंगे तो हमें फिर से उनके

क्या हिंदी देश को एक रख सकती है?

-(राम पुनियानी) मोदी-2 सरकार काफी शक्तिशाली है. उसे न केवल खासी संख्या में सांसदों का समर्थन प्राप्त है वरन विपक्ष बहुत कमज़ोर और बंटा हुआ है. यही कारण है कि सरकार जनभावनाओं की परवाह किये बगैर, धड़ल्ले से संघ-भाजपा के हिन्दू

कितने मासूम हैं वे…!

(Hemant Kumar Jha) कितने मासूम हैं वे...बिल्कुल उस बच्चे की तरह जिसे चावल का भूंजा 'कुरकुर' भी चाहिये और 'मुरमुर' भी चाहिये। उसी तरह उन्हें भी...एक खास तरह का राष्ट्रवाद भी चाहिये, नकारात्मक किस्म के सांस्कृतिक वर्चस्व की मनोवैज्ञानिक

धार्मिक राष्ट्रवादः नायक और विचारधारा

(राम पुनियानी) समावेशी बहुवाद पर आधारित वह राष्ट्रवाद, जो भारत के स्वाधीनता संग्राम की आत्मा था, आज खतरे में है. इसका कारण है संघ परिवार की राजनीति का बढ़ता प्रभामंडल. संघ से जुड़े अनेकानेक संगठन, हमारे सामाजिक और राजनैतिक

आरक्षण विरोधी पण्डों से दूर रहें आरक्षित कौमें !

कुछ लोग लाइलाज़  बीमारियों से ग्रस्त हैं,लेकिन उनको पता भी नहीं है कि उनको रोग है,वे अपनी बीमारी को अपनी विशिष्टता निरूपित करते हैं। ये ऐसे लोग है जो खुद सदियों से मिले हुये जन्मना जातिगत आरक्षण से मिली पुरोहिताई से पेट भराई करते

मैं रविदास मंदिर आन्दोलन से असहमत क्यों हूँ ?

रविदास मंदिर आंदोलन से कोई बुनियादी फर्क नहीं आने जा रहा है!( धर्म-अध्यात्म के नाम पर जो भी हलचल होगी, जो भी जनजागरण होगा, वह आखिर में जाकर मनुवादी ताकतों को मजबूती देगा, न कि दलित बहुजन आंदोलन और उसकी वैचारिकी को)-भंवर मेघवंशीमेरे लिये