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नज़रिया

इतिहास में अब तक का महान क्रांतिकारी सूत्र

‘अत्त दीपो भव’ अर्थात अपना प्रकाश स्वयं बनो..गौतम बुद्ध कहते है...'किसी दूसरे के उजाले में चलने की बजाय अपना प्रकाश ,अपनी प्रेरणा खुद बनो. खुद तो प्रकाशित हों ही, दूसरों के लिए भी एक प्रकाश पूंज की तरह जगमगाते रहो'...भगवान बुद्ध के महा

संघी ‘भंवर’ से निकालते ‘मेघवंशी’ !

(सम्राट बौद्ध )बड़े गर्व के साथ कहूंगा कि मैं 'मैं एक कारसेवक था' किताब का पहला पाठक हूँ। इस जीवनी का पूरा सार इसके शीर्षक के आखरी शब्द 'था' में निहित है और यही वो शब्द था जिसके कारण मैं किताब का इंतज़ार कर रहा था।संघ के बारे में दलित

आरएसएस की असलियत को उजागर करती एक किताब-“मैं एक कारसेवक था”

( नीरज बुनकर )इस किताब को मैंने ज्यादातर ऑफिस  में  ही बैठकर पढ़ा। अधिकांश लोग  जो  मेरे सहकर्मी है, वो उन समुदायों   से  ताल्लुक  रखते है ,जिनकी विचारधारा दक्षिणपंथ के नजदीक है।जब  मैं किताब  आर्डर  कर  रहा  था  तब  भी मुझे  लोगो  ने

हिंदू समाज समृद्ध और खुशहाल हो,यह मेरी ख्वाहिश है !

(डॉ.एम.एल.परिहार)मैं किसी एक धर्म, संप्रदाय या पंथ से बंधा हुआ नहीं हूं ,मनुष्य का कल्याण यानी मानवता ही मुख्य मार्ग है. लेकिन आज मैं गोरक्षा के मुद्दे पर बहुसंख्यक हिंदू समाज के हित में कुछ कहने की इजाजत चाहता हूं.गत सप्ताह भर से जयपुर से

रात भर पेड़ों की हत्या होती रही, रात भर जागने वाली मुंबई सोती रही !

(रवीश कुमार) इलाक़े में धारा-144 लगी थी। मुंबई के आरे के जंगलों में जाने वाले तीन तरफ़ के रास्तों पर बैरिकेड लगा दिए गए थे। ठीक उसी तरह से जैसे रात के अंधेरे में किसी इनामी बदमाश या बेगुनाह को घेर कर पुलिस एनकाउंटर कर देती है, शुक्रवार की

केवल गाँधी ही भारत के राष्ट्रपिता हैं

(राम पुनियानी) अमरीका के ह्यूस्टन में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम एक से अधिक कारणों से चर्चा का विषय बन गया है. जिस समय मोदी फरमा रहे थे कि “आल इज़ वेल इन इंडिया”, उसी समय हजारों प्रदर्शनकारी, भारत के असली हालात के बारे में बात कर रहे

गाली को मिशन न बना,जाने दे !

(भंवर मेघवंशी )सोशल मीडिया एक दिन इस देश में गृह युद्ध करवा कर मानेगा,यह तय हो चुका है।इस आग में  घी डालने का काम गालीबाज मिशनरी कर रहे हैं,जिनको अपने अवगुण नहीं दिखते,अपने भीतर की बुराइयां नहीं नजर आती,वे अपनी कमजोरियों को दूसरों पर थोप

आज अंबेडकर को खुद अपने ही भक्तों से लड़ना पड़ेगा !

(डॉ.एम.एल.परिहार)बहुत कड़वा सच है यह लेकिन वास्तविकता को नकार नहीं सकते. दरअसल हमने अंबेडकर को अपने अपने हिसाब से गढ लिया है, अपने अपने सांचे में ढाल दिया है . जिसमें हमारा स्वार्थ सधता है उसी अंबेडकर को याद करते हैं. बाबासाहेब अंबेडकर ने

यह कैसा आंबेडकरवाद है ?

(वीरेंद्र यादव)यह कैसा आंबेडकरवाद है ,जो गांधी और गोडसे को एक ही पंक्ति में खड़ा करता है? यह आत्मघाती है और दलित विमर्श के प्रति विकर्षण पैदा करने वाला है। विनम्र निवेदन है कि इससे बचिए और संघ को गांधी के समतुल्य बताने और बनाने से बाज