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नज़रिया

डॉ. अंबेडकर और भारतीय महिलाओं के लिए उनका योगदान !

(प्रेमचंद गांधी ) ‘मैं महिलाओं द्वारा चलाए जाने वाले आंदोलनों में गहरा विश्‍वास रखता हूं। उन्‍हें अगर सही ढंग से विश्‍वास में लिया जाए तो वे आज के तकलीफदेह सामाजिक माहौल को पूरी तरह बदल सकती हैं। अतीत में उन्‍होंने निम्‍न वर्ग के

“मैं एक कारसेवक था” एक व्यक्ति के बनने की गाथा है !

(राजाराम भादू) " मैं एक कार सेवक था " पुस्तक के नवारुण प्रकाशन से छपने की जब प्रथम सूचना लेखक भंवर मेघवंशी ने दी थी तो यह उल्लेख किया था कि इसकी पाण्डुलिपि किन हाथों से गुजरी और प्रकाशन की कैसी प्रक्रिया के बाद यह सामने आयी। मुझे

क्या पैसा हाथ का मैल है ?

( डॉ एम एल परिहार )भारतीय समाज बड़ा ढोंगी है, दोहरा जीवन जीता है कहता कुछ और हैं लेकिन करता कुछ और है कथनी और करनी में बहुत फर्क होता है.हमें बचपन से बार बार सुनाकर यह घुट्टी पिलाई जाती हैं कि पैसा हाथ का मैल है इसकी ज्यादा चिंता नहीं

मैं दिल्ली पुलिस के उस जवान के साथ खड़ा हूँ जिसे पीटा गया -रवीश कुमार

(रवीश कुमार) एक तस्वीर विचलित कर रही है। दिल्ली के साकेत कोर्ट के बाहर एक वकील पुलिसकर्मी को मार रहा है। मारता ही जा रहा है। पुलिस के जवान का हेल्मेट ले लिया गया है। जवान बाइक से निकलता है तो वकील उस हेल्मेट से बाइक पर दे मारता है। जवान

भाजपा का राष्ट्रवाद और चुनावी गणित

(राम पुनियानी) भाजपा एक नहीं बल्कि अनेक मायनों में ‘पार्टी विथ अ डिफरेंस’ है. वह देश की एकमात्र ऐसा बड़ी राजनैतिक पार्टी है जो भारतीय संविधान में निहित प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के बावजूद यह मानती है कि भारत एक हिन्दू

भारत एक हिन्दू राष्ट्र नहीं हैः सिक्ख संगठन

- राम पुनियानी आरएसएस के चिंतक और नेता लगातार यह कहते आए हैं कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है। जाहिर है कि इस पर धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर सिक्खों और मुसलमानों, के अतिरिक्त भारतीय संविधान में आस्था रखने वालों को भी गंभीर आपत्ति है।

इतिहास में अब तक का महान क्रांतिकारी सूत्र

‘अत्त दीपो भव’ अर्थात अपना प्रकाश स्वयं बनो..गौतम बुद्ध कहते है...'किसी दूसरे के उजाले में चलने की बजाय अपना प्रकाश ,अपनी प्रेरणा खुद बनो. खुद तो प्रकाशित हों ही, दूसरों के लिए भी एक प्रकाश पूंज की तरह जगमगाते रहो'...भगवान बुद्ध के महा

संघी ‘भंवर’ से निकालते ‘मेघवंशी’ !

(सम्राट बौद्ध )बड़े गर्व के साथ कहूंगा कि मैं 'मैं एक कारसेवक था' किताब का पहला पाठक हूँ। इस जीवनी का पूरा सार इसके शीर्षक के आखरी शब्द 'था' में निहित है और यही वो शब्द था जिसके कारण मैं किताब का इंतज़ार कर रहा था।संघ के बारे में दलित

आरएसएस की असलियत को उजागर करती एक किताब-“मैं एक कारसेवक था”

( नीरज बुनकर )इस किताब को मैंने ज्यादातर ऑफिस  में  ही बैठकर पढ़ा। अधिकांश लोग  जो  मेरे सहकर्मी है, वो उन समुदायों   से  ताल्लुक  रखते है ,जिनकी विचारधारा दक्षिणपंथ के नजदीक है।जब  मैं किताब  आर्डर  कर  रहा  था  तब  भी मुझे  लोगो  ने