पूंजीपतियो का आर्थिक विकास और पर्यावरण दोहन !

“ ग्रेनाइट बाहुल्य करेड़ा, भीलवाड़ा की कहानी ”

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चाहे वो छत्तीसगढ़ का घरघोड़ा क़स्बा हो या मध्यप्रदेश का मुरैना जिला, हर जगह खनन लॉबी का बोलबाला आपको दिख जायेगा। मार्बल,ग्रेनाइट के बढ़ते स्वाद व् पूंजीपतियो के काले पैसे ने इस धंधे को पंनपने में एक संजीवनी बूटी का काम किया है। वर्ष 2012 में भारत की सर्वशेष्ठ प्रशासनिक सेवावो में से एक भारतीय पुलिस सेवा के एक अधिकारी नरेंद्र कुमार की मुरैना में खनन माफियाओं द्वारा निर्मम हत्या हो,चाहे करेड़ा कस्बे के धुंवाला गाव की राजस्थान हाईकोर्ट में माइनिंग माफिया के खिलाफ संघर्ष हो,यह नज़ारे आज के इस पूंजीवादी समाज में आम बात है।

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की करेड़ा तहसील में एक दशक पूर्व शुरू हुआ था खनन माफियाओ का जाल,आज एक बहुत बड़ा तन्त्र बन चुका है। इन सवर्ण व् आर्थिक रूप से बाहुबलियों के पास न तो राजनैतिक ताकत की कमी है न ही पैसे की। चमचमाती हुई महंगी गाडियो-इंनोवा, डस्टर, ऑडी आदि में आने वाले बाबू लोग करेड़ा उपरमाल क्षेत्र के बच्चो के मस्तिस्क में साहब के नाम से छवि विराजमांन हैं। करेड़ा क़स्बा जो की मगरा विकास क्षेत्र व् डार्क जोन में आता है व वार्षिक वर्षा में केटेगरी चार के क्षेत्रो में आता है। अगर मानसून की मेहरबानी रही तो ठीक नहीं तो अकाल और पलायन करने के अलावा इस क्षेत्र के लोगो के पास दूसरा कोई उपाय नहीं होता है। खरीफ में अगर किसी तरह मक्के की खेती हो गई तो इनका पेट भरने का जुगाड़ हो जाएगा, रबी में गेहू और धान की खेती तो इनके लिये ताजमहल को देखने जैसा है। आज करेड़ा कस्बे मैं छोटी मोटी माइनिंग कंपनियो को मिलाकर 15 से 20 कंपनिया है और इन कम्पनियो में बड़े बड़े राजनीतिक तंत्र से लेकर आर्थिक तंत्र वाले लोग शामिल है।

इस धंधे ने आज करेड़ा में इस तरह से पैर जमा लिया है कि जो शामलात जमीन गाव के स्वामित्व वाली हैऔर उस जमीन पर उनका क़ानूनी अधिकार है, जो की PESA, FRA, PRI उनके अधिकार की बात करता है। लेकिन इन साहब लोगो का गठबंधन इतना जबरदस्त है कि इन्होने राजनीती के गठबंधन को भी फ़ैल कर दिया है। चारागाह से लेकर बिलानाम जमींन पर माइनिंग ठोकना इनके लिये उड़ते हुए एयरोप्लेन से स्काइडाइविंग करने से भी आसान काम है।

खेजड़ी जो कि राजस्थान का राज्य वृक्ष है और इस पर कानून भी बना हुआ है,लेकिन खेजड़ी के वृक्ष को तो चुटकियो में ये लोग काट देते है,भले ही यह अलग बात है कि इन पर कारवाही नहीं होती। खेत व पशुपालन पर आश्रित गरीब लोगो के सामलाती संशाधनो की कीमत के बदले इन माइनिंग बाबूओं का पेट पल रहा है। गोरतलब है कि माइनिंग से निकलने वाली डस्ट,बारीक़ और मोटे पत्थरो के कई सो मीटर तक दूर जाकर खेतो मैं ह्यूमस, जीवाश्म की मात्रा को कम करने के साथ साथ मिटटी की उर्वरकता को नष्ट कर रहे है। एक दशक पहले जहा मक्के की पैदावार एक बीघा में 6 से 7 बोरी निकलती थी,आज हालात यह है कि 2 से 3 बोरी बीघा में ही संतुष्टि करनी पड़ रही है।

इस माइनिंग के मुख्य प्रभावित क्षेत्रो मैं फकोलिया,धुंवाला,ज्ञानगढ़,चिताम्बा,बागजना प्रमुख है। इस उधोग के पनपने का सबसे बड़ा कारण है,तीव्र गति से प्राप्त लाभ व् बाहरी राज्यो के पूंजीपतियो का सटीक निवेश इस धंधे के दिन दोगुनी रात चौगुनी प्रगती करने के सबसे बड़े कारण है।

चिंतित हो उठता हूँ इस तरह के व्यवसाय के द्वारो हजारो गरीब ग्रामीणों की आजीविका को बरबाद होते हुए देख कर,फिर भी आशान्वित हूँ कि एक दिन लोग बदलेंगे,नीतियां बदलेगी और करेडा के गरीब लोगो की जिंदगी भी बदलेगी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता “ कदम मिलाकर चलना होगा” की कुछ पंक्तियां करेड़ा के माइनिंग प्रभावित किसानो के साहस और उनके धैर्य को समर्पित है –
“ बाधाये आती है आएं, घिरे प्रलय की घोर घटायें,
पांवो के नीचे अंगारे,सर पर बरसे यदि ज्वालाएँ,
निज हाथो से हँसते हँसते, आग लगा कर चलना होगा
कदम मिलाकर चलना होगा,कदम मिलाकर चलना होगा”

– तेजेन्द्र कुमार मीणा
( प्रोजेक्ट मेनेजर,एफइएस भीलवाड़ा )

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