आम जन का मीडिया
Can BSP become a King Maker in the assembly elections?

क्या विधानसभा चुनावों में बसपा किंग मेकर बन सकती है ?

- डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

कांशीराम के अथक प्रयासों से भारत में बसपा की स्थापना के समय वंचित समुदायों ने बहुजन शब्द में अपनी पीड़ा का प्रतिबिम्ब देखा था। जिसके चलते बसपा को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा तक मिल गया। मगर कांशीराम के रहते हुए ही, उन्हें अउल्लेखनीय हालातों के चलते इतना विवश कर दिया गया कि वे अपने सपनों की पार्टी को बर्बाद होते देखते रहें और उनका दर्दनाक अंत हुआ।

वर्तमान में भाजपा संघ का राजनीतिक मंच है और कांग्रेस की नीतियों को परोक्ष रूप से संघ प्रभावित करता रहता है। बसपा संघ को सहयोग करती है और संघ का सहयोग लेती है। ऐसे हालातों में वंचित समुदायों के सामने बहुत बड़ा राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। वंचित समुदायों के लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर वे किस पार्टी को समर्थन करें? उनको सबसे अधिक गुस्सा बसपा के प्रति है-क्योंकि बसपा बहुजन के नाम पर 85 फीसदी वंचितों के उत्थान की बात करती है और सत्ता के लिये संघ व संघी नीतियों का समर्थन करती है।

वंचित समुदायों में यह धारणा बन चुकी है कि इस वर्ष राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ विधानसभाओं के आम चुनाव होने हैं। जिनमें संघ के इशारे पर बसपा कांग्रेस को हराने के लिये सभी निर्वाचन क्षेत्रों या उन निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारने की योजना बना रही है, जहां कांग्रेस के जीतने की उम्मीद है। जिसका सीधा और साफ मकसद भाजपा को जितना और कांग्रेस को हराना है। ऐसे में वंचित समुदायों के आम लोगों में मायावती और उनकी बसपा के प्रति लगातार गुस्सा बढता जा रहा है।

यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। क्योंकि बसपा के धराशाही होने के बाद निकट भविष्य में कोई तीसरी ताकतवर राष्ट्रीय स्तर की पार्टी उभरने की संभावना नहीं है। अत: वंचित समुदायों की अभी भी चाहत है कि बसपा को बचाया जाये। जिसके लिये पहली शर्त है-मायावती से मुक्ति। मायावती मुक्त बसपा को फिर से जिंदा किया जाये।

मेरा अनुभवजन्य मत है कि यदि मायावती बसपा के सभी पदों को त्याग दे तो बसपा को फिर से जिंदा किया जा सकता है। ऐसा होते ही बसपा के सभी पुराने कर्मठ कार्यकर्ता फिर से सक्रिय हो सकते हैं। इसके अलावा इस महा अभियान के लिये सभी वंचित समुदायों का राष्ट्रीय महासम्मेलन आयोजित करके वंचित समुदायों की संयुक्त विचारधारा, संयुक्त नेतृत्व एवं संयुक्त निगरानी तंत्र विकसित कर लिया जावे तो उक्त तीनों राज्यों में बसपा को किंग मेकर बनने से कोई नहीं रोक सकता। यही नहीं 2019 में बसपा लोकसभा के चुनावों में केन्द्रीय भूमिका का निर्वाह करने की स्थिति में होगी।

यह अलग बात है कि संघ किसी भी कीमत पर बसपा को मायावती के शिकंजे से मुक्त नहीं होने देगा। इसके बावजूद वंचित समुदायों शुभचिंतकों को इस दिशा में गंभीरतापूर्वक परिणामदायी प्रयास करने में कोई हानि नहीं होगी।

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