….क्योंकि शांतिपूर्ण अांदाेलनों को इस देश में नोटिस नहीं किया जाता !

-त्रिभुवन

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इस देश के लोगों की बातें सुनें तो लगता है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य इसी धरती पर वास करते हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के लोगों ने एससी एसटी एक्ट में संशोधन करने वाले सुप्रीमकोर्ट के एक अवांछित हस्तक्षेप के विरोध को लेकर जिस तरह आंदोलन किया, वह शांतिपूर्ण अांदोलनों की आवाज़ों को नोटिस न करने वाले नेताओं की खोपड़ियों को झकझोरने के लिए काफ़ी है।

आज़ादी से पहले सरदार भगतसिंह ने बहरों की सरकार को सुनाने के लिए कम नुक़सान करने वाले बम फोड़े थे। आज़ादी आकर छीज भी गयी। और राजनेता वैसे के वैसे और वहीं के वहीं। ढीठ शब्द ही शर्मसार है। काठ के कानों, प्लास्टिक की आंखों और अमेज़ॉन से आयातित दिलों वाले इन राजनेताअों और आम लोगों की विवेक बुद्धि के लिए एक-दो छोटे उदाहरण काफ़ी होंगे। सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम महिलाओं ने बेहद शालीन और शांतिपूर्ण आंदोलन किए, लेकिन सरकारों, मीडिया और प्रशासनिक मशीनरी ने ध्यान ही नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट तक तो आवाज़ भी नहीं पहुंची। किसानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन किए, लेकिन उन्हें काग़ज़ी भुलावे देकर वापस भेज दिया गया।

आतंकित कर देने वाले और पूरे देश में भय फैला देने वाले आंदोलन करना जैसे भारत मां के सच्चे सपूत होने का प्रमाण है। जैसे घर का सबसे लाड़ला सबसे ऊधम भरे आंदोलन करने का अधिकार रखता है। बर्तन तोड़ेगा, घड़े फोड़ेगा, कपड़े फाड़ेगा और सपूत का सपूत रहेगा। मां भी चुपचाप सुनेगी। बाप भी। बाकी बहन-भाई टुकुर-टुकुर देखेंगे कि उन्हें यह अधिकार कहां है! इसका आंदोलन-उसका आंदोलन। जिन्हें आपने कमज़ोर देखा या लगा कि इनका वोट तो मिल ही जाएगा या जिनका वोट मिलना ही नहीं है तो बंदूक भी चलाई और टैंक भी दौड़ाया। ठांय-ठांय। कितने सुसंस्कृत लोगों का यह अरुण मधुमय हमारा देश है। हम अपने इस देश में हर साल एससी कहे जाने वाले भारतीय नागरिकों पर 40,000 से ज्यादा अत्याचार करते हैं। और इनमें सज़ाएं होती ही नहीं हैं। सिर्फ़ पकड़-धकड़ करके छोड़ दिया जाता है।

कितनी हैरानी की बात है कि इस देश के सुप्रीम कोर्ट में आजादी के बाद से आज तक अनुसूचित जनजाति का कोई जज ही नहीं बना है। शिड्यूल कास्ट न्यायाधीश भी अभी सुप्रीम कोर्ट में नहीं है। आप कत्लेआम भी करेंगे और यह भी दावा करेंगे कि आपकी तो पुश्तों में भी किसी को तेग़बाज़ी का शौक नहीं है। आप सत्ता में बैठे रहते हैं, कभी बाबरी मस्जि़द ढह रही होती है और कभी सड़कों पर उतरा आंदोलनकारी आपकी कानून और व्यवस्था के रामलला को बंधक बनाकर छोड़ देता है। और इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की बेचारगी का आलम ये होता है कि वह हिंसक समूहों को सलाम करने के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता। बस यह जुमला जुबान पर रहता है कि ये सब हमारे धर्म के रक्षक भाई हैं और ये तो ऐसा नहीं कर सकते।

इस देश के राजनेताओं की इससे बदतर तसवीर और क्या होगी कि वे पड़ोसी देश के साथ बैठकर समस्या का राजनीतिक हल नहीं निकाल सकते और इस देश के आम जवान को मरने के लिए हवि बनने देते रहेंगे। सरहद पर कभी अपना बेटा नहीं भेजेंगे। क्योंकि हमारे यहां किसान जातियां हैं और उनके बेटे जय जवान जय किसान सुनकर आ ही जाएंगे। क्या पुलिस के जवान इसी तरह पिटने और मारखाने के लिए बने हैं? हिंसक आंदोलनों में हमारे अपने ही बेटे कब तक पुलिस की वर्दी पहनकर अपने ही भाइयों के हाथों नृशंसता से पीटे और मारे जाते रहेंगे? आप समस्याएं सुलझाएंगे नहीं, बल्कि चुनावी जीत के लिए इस तरह के हिंसक प्रदर्शनों और खून सने रास्तों से अपनी चुनावी जीत के रथों में जुटे हुए घाेड़ों के लिए ऊर्जा जुटाएंगे और इस देश का आम नागरिक तमाशबीन बनकर आपको सत्ता का भोग लगाता रहेगा। कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, कभी कम्युनिस्ट, कभी समाजवादी! कभी आम आदमी और कभी खास आदमी।

यह कितनी अजब बात है कि सभी राजनेता उस कूचे में बे-सबब धूम-धाम कर रहे हैं, जहां अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, निर्धनों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की हालत रुला देने वाली कर दी जाती है। इस अरुण मधुमय देश में हर साल तीस हजार से ज्यादा हत्याएं की जाती हैं। 2014 में 33,981, 2015 में 32,127 और 2016 में 30,450 हत्याएं हुईं। किसी साल 77,237, किसी साल 82,999 और किसी किसी साल 88,008 अपहरण होते हैंं। हर साल 48 लाख से ज्यादा अपराध होते हैं। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र देश में नागरिकों के लिए सबसे असुरक्षित इलाके हो गए हैं। हम महिलाओं को देवियां मानते हैं और बेटियों को अपना गर्व घोषित करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि हर साल महिलाओं के खिलाफ तीन लाख से ज्यादा अपराध घटित होते हैं। कभी 3,39,457 तो कभी 3,29,243 और कभी 3,38,954 अपराध। महिलाओं के प्रति क्रूरता के मामले में पश्चिम बंगाल, राजस्थान और उत्तरप्रदेश बहुत आगे हैं। ख़ासकर पति और उसके रिश्तेदारों की क्रूरता के मामले में। हर साल देश में 1,10,378, पश्चिम बंगाल में 19,302, राजस्थान में 13,811 और उत्तरप्रदेश में 11,156 महिलाएं पति और पति के रिश्तेदारों की हिंसा का शिकार होती हैं।

जौन एलिया ने एक बहुत ख़ूबसूरत बात कही है : नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम। बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम! लेकिन मेरा कहना है कि जब हम सबको साथ ही रहना है तो झगड़ा क्यूं करें हम? हम अपनी बात ख़ामोशी से भी तो कह सकते हैं और राजनेता ख़ामोश बातों को भी तो गंभीरता से ले सकते हैं। क्यों इतनी हिंसा और क्यों इतना हंगामा? क्यों बार-बार वफ़ादारी के दावे और क्यों बार-बार अग्निपरीक्षाएं? अगर अग्नि परीक्षाएं सीता माता को न्याय नहीं दिला सकतीं और वह भी भगवान राम जैसे शासक के होते हुए तो आज के शासक तो उनके सामने धूल का कण भी नहीं हैं। ख़ामोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम। ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम! वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम! हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम? किया था अहद जब लम्हों में हमने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम! नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी तो फिर दुनिया की परवाह क्यूँ करें हम। लेकिन ख़ामोश और शालीनता भरी आवाज़ों को आप नहीं सुनेंगे तो आपको वही मिलेगा, जो आज सड़कों पर मिला है, जो कल हरियाणा में जाटों और परसों राजस्थान में गुर्जरों से मिला था। लेकिन ये अब कटु सच स्थापित हो गया है कि इस देश की धरती पर सिख और मुसलमान कभी दलितों, जाटों, गुर्जरों और हिंदुत्ववादियों जैसे आंदोलन का अधिकार नहीं रखते! क्योंकि अब एक ही तरह के राजनीतिक आचरण की चदरिया को देशद्रोह और देशभक्ति की इड़ा और पिंगला में बीन दिया गया है। लेकिन आसनसोल हो या नक्सलवाड़ी, जेतारण हो या जम्मू कश्मीर-हिंसा को हिंसा ही समझा जाना चाहिए। हिंसा का रंग देखेंगे तो आपकी आंख प्लास्टिक की, कान काठ के, दिल खंगर ईंटों का और चेतना भुस से भर जाएगी!

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है ,यह आलेख उनकी फेसबुक टाईमलाइन से साभार लिया गया है ) फोटो क्रेडिट – आज तक

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