क्या दलित संविधान प्रदत अधिकार खोने जा रहे हैं !

 (एच.एल.दुसाध )                                                                                           आज 6 दिसम्बर है ,बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस. यूं तो आज के खास दिन बाबा साहेब को पूरा देश ही नहीं, जन्मगत

संविधान की उद्देशिका वितरित की और स्कूली बच्चों को संविधान के महत्व से अवगत कराया !

(जयपुर 5 दिसम्बर 2019) 26 नवम्बर (संविधान दिवस) से 10 दिसम्बर ( अंर्तराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस ) तक, संवैधानिक मूल्य जाग्रति पखवाड़ा आयोजन

डॉ. अंबेडकर और भारतीय महिलाओं के लिए उनका योगदान !

(प्रेमचंद गांधी ) ‘मैं महिलाओं द्वारा चलाए जाने वाले आंदोलनों में गहरा विश्‍वास रखता हूं। उन्‍हें अगर सही ढंग से विश्‍वास में लिया जाए तो वे आज के तकलीफदेह सामाजिक माहौल को पूरी तरह बदल सकती हैं। अतीत में उन्‍होंने निम्‍न वर्ग के

कारसेवक की किताब पर संघ ख़ामोश क्यों है ?

(लखन सालवी )दलित चिंतक भंवर मेघवंशी की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘‘मैं एक कारसेवक था’’ को 1 दिसम्बर की रात को पढ़ना आरम्भ किया और 2 दिसम्बर को सुबह 11 बजे इसका आखिरी पन्ना पढ़ा।यह जबरस्त पुस्तक है, जिसमें संघ के एक स्वयंसेवक की कहानी है। वो

साहस के पहाड़ पर खड़ा एक कारसेवक !

( उम्मेद सिंह )आज राजस्थान में ही नहीं वरन् देशभर में दलित आयोजन, आन्दोलन, सम्मेलन व सेमीनार में अनिवार्य नाम बन चुके भँवर मेघवंशी अपनी नई किताब ‘मैं एक कारसेवक था ‘ में संघर्ष के पहाड़ पर खड़े एक कारसेवक नज़र आते है। पुस्तक उनकी आत्मकथा

संघ के एक स्वयंसेवक द्वारा ‘मैं एक कारसेवक था’ की समीक्षा !

(कमल रामवानी 'सारांश') मेरा सौभाग्य रहा है कि पिछले 3 महीने में जो मैंने किताबें पढ़ी है उनके लेखक व्यक्तिगत रूप

राजस्थानी भाषा की पहली दलित आत्मकथा “च मानी चमार” !

(दुलाराम सहारण) भारतीय समाज व्यवस्था में भले ही हम जाति-विहीन समाज के कितने ही दावे कर लें पर जाति जमीनी हकीकत है। मानव निर्मित समाज में जाति देह पर चमड़ी की तरह चिपकी है। धर्म बदलो पर जाति नहीं बदलती,गांव, शहर बदल लें, जाति नहीं

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय का 12वां राष्ट्रीय सम्मेलन नए संकल्पों और नए इरादों के साथ सम्पन्न

(पुरी, 25 नवंबर 2019) जगन्नाथ पुरी के दूधवावाला धर्मशाला में चल रहा तीन दिवसीय (23-25 नवंबर 2019) जनआंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) का 12वां सम्मेलन आज अपने तीसरे और आखिरी दिन में पहुंचा। पिछले दो दिनों में देश की परिस्थितियों और

‘मैं एक कारसेवक था’ पुस्तक पढ़ते हुए एक दर्द भरी आहट सुनाई देती है !

(रेणुका पामेचा) भँवर मेघवंशी द्वारा लिखित यह आत्मकथा एक संगठन के अन्दर की दोगली नीति को इतने स्व अनुभव से सामने लाती है कि लगता है जैसे आज भी वही घटित हो रहा है. एक युवा बाहरी तामझाम व बड़े-बड़े नारे देखकर कितनी निष्ठा से राष्ट्रीय