एक युवा भीम सैनिक की कलम से ….!

- कमल पिपरालिया

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व्यक्तिगत रूप से हर एक दलित नेता या वक्ता का बहुत ही ऊर्जायुक्त भाषण होता है और यह सब अपने स्तर पर बहुजन समाज की हकीकत पोल खोलते है। काफी सदियों से हम सब भी एक बात सुन रहे है और देख रहे है कि अत्याचार करने वाले से ज्यादा अत्याचार सहने वाला गुनाहगार होता है। अत्याचार क्यों होता है वो हम सब जानते है। उसके पीछे क्या कारण है कुछ हद तक वो भी जानते है। हर जगह बहुजन समाज के लोग एकत्रित होते हैं।और वहाँ इतने जोशीले भाषण होते है कि मानो आज से एक नई क्रांति आएगी। लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह है कि उस कार्यस्थल से दूर होते ही बहुजन समाज का आदमी उस चीज़ को भूल जाता है, जो वहाँ उसने सीखा।

काफी सालो से हम समाज एकता की कोशिश कर रहे है। लेकिन हम कितने सफल हुए है इस पर कभी गौर नही किया। सोशल साइट्स की मदद से बहुजन समाज का युवा तो बहुत कुछ जाग गया है लेकिन असली में किसको जगाना है। उस पर हमारा व्यकिगत सुझाव होना चाहिए। गरीब तबके के लोगो को जगाना है और उन्हें उस स्तर से ऊपर उठाना है ताकि वो महसूस कर सके कि असली आजादी तो उनके अपने समाज मे ही है। जिससे उनको उच्च जाति के लोगो से छुटकारा मिले।

जब हम सब बात करते है कि हमारे देश में महिलाओं को 50% आरक्षण है। तो क्या अपने बहुजन समाज मे महिलाओं को 50% आरक्षण हम दे रहे है ? नही ना क्योंकि हम केवल वर्तमान और भूतकाल को देखकर चल रहे है। जब तक समाज की महिला जागरूक नही होगी तब तक किसी क्रांतिकारी बदलाव की आशा ही कैसे कर सकते है हम? हालांकि मैं व्यक्तिगत रूप से अभी इतना परिपक्व नही हूँ कि समाज के लिए जो भी बोलू वो 100% सही हो लेकिन इतना जरूर है कि अगर समाज के 20-30% लोग इन बातों पर अमल करें तो एक क्रांतिकारी बदलाव जरूर देखने को मिलेगा।

बात बोलने में और उसे मानने में फर्क होता है। व्यक्तिगत रूप से टिप्पणीयाँ करना सरल है लेकिन क्या हर जगह एक ही रुख अपनाया जाए यह जायज है?? नही ना तो फिर हर जगह टिप्पणी ही क्यों ? जरा सोचो अगर कोई समाज की कमान संभाल रहा है तो इसमें बुराई क्या है???वो समाज के लिए सोचने और कुछ करने की क्षमता तो रखता है।

भीम सेना, अम्बेडकर युवा फ़ोर्स, भीम आर्मी, भीम सैनिक, दलित एकता, बहुजन समाज एकता, मेघ सेना, मेघवाल, शुद्र द राइजिंग न जाने कितने तथाकथित ग्रुप और संगठन बने हुए है। क्यों ना यह सब एक होकर एक संगठन बनाए और उसी के बैनर तले एक होये। एक संगठन कुछ बाते करता है। तो एक संगठन कुछ और करता है।हालांकि अंतिम रूप से निष्कर्ष तो एक ही होता है क्योंकि सब संगठन बाबा साहब के बताए मार्ग पर ही तो चल रहे है। लेकिन इसमें फर्क क्या पड़ता है??

फर्क सिर्फ यह है कि जो हम अपनी ताकत दिखाना चाहते है मनुवादियो को वो हम अलग-अलग रहकर कभी नही दिखा सकते है।जब तक बहुजन समाज एक नही होगा तब तक समाजिक बदलाव की आशा करना व्यर्थ है। क्योंकि बाबा साहब का मकसद अलग-अलग संगठन बनाना नही था उनका असली मकसद अलग-अलग जातियों को एक करके इंसानियत धर्म को अपनाना था।मैंने बाबा साहब की एक भी किताब नही पढ़ी है अभी तक और ना ही उनकी पूरी जीवनी लेकिन मैंने थोड़ा बहुत ही सही संविधान को पढ़ा है और उसमें बाबा साहब की जीवनी और किताबे दोनों शामिल है। उनका जो मकसद था वो संविधान में स्पष्ट दिखता है कि उन्होंने बहुजन समाज के लिए कितना संघर्ष किया था।

हाँ, मेरे द्वारा लिखी बाते ज्यादा ऊर्जावान नही होती लेकिन इतना जरूर है कि यह सब हकीकत से बिल्कुल दूर नही होती है। मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी संगठन या ग्रुप से नही जुड़ा हूँ।क्योंकि मुझे किसी भी संगठन में बाबा साहब के सपने नही दिखते हैं।
हकीकत में क्रांतिकारी बदलाव चाहते हो तो सबसे पहले गरीब बहुजन समाज की सोचो, उसके बाद महिलाओं की। क्योंकि गरीब आजाद रूप से नही जी पा रहा है और महिलाओं के अपने सम्पूर्ण अधिकार नही मिल पा रहे है। घर मे सबसे ज्यादा मनुवाद को महिलाएं ही तो बढ़ावा दे रही है। वो कैसे और क्यों?? शायद स्पष्ट करने की जरूरत नही पड़ेगी।

समाज मे क्रांतिकारी बदलाव के लिए अलग-अलग संगठन की नही बल्कि हम सबको एक होने की जरूरत है। क्रांतिकारी भाषण की नही क्रांतिकारी सोच की जरूरत है। समाज का युवा जागरूक है जरूर लेकिन उनकी दिशा निर्धारित नही है अभी। उन्हें एक अच्छे निर्देशन की जरूरत है। और यह तब ही सम्भव होगा जब हम सब एक होंगे। अलग-अलग संगठन तो हम सब को विभाजित कर रहै है। क्योंकि भीम सेना वाले बोलेंगे अम्बेडकर युवा फ़ोर्स कुछ नही कर रही और युवा फ़ोर्स वाले किसी और पर।लेकिन कहीं न कहीं हम सब भटक रहे है। जब तक हम सही दिशा का चयन नही करेंगे तब तक क्रांतिकारी बदलाव की आशा करना निर्रथक है।

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