क्या दलित केवल धरना प्रदर्शन करने के लिए ही पैदा हुए हैं ?

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(बी.एल.बौद्ध)

वैसे तो लोकतंत्र में धरना प्रदर्शन करना कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि भारत का संविधान हमें ऐसा करने की इजाजत देता है कि हम शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार या कोई भी कानूनी मांग  मनवाने के लिए अथवा अपना अधिकार लेने के लिए धरना प्रदर्शन कर सकते हैं ,लेकिन दुख इस बात है कि अपराधियों के विरुद्ध थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए या फिर दोषियों को गिरफ्तार करवाने के लिए भी धरना प्रदर्शन करना पड़ता है क्योंकि पुलिस अपना काम ठीक से नहीं करती है या फिर पुलिस को ठीक से काम करने नहीं दिया जाता है।

हम गरीब मजदूर छोटे किसान अथवा शिक्षित बेरोजगार लोग हैं हम न किसी का बुरा सोचते हैं और न किसी का बुरा करते हैं फिर क्यों हमारे ऊपर लगातार जुल्म ढाये जा रहे हैं ?

जब हम इस विषय पर गहराई से सोच विचार करेंगे तो पायेंगे कि जल और मन की गति एक जैसी होती है जिस प्रकार जहां थोथ दिखाई देती है पानी उसी थोथ में घुसने का प्रयास करता है,उसी प्रकार आदमी के अंदर जो मन होता है वह भी थोथ देखता है, जिधर थोथ दिखी उधर ही घुसने का प्रयास करता है अथवा जुल्म ढाने का प्रयास करता है।

शोषित समाज पर जगह जगह जुल्म ढहाये जा रहे हैं यह उसी थोथ का नतीजा है। मकान में थोथ नहीं रहे इसके लिए हम नींव मजबूत करते हैं।

अतः शोषित समाज को भी यदि जुल्म और अत्याचारों से बचना है तो सबसे पहले थोथ को मिटाना जरूरी है, जहाँ भी इन अपराधियों को थोथ नजर आएगी वहां ये जुल्म ढाएंगे ही यह कड़वी सच्चाई है ।

जब तक बिजली के तारों में करंट रहता है तब तक उन्हें छूने की कोई हिम्मत नहीं करता है लेकिन जब यह विश्वास हो जाता है कि लाइन कटी हुई है तो बिना डर के कोई भी तारों को हाथ लगा सकता है।

शोषित समाज की हालत लाइन कटे हुए तारों जैसी हो रखी है,अपराधियों को विश्वास है कि इनमें करंट नहीं है।अतः समय और हालात को समझते हुए शोषित समाज के लोग अपने में करंट पैदा करें।

सांप से लोग इसलिए डरते हैं कि उसके काटने से मौत हो सकती है लेकिन चूहे से कोई नहीं डरता है जबकि चूहे से बिच्छू बहुत छोटा होता है लेकिन बिच्छू से फिर लोग जरूर डरते हैं क्योंकि बिच्छू डंक मारेगा तो व्यक्ति दर्द के मारे कराहने लगेगा।

अतः स्वभाविक सी बात है कि शोषित समाज को अपने आप में मजबूती पैदा करनी ही पड़ेगी कि किसी को भी थोथ दिखाई न दे।

राजस्थान प्रदेश में पाली जिले के घेनड़ी गांव में रात 11 बजे राजपुरोहित समाज के करीब 100 लोग मेघवाल बस्ती पर हमला कर दस बारह लोगों को मारपीट कर चले गये , लेकिन उन लोगों पर कोई एक पत्थर तक भी फेंकने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

भीलवाड़ा जिले के गोरधनपुरा गांव में शोषित समाज के दूल्हे को 200 बारातियों के बीच में घोड़ी से नीचे पटक दिया जाता है और कई बारातियों को मारपीट कर अपराधी चले जाते हैं लेकिन उन पर कोई भी बाराती अपना हाथ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है।

अभी अभी झुंझुनू जिला के किशनपुरा में भी ऐसा ही वाक्या देखने को मिला है यहां भी राजपूत समाज के करीब 100 अपराधी मेघवाल समाज के लोगों को मारपीट कर चले गए लेकिन उन अपराधियों पर किसी ने दो उंगली तक नहीं उठायी।

मेरे भाइयों थोड़ा सा तो सोचो कि जब हमें कोई मार ही रहा है तो हम पीछे क्यों रहें, वही दो हाथ और दो पाँव उनके हैं और वही हमारे भी हैं।

भारत का कानून भी आत्मरक्षा की इजाजत देता है तो फिर हम अपनी रक्षा करने के लिए प्रयास क्यों नहीं करते हैं ?

सबसे पहले हमें अपने अंदर करंट पैदा करना पड़ेगा, बाबा साहेब अंबेडकर कहा करते थे कि बकरी की तरह म्यांम्यां नहीं करना है बल्कि शेर की तरह दहाड़ते हुए ललकारना सीखो।

बहुत सी जगह ऐसा देखने में आता है कि कल तक जिसकी जी हुजूरी किया करते थे या जिसके खेत में काम धंधा किया करते थे या फिर जिसे अपना दोस्त या धर्मभाई बना रखा था आज वही जुल्म एवं अत्याचार करने लगा है।

इसके बहुत सारे कारण हैं जिन्हें समझना होगा, दहेज प्रथा,मृत्युभोज, दसोठन एवं ब्याज पर कर्ज लेकर फिजूल खर्ची को छोड़ना होगा।

हमारी बहन बेटियों की इज्जत पर बुरी नजर डालने वाले अपराधियों को जमकर तोड़ना होगा और अपने बचाव के लिए हर घर में लाठी, बरछी भाला तलवार कटार या फिर लाइसेंस शुदा हथियार रखना होगा।

हमारा मकसद मरना और मारना नहीं है बल्कि इज्जत के साथ जिओ और जीने दो का है लेकिन अपनी इज्जत आबरू मान सम्मान और प्राण बचाने के लिए अपनी आत्मरक्षा में आखरी श्वांस तक हम मुकाबला करेंगे, तब अपराध कम हो सकते हैं वरना लगे रहो धरना प्रदर्शन करने में क्योंकि हमारा जन्म ही धरना प्रदर्शन करने के लिए हुआ है !

– बी एल बौद्ध 

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