आम जन का मीडिया
... and that was the word: human!

…और वह शब्द था : इन्सान !

  • त्रिभुवन  

आदमी इतने बढ़ गए थे कि धरती बोझ मर रही थी। एक दिन उसने करवट बदली तो साथ ही सारा निज़ाम भी बदल गया।

अादमियों की अक़्ल निकल गई। बकरे बुद्धिमान होकर कलमा पढ़ने लगे और गाएं धर्मग्रंथ पढ़कर गुरुकुल चलाने लगीं। मुर्गियों ने ऋचाएं पढ़नी शुरू कर दीं और बाकी पशुओं ने धरती की अन्य व्यवस्थाएं संभाल लीं। बचे हुए इन्सान कोने-खचाेनों में छुप गए।

तोपें जंग खाने लगीं। सरहदें धरती से उठाकर समुद्र में फेंक दी गईं। धर्मों और मज़हबों को ताला बंद कर दिया गया। जेलें, अदालतें और पुलिस थाने बीते जमाने की बातें हो गईं। धरती से झूठ का सारा सामान उठा दिया गया। विमान से लेकर साइकिलें तक सब वाहन अहातों में रखकर घोंसले बनाने के काम आने लगे। अट्टालिकाओं से लेकर अपार्टमेंट तक में पशुओं के सुकुमार शरारती बच्चे अठखेलियां करते।

पहाड़, नदियां, झरने और तालाब सुरक्षित हो गए थे। हवाएं साफ़ हो गई थीं। धरती का प्रदूषण समाप्त हो गया। अलबत्ता, कभी कोई इन्सान भूले चूके किसी बिल्ली के रास्ते में आ जाता तो वह क्रुद्ध होकर वापस हो लेती और कुछ देर प्रतीक्षा करके चलती। लेकिन उसका मूड बिगड़ा ही रहता। कौओं को आदमी की भाषा से बड़ी चिढ़ होती।सांप जहां कहीं आदमी को देखते, उसकी मूर्खता पर हंसते और लोटपोट हो रहते।

एक दिन इंसानियत का एक वायरस कुछ मुर्गों, कुछ बकरों और कुछ गायों के मस्तिष्क को संक्रमित कर गया।

गाएं आगे आईं और उन्होंने इंसानों को रंभाने के लिए मजबूर कर दिया। वे इंसानों की महानता का गान करतीं और दिन भर उन्हें भूखा रखतीं। आदमी प्रसन्न होकर प्लास्टिक खाता और खुश रहता। गाएं हैरान थीं। इन्सान बोले, प्लास्टिक हमारा सबसे स्वादिष्ट भोजन है। आखिर उन्होंने आदमी को ढेर सारा प्लास्टिक देकर गोशालाओं में बंद कर दिया। वे दिन भर रंभाते रहते। रात को ढांय-ढांय कर ढींकते।

आदमियों की नस्लें गायों से बुरी तरह डर गई थी, क्योंकि एक नस्ल को वह महान बताकर भूखों मारती और दूसरी को वे अपना सबसे स्वादिष्ट भोजन समझतीं। गाएं उस युग में मांसाहारी हो गई थीं।मुर्गे गोशाला जाते और हर रोज एक इन्सान के बच्चे को पकड़कर लाते और पकाकर खा जाते। इन्सान को यह बहुत बुरा लगता, लेकिन मुर्गें तर्क देते कि हमारी चोंच में आपका मांस ही सबसे सही लगता है। वे तर्क देते और इन्सान चुप रह जाते। मुर्गे, बकरे और गाएं ही नहीं, मछलियां तक इंसानों को ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर के लिए सबसे उपयुक्त मानतीं।

बकरों ने कुछ खास दिनों पर इंसानों की बलि देनी शुरू कर दी और इन्सान भाग भी नहीं पाते। वे इंसानों की मंडियां लगाते। एक अच्छे हृष्टपुष्ट इन्सान को महंगे भाव से खरीदते और उसकी बलि देकर अपने देवपुरुष के नारे लगाते। वे हर साल दुनिया भर में इंसानों की मंडियां लगाकर अपना त्योहार मनाते। इस सभ्यता के बकरे मानते थे कि उनके आदि देव ने इंसानों की बलि देने का यह महान पर्व शुरू किया था और इंसानों की हर पर्व पर दी जाने वाली इस बलि से बकरों को स्वर्ग मिलेगा।

वह पशु सभ्यता धरती पर राज कर रही थी और धरती का मानना था कि पिछली सभ्यता में कुछ लोग अपनी बेटियों को गर्भ में मार देते थे, एक दूसरे के धर्म को निकृष्ट बताकर हत्याओं का खुला काराेबार करते थे, दहेज हत्या और सती प्रथा जैसी हत्याएं ये पशु अपनी कुबुद्धि के कारण कभी सीख ही नहीं पाए। ये पशु इतने मंदबुद्धि थे कि इन्हें न बलात्कार आता था और न ये गे-नुमा हो सकते थे।

अलबत्ता, ऊंटों और बैलों ने आदमी को बांधकर खेत जाेतने शुरू कर दिए थे। लेकिन घोड़े आदमी को जहां कहीं देखते, उसे मारने के लिए दौड़ पड़ते। इस सभ्यता में एक और बड़ी कमी ये थी कि इसमें किसी भी पशु में न तो जाति-वाति का चक्कर था और न ही वे बच्चों और औरतों को मारना-पीटना सीख पाए थे।

लेकिन एक पशु एेसा भी था, जिसे देखकर इन्सान  बुक्का फाड़-फाड़कर राेता रहता था। वजह ये कि किसी एक सभ्यता में उसने इस पशु को अपनी सबसे प्रिय गाली बना दिया था, लेकिन आज यही एक कुत्ता ऐसा प्राणी था, जो इन्सान को दोस्त समझता और उसे स्वामीभक्त कहता। इनसान इसे देखता और अफसोस करता। गायों, बैलों, बकरों और मुर्गाें की आदतें देखकर आदमी जहां कहीं कुत्तों को देखता, उसकी आंखें प्रेम से पगे आंसुओं से भर उठतीं। कुत्ते इनसानों को अपने घर में रख्ते और बहुत प्रेम करते।

वह एक ऐसी सभ्यता थी, जिसमें इन्सान  के प्रति और कोई करुणा दिखाने वाला नहीं था, क्योंंकि उस सभ्यता में इंसानों और पशुओं के कुछ गुण और भूमिकाएं बदल गईं थीं.उस सभ्यता में कोई भी पशु कोई गाली नहीं जानता था। वे हजारों साल बाद अथक प्रयास करके महज एक ही गाली वाला शब्द सीख पाए और वह शब्द था :  इन्सान !

 ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है ,यह आलेख उनकी फेसबुक टाइमलाइन से साभार लिया गया है )

 

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