और अंततः जनता हार जायेगी !

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देखा यह जाएगा है कि जब अवसर आया ,तब आपने क्या चुना ?

राज या समाज ?

सत्य या सत्ता ?

मिशन या कमीशन ?

चुनाव सिर्फ राजनीति नही है ,यह पैमाना भी है,यह लोगों के चेहरों पर लगे नकाबों को उतारने का वक़्त भी है !

इस दौरान आपको पता चलता है कि जो निस्वार्थ भाव से सेवा करने की बात करते है या सामाजिक बदलाव के लिए संघर्षरत होने के क्रांतिकारी दावे करते है ,जब उनके सामने राजनीति की रपटीली राह आई, तब वे टिके रहे या फिसल गये ।

यह तो मियादी बुखार है,उतर जायेगा, हर पांच साल में आता है, आते जाते रहेगा,कौन सा जीका वायरस है जो साथ ले जायेगा…पर जब चुनाव,वोट,नतीजे आ जाएंगे ,तब सार्वजनिक जीवन मे कितनी क्रेडिबिलिटी बची रहेगी,यह बहुत मायने रखेगा ।

कुछ को कुछ पार्टियां टिकट देगी,कुछ वंचित रह जायेंगे ,कुछ चुनाव लड़ेंगे,जिनमें से अधिकांश हार जाएंगे ,महज कुछ सौ लोग जीत पायेंगे।

जिंदगी फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आयेगी, न पार्टियां पूछेगी और न ही उम्मीदवार, सब अपना अपना एजेंडा पूरा कर चुके होंगे ,फिर किसी को किसी से कोई मतलब नहीं होगा ।

यह थोड़े से वक़्त का जलसा है,बहुत छोटा सा मेला,कल निपट जायेगा ,इसलिये अपने स्वत्व को मत खोइये, जिस बात के लिए आप जाने और पहचाने जाते है,उस खुद्दारी और व्यक्तित्व को बचाये रखिये।

साल दर साल चुनाव तो आते ही रहेंगे,इनमें क्या नया है ? उपकरण बदल जाते है,लोग बदल जाते है,सत्ता की भूख अमर है,वह पीढ़ी दर पीढ़ी बनी और बची रहती है ,उसके स्वभक्षी चरित्र में कभी बदलाव नहीं आता है ,वह वैसी ही निर्मम बनी रहती है ।

मेरा विश्वास है कि हर बार की तरह इस बार भी दल और नेता जीत जायेंगे ..और जनता हर बार की भांति  फिर से हार जायेगी ।

मैं उस हारी हुई जनता की आवाज़ हूँ,मैं उसके साथ हूँ ,मेरा सरोकार उससे है,इसलिए मैंने यह भीम संकल्प लिया कि न चुनाव लड़ूंगा,न किसी दल की सदस्यता लूंगा और न ही कोई राजनीतिक दल बनाऊंगा ।

मेरा कोई आलाकमान नहीं हो सकता ,मैं “हम भारत के लोग” ( we the people of india)  की प्रभुसत्ता में विश्वास करता हूँ ।

हालांकि मैं हर चुनावी वर्ष में कुछ अच्छे मित्र खो देता हूँ,ऐसा करने के लिए मुझे कुछ भी नहीं करना पड़ता है,मैं वैसे भी किसी के लिए कुछ करता भी नहीं हूँ,लोगों की अपेक्षाएं ही उन्हें साथ लाती है और वे ही उन्हें दूर भी ले जाती है ,मेरा कोई योगदान नहीं है ,मैं पहले जैसा ही बना रहता हूँ।

चुनाव अच्छा फिल्टर है ।

-भंवर मेघवंशी

( संपादक – शून्यकाल )

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