दलबदल कानून में हो संशोधन !

चुनाव से ठीक पहले दल बदलना, मतदाता को बेवकूफ बनाना है !

73

(डॉ.धीरज बेनीवाल) 

डॉ.धीरज

चुनाव से पहले राजनेता को दल परिवर्तन को रोकने का ,मेरे नजरिये से सबसे अच्छा तरीका है कि “दल बदल कानून” में संशोधन किया जाए।

“दल बदल कानून” 52वाँ संविधान संशोधन करके 1985 में 10 वी अनुसूची में जोड़ा गया था। यह कानून विधायक या सांसद बनने के बाद ,अगर कोई राजनीतिक पार्टी बदलता है तो उसकी विधानसभा या संसद से सदयस्ता रद्द कर दी जाती है। इस कानून के नहीं आने से पहले बहुत से राजनेता ने चुनाव जिस पार्टी से जीता,उस पार्टी से इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते थे ,जिससे वो मंत्री बनाये जा सके,ओर ऐसा करने से उनकी सदयस्ता को भी कोई खतरा नहीं था। उदाहरण के तौर पर 1978 में शरद पंवार ने ,महाराष्ट्र का मुंख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेस छोड़ थी ।

इसे रोकने के लिए राजीव ग़ांधी सरकार से 1985 में “दल परिवर्तन” कानून बनाया,जो चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलने से रोकता है,अगर पार्टी बदलोगे तो सदयस्ता जाएगी ।

चुनाव जीतने के बाद होने वाली पार्टी बदलाव से तो मुक्ति मिल गई। लेकिन आजकल चुनाव से पहले टिकट नहीं मिलने पर जो पार्टी बदल रहे है, जो मतदाता के साथ धोखा है,उसे कैसे रोका जाए ?

मेरे अनुभव से इसे रोकने के लिए “दल बदल” कानून में परिवर्तन करना चाहिए।एक बार पहले भी वाजपेयी सरकार ने 91वाँ संविधान संशोधन 2003 में किया ,जिसमे बोला कि मंत्रियों की संख्या लोकसभा या विधानसभा की कुल सीट से 15% से अधिक नही होगी।

 मुझे लगता है अब कोई भी नई सरकार आये, उसे इसमे दोबारा संशोधन करना चाहिए,क्योकि यह कानून  “चुनाव जीतने के बाद तो दल परिवर्तन को रोक देता है ,किन्तु चुनाव से पहले टिकट ना मिलने पर होने वाले दल परिवर्तन को नहीं रोकता।

इस कानून में एक प्रावधान जोड़ना चाहिए,वो यह कि चुनाव की तारीख से 6 माह पहले,अगर कोई भी पार्टी छोड़ता है या बदलता है तो उसे लोकसभा या विधानसभा चुनाव के लिये अयोग्य साबित कर दिया जाए ताकि मतदाता को पार्टी के नाम पर बेवकूफ बनाना बन्द हो जाये।

(डॉ.धीरज बेनीवाल )

Leave A Reply

Your email address will not be published.